माखन लाल चतुर्वेदी की जयंती पर संगोष्ठी का हुआ आयोजन

जनकपुरधाम/मिश्री लाल मधुकर । सुप्रसिद्ध कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी की जयंती के पर विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के तत्वावधान में ‘माखनलाल चतुर्वेदी की रचनाएं और राष्ट्रीय अस्मिता’ विषयक संगोष्ठी का आयोजन विभागाध्यक्ष प्रो.उमेश कुमार की अध्यक्षता में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ माखनलाल चतुर्वेदी की तस्वीर पर पुष्पांजलि से हुआ।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. उमेश कुमार ने कहा कि चतुर्वेदी जी की बचपन से क्रांतिकारी प्रवृत्ति रही है। विद्यालय जीवन में जब शिक्षक अनुपस्थित रहा करते थे तो उनके विरुद्ध उन्होंने तुकबंदी लिखी थी, जिसके कारण उन्हें शिक्षक ने दंडित भी किया लेकिन यह प्रथम घटना है जब उनके विद्रोही स्वभाव और काव्य–क्षमता का परिचय मिलता है। मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के जिस बाबई गांव में उनका जन्म हुआ था वहां ‘हरदौल चरित’ का गायन बहुत लोकप्रिय हुआ करता था। माखनलाल जी पर इस गायन शैली का बहुत प्रभाव पड़ा। बचपन से उनकी राष्ट्रीय निष्ठा इतनी प्रखर थी कि वे कहते थे जिऊंगा तो क्रांति के लिए, मरूंगा तो क्रांति के लिए। उनकी राष्ट्रीय अस्मिता में एकता की भावना बहुत प्रबल थी। इसलिए वे निरंतर इस बात पर जोर देते रहे। अपनी पुस्तक ‘साहित्य–देवता’ में उन्होंने राष्ट्रीयता को ईश्वर माना। यह सच है कि उनपर स्वामी विवेकानन्द का भी प्रभाव था। इसलिए उनकी वैचारिक निर्मिति में औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध आक्रामकता थी तो जनसामान्य के लिए अपार अनुराग भी था। ‘कैदी और कोकिला’ शीर्षक कविता में जो सफेद और स्याह का द्वैत सामने आता है, उसमें कवि का सफेद और कुछ नहीं बल्कि उनकी सात्विकता है। वे शांति के पक्षधर थे। माखनलाल चतुर्वेदी जी की वैचारिकी को समझने की दृष्टि से उनकी रचना ‘कृष्ण–अर्जुन युद्ध’ भी बहुत ही महत्वपूर्ण है। 1905 में जब कांग्रेस के अधिवेशन में वन्दे मातरम का नारा दिया गया था, उसका भी असर उनके लेखन पर अवश्य ही देखने को मिलता है। माखनलाल चतुर्वेदी जी ने जिन मानवीय मूल्यों को अपनी रचनाओं में स्थान दिया है, उन्हें आज अपने जीवन में उतारने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक जान पड़ती है।
वहीं विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के सह–प्राचार्य डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने कहा कि आज हम उस दौर में माखनलाल चतुर्वेदी जी को याद कर रहे हैं जब लोकतंत्र, संविधान और सच्ची देशभक्ति को उल्टा लटका दिया गया है। ऐसे में चतुर्वेदी जी को याद करना चुनौतिपूर्ण काम है। उन्हें सच्चे हृदय से याद करना है तो आज की चुनौतियों से जूझना पड़ेगा। अन्यथा बात बनेगी नहीं। साहित्य में जब उनका पदार्पण हुआ था उस समय गद्य में प्रेमचंद थे और पद्य में माखनलाल चतुर्वेदी। जिस छायावाद से जोड़ कर उन्हें देखा जाता है, उस समय तो छायावाद के प्रमुख स्तंभ निराला जूही की कली ढूंढ रहे थे, पंत प्रकृति में विचरण कर रहे थे, प्रसाद पलायन कर रहे थे और महादेवी गूढ़ रहस्यवाद में उलझी थीं। कहने का मतलब है कि माखनलाल जी के लेखन में तीव्र धार इसलिए थी क्योंकि वह लेखन के साथ आंदोलन भी करते थे। आंदोलन उनके जीवन का अनिवार्य हिस्सा था। प्रभा पत्रिका का सम्पादन करते हुए वे गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए और तत्पश्चात उनकी क्रांतिकारिता का ओज बढ़ता ही गया। उन्होंने राजद्रोह का मुकदमा भी झेला। प्रायः उनकी ‘पुष्प की अभिलाषा’ शीर्षक कविता को उसके वास्तविक संदर्भ से जोड़ कर नहीं देखा जाता। उस कविता का उत्स 23 मार्च 1931 की एक अविस्मरणीय घटना में है। इसी दिन को स्वाधीनता आंदोलन के अमर नायक भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी के फंदे पर चढ़ा दिया गया था। यह कविता उन बलिदानियों के प्रति समर्पित थी। उनके वैचारिक आयाम का एक अलक्षित पक्ष है कि वे निर्गुण पंथ, सूफीवाद और रविंद्रनाथ के रहस्यवाद से भी प्रभावित थे।
आगत अतिथि विश्वविद्यालय राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो.मुनेश्वर यादव ने कहा कि आज दुनिया में जितने परिवर्तन हो रहे हैं, वो सब राष्ट्र को लेकर ही हो रहे हैं। आप यूक्रेन, रूस, अमेरिका या अपने देश भारत को ही देख लें। राष्ट्रवाद की दो धाराएं हैं। पहली बहुलतावादी दूसरी नस्लीय श्रेष्ठता पर आधारित एकलवादी। कहना न होगा, बहुलतावादी राष्ट्रवाद ही देश–दुनिया के लिए शुभ है। अन्यथा एकलवादी राष्ट्रवाद के भयानक अनुभव जर्मनी और इटली में देखने को मिलेंगे। माखनलाल जी को एक भारतीय आत्मा कहा जाता है, यह आत्मा है क्या? स्प्रिट ऑफ द नेशन है क्या? वह चिरंतनता है। यूं कहें कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। हस्ती नहीं मिटने के कारण में ही भारतीय आत्मा बसती है। आज ‘हम’ की भावना खतरे में है। यदि ‘हम’ की भावना खतरे में रही तो यह राष्ट्र कभी सशक्त नहीं हो सकता।
वहीं राजनीति विज्ञान विभाग के ही सहायक प्राचार्य डॉ.मनोज कुमार ने कहा कि पदलोलुपता से कोसों दूर रहने वाले चतुर्वेदी जी महात्मा गांधी के सपनों का समाज बनाना चाहते थे।
एम. एम.टी. एम महाविद्यालय के अवकाशप्राप्त शिक्षक डॉ.श्याम भास्कर ने कहा कि माखनलाल चतुर्वेदी एक व्याकुल कवि की दृष्टि से राष्ट्र को देख रहे थे। ‘कैदी और कोकिला’ शीर्षक कविता उनकी अकुलाहट का श्रेष्ठ उदाहरण है। वास्तव में, वे साहित्य और भाषा के लिए लड़ रहे थे। उनकी धारा छायावाद से अलग थी।
धन्यवादज्ञापन करते हुए विभागीय शिक्षिका डॉ. मंजरी खरे ने कहा कि माखनलाल चतुर्वेदी का योगदान स्वतन्त्र भारत के इर्द–गिर्द अविस्मरणीय है। राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उन्हें 17 बार जेल जाना पड़ा लेकिन फिर भी उनका मनोबल कभी पस्त नहीं हुआ। उनके राष्ट्रप्रेम की परिभाषा आपसी सौहार्द्र, प्रेम और भाईचारा से निर्मित होता है। वह समाज के सभी समुदायों, अस्मिताओं के एकजुट होने में राष्ट्र की उन्नति और शक्ति देखते थे। माखनलाल चतुर्वेदी को सच्चे हृदय से याद करने का अर्थ है, राष्ट्रीय अस्मिता के प्रति वास्तव में संवदेनशीलता। इस अर्थ को हमें याद रखना चाहिए। कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी कंचन रजक ने किया।
मौके पर राजनीति विज्ञान विभाग के सह–प्राचार्य डॉ.मुकुल बिहारी वर्मा एवं रघुवर कुमार, के.एस.आर महाविद्यालय, सराय समस्तीपुर की सहायक प्राचार्या डॉ.उषा कुमारी, समस्तीपुर महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष महेश कुमार चौधरी तथा शोधार्थी खुशबू कुमारी, अंशु कुमारी, बबिता कुमारी, सुभद्रा कुमारी, मलय नीरव, संध्या राय, समीर एवं स्नातकोत्तर छात्र धीरज कुमार, कुमारी संजना, प्रिया पल्लवी, साक्षी कुमारी, लक्ष्मण कुमार, रूपेश कुमार, सूरज नारायण महतो, स्नेहा कुमारी, पम्मी कुमारी हरेकांत यादव आदि ने भी अपनी बातें रखीं। कार्यक्रम में स्नातकोत्तर छात्र–छात्राओं की बड़ी संख्या में भागीदारी रही।

