जहाँ बहुलता है, वहाँ अन्तर्द्वन्द्ध स्वाभाविक है

प्राध्यापक
श्री कृष्ण हछेथू , नेपाल बहुभाषिक, बहुजातीय और बहुसांस्कृतिक देश है । सभी महत्वपूर्ण हैं और सभी को देश में समान स्थान प्राप्त होना चाहिए । थोड़ा अगर इतिहास की ओर जाएँ तो हम देखते हैं कि ४७ के संविधान सभा में जो स्थापित करने की कोशिश की गई कि सभी इस देश में समान हैं । एक भाषा और एक वेश, यही सही नहीं था । सभी समान हो ही नहीं सकते क्योंकि सभी की अपनी पहचान है, अपनी परम्परा है, भाषा है और संस्कृति है । जहाँ बहुलता है वहाँ अन्तर्द्वन्द्ध है पर इसे सम्बोधन करना राज्य का कर्तव्य है । क्योंकि प्रजातंत्र में प्रजा की भावनाओं के अनुरूप राष्ट्र का निर्माण और संचालन होना चाहिए । और इसके लिए देश के इतिहास, यहाँ की भौगोलिक संरचना, संस्कृति सभी की सही व्याख्या होनी चाहिए । इन तत्वों को समग्र में समेटने की आवश्यकता है । प्रजातंत्र, लोकतंत्र ये सभी बार बार व्याख्यायित किए जा रहे हैं पर इनकी मर्यादा का खयाल नहीं किया जा रहा है और ना ही इसे सही तरह से समेटा जा रहा है । राज्य की पुनर्संरचना तबतक सम्भव नहीं है जबतक आप स्थान विशेष की महत्ता और आवश्यकता का सही विशलेषण और अध्ययन नहीं करेंगे । अभी उदारवादी लोकतंत्र की आवश्यकता है । जहाँ तक पहचान को सम्बोधित करने का सवाल है तो वह भी संख्या और बहुलता को ध्यान में रखकर करना होगा । आज जातीय, भाषा, संस्कृति का सवाल माओवादी और मधेशवादी दलों के द्वारा ही सामने आया है । पर जिस स्वरूप में यह आया आज उसी की कुव्याख्या हो रही है । मधेश ने मधेशवादी दलों को हराया क्योंकि वो उनकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे । इसका यह अर्थ तो नहीं है कि मधेश ने अपने मुद्दों को हराया है । वह तो ज्यों का त्यों है । उसी को पूरा करने के लिए मधेश ने काँग्रेस और एमाले को बागडोर सौपी परन्तु आज उसे ही सत्तापक्ष नकार रहे हैं । आज समावेशीकरण, संघीयता, विकास इन सभी बातों को सत्तापक्ष भूल रहे हैं और यही वजह है कि मधेश
आन्दोलित हो रहा है और इस हालात में आन्दोलन का औचित्य तो है ही ।

