समाधान संसद भवन से ही निकलेगा

तुलानारायण साह , संविधान आखिर क्या है ? आम आदमी की निगाह में सर्वोच्च कानून का मूल है संविधान और यह राज्य को संचालित करता है । अब प्रश्न है कि आखिर राज्य क्या है ? मैं मानता हूँ कि राज्य के चार तत्व हैं यथा सरकारी बन्दूक, सरकारी कलम, सरकारी पैसा और इसे चलाने वाले सरकारी कर्मचारी । सरकारी बन्दूक यानि नेपाली सेना, नेपाली प्रहरी और नेपाल सशस्त्र प्रहरी, राज्य का कलम यानि प्रशासन और न्यायालय और राज्य का पैसा अर्थात् योजना विभाग और अर्थमंत्रालय और इन निकायों को जो संचालित करते हैं या यहाँ जो व्यक्ति नियुक्त होते हैं वो सरकारी कर्मचारी । यह राज्य की संरचना है । इस देश की संरचना और पुनर्संरचना में हमारी मत भिन्नता है । आप कहते हैं कि लोकसेवा फेयर है, तो क्या वजह है कि उसके द्वारा नियुक्त किए गए निकाय में मधेश १० प्रतिशत भी नहीं है ? अगर ६० हजार निजामती कर्मचारी हैं तो उसमें २० प्रतिशत भी मधेशी कर्मचारी नहीं है ? एक लाख अगर सेना है तो उसमें दस हजार भी मधेशी नहीं हैं ? हमारी मत भिन्नता यहीं है । यह है इस देश की संरचना जहाँ देश का एक पक्ष कहीं नहीं है । आज जिस नियम के तहत देश चल रहा है हम उसमें बदलाव चाहते हैं । हो सकता है कि यह नियम सही हो किन्तु यह हमारे अनुकूल नहीं है, इसलिए हमें मंजूर नहीं है ।
मैं एक उदाहरण देना चाहता हूँ मधेश के सन्दर्भ में । एक समय था जब मधेश का एक जिला सप्तरी हर मायने में और विशेषकर शिक्षा के मायने में सबसे अधिक समृद्ध था । किन्तु आज का तथ्यांक ये है कि देश के दस कम साक्षर वाले जो जिला हैं, जिनमें से छः जो मधेश में है उसमें से एक सप्तरी भी है । यह कैसी विडम्बना है ? कल तक जो शिक्षा के नाम पर जाना जाता था आज वो कम साक्षर वाले जिला के रूप में जाना जा रहा है । यह कोई जेनेटिक समस्या नहीं है यह सरकारी नीति का उदाहरण है । यहीं हमारी मतभिन्नता है । काठमान्डू कहता है कि एक भाषा, एक वेश सभी नेपाली सभी समान किन्तु, जी नहीं हम अलग हैं, हमारी पहचान अलग है । हमारा शोषण किया गया है, हमारे इतिहास का दमन किया गया है । इसे वो मानते नहीं हैं, इसलिए हमारी मतभिन्नता है ।

जहाँ तक संविधान निर्माण की बात है तो इनमें पाँच मुद्दों पर विभेद सामने आ रहा है । संघीयता में सीमांकन का मुद्दा, निर्वाचन प्रणाली, शासकीय स्वरूप, न्याय प्रणाली और नागरिकता का सवाल । आज तक जो निर्वाचन प्रणाली का गठन होता आया या फिर उसके द्वारा जो संचालित होता आया है वह पक्षपातपूर्ण है । बात फिर वही आती है कि उसमें हम कहीं नहीं हैं । शासन प्रशासन बनाता है और अपने अनुकूल काम करता है । हम शासन में ही नहीं हैं तो प्रशासन हमारे अनुकूल कैसे होगा ? इसलिए निर्वाचन प्रणाली में सुधार की मांग है । सब संख्या का खेल है । शासकीय स्वरूप में परिवर्तन की अपेक्षा है । मधेश से पहाड़ी जीतता है, पर आज तक पहाड़ से कोई मधेशी नहीं जीत पाया है । हमारे बीच मनोवैज्ञानिक अन्तर है इसको सरकार को समझना होगा । संघीयता के विषय में भी जो विवाद दिख रहा है वह भी विवादित है । सामने जो दिख रहा है उससे यह स्पष्ट रूप से सामने आ रहा है कि मधेश को कमजोर करना । मधेश को पहाड़ से जोड़ने का तात्पर्य क्या ? सत्तापक्ष इसमें भी अपने स्वार्थ को ही सामने रख रहा है । और अब शोषण की नीति मानने की अवस्था नहीं है । जहाँ तक आन्दोलन का सवाल है, तो आज आन्दोलन को लेकर कोई उत्साह नहीं है । आन्दोलन नेतृत्व, संगठन और एजेन्डा से होता है परन्तु मधेश संगठित नहीं हो पाया । नेतृत्व असफल होता है तो आन्दोलन भी कमजोर हो जाता है । एक ही नेता कई बार आन्दोलन कर रहे हैं और एजेन्डा वही पुराना है ऐसे में आज कोई उत्साह नजर नहीं आ रहा है । क्योंकि क्रांति भावना के सहयोग से होती है, राजनीति चुनाव से होता है और इसका निर्धारण संख्या करती है । किसी भी क्रांति के लिए जो क्रोध की आवश्यकता है वो आज कम हो गयी है । इसलिए आज समस्या का समाधान संविधान सभा से ही होने वाला है और इसे सभी को समझना होगा ।

