Sat. Jul 4th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

दो वादों (मधेसवाद और खसवाद) के द्वंद्व में उलझा नेपाल: 

 

काठमान्डू

राजनीतिक दलों की आंतरिक संरचना, पहचान की राजनीति और राष्ट्रीय एकीकरण की चुनौती:
नेपाल का आधुनिक राजनीतिक इतिहास केवल लोकतंत्र, राजतंत्र और गणतंत्र के बीच का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह विभिन्न जातीय, भाषाई, क्षेत्रीय और सांस्कृतिक पहचानों के बीच शक्ति-संतुलन स्थापित करने की निरंतर प्रक्रिया भी है। आज जब राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के आंतरिक चुनावों और नेतृत्व चयन की प्रक्रिया पर चर्चा होती है, तब एक प्रश्न बार-बार उठता है-क्या नेपाल की राजनीति वास्तव में वैचारिक है, या अब भी “अपना” और “पराया” की मनोवैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक सीमाओं में कैद है?
हाल ही में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों, विशेषकर राष्ट्रीय स्तर पर स्वयं को वैकल्पिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करने वाले दलों के आंतरिक नेतृत्व चयन और महाधिवेशन प्रक्रियाओं ने इस बहस को पुनः जीवित कर दिया है। विभिन्न दलों के भीतर नेतृत्व चयन में क्षेत्रीय, जातीय और सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्नों ने यह संकेत दिया है कि नेपाल अभी भी दो व्यापक वैचारिक-राजनीतिक प्रवृत्तियों-मधेसवाद और खसवाद-के बीच संतुलन खोजने के संघर्ष में है।
नेपाल निर्माण और खस राज्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
नेपाल का आधुनिक राज्य निर्माण अठारहवीं शताब्दी में हुआ, जब पृथ्वीनारायण शाह ने विभिन्न राज्यों को एकीकृत कर आधुनिक नेपाल की नींव रखी। यद्यपि उनका राष्ट्र निर्माण अभियान ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था, लेकिन प्रशासनिक, सैन्य और राजनीतिक शक्ति संरचना पर मुख्यतः पहाड़ी खस-आर्य समुदाय का प्रभुत्व स्थापित हुआ।
एकीकरण के बाद से लेकर राणा शासन, पंचायत व्यवस्था और बहुदलीय लोकतंत्र तक, राज्य की प्रमुख संस्थाओं-सेना, प्रशासन, न्यायपालिका और राजनीति-में पहाड़ी अभिजात वर्ग का वर्चस्व बना रहा। इसे कई विद्वान “खस प्रभुत्ववादी राज्य संरचना” के रूप में परिभाषित करते हैं।
यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि “खसवाद” किसी जाति विशेष के विरुद्ध अवधारणा नहीं है, बल्कि वह राजनीतिक-सांस्कृतिक संरचना है जिसमें राज्यसत्ता पर एक विशेष ऐतिहासिक समूह का असमान प्रभाव बना रहा।
“मधेस की ऐतिहासिक उपेक्षा और मधेसवाद का उदय”
दूसरी ओर, तराई-मधेस क्षेत्र, जो नेपाल की अर्थव्यवस्था, कृषि और व्यापार का महत्वपूर्ण आधार रहा है, लंबे समय तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक भागीदारी और सांस्कृतिक सम्मान के प्रश्नों से जूझता रहा। 1950 के दशक से लेकर 1990 के लोकतांत्रिक परिवर्तन और फिर 2006 के जनआन्दोलन के बाद, मधेस में राजनीतिक चेतना का नया उभार देखने को मिला। विशेष रूप से 2007 का मधेस आन्दोलन नेपाल के राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
मधेस आन्दोलन ने केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग नहीं की, बल्कि राज्य की उस संरचना को चुनौती दी, जो दशकों से केंद्रीकृत और पहाड़ी प्रभुत्व वाली मानी जाती थी। इसके परिणामस्वरूप संविधान सभा में समावेशी प्रतिनिधित्व, संघीयता और समानुपातिक व्यवस्था जैसे मुद्दे प्रमुख बने।
“लोकतंत्र के बाद भी पहचान की राजनीति क्यों?”
बहुदलीय लोकतंत्र, गणतंत्र और संघीय व्यवस्था की स्थापना के बाद अपेक्षा थी कि नेपाल की राजनीति पहचान-आधारित ध्रुवीकरण से आगे बढ़कर नीति, कार्यक्रम और विचारधारा पर आधारित होगी। लेकिन वास्तविकता अधिक जटिल दिखाई देती है। आज अधिकांश राजनीतिक दल सार्वजनिक रूप से समावेशिता और समानता की बात करते हैं, लेकिन आंतरिक नेतृत्व चयन में अक्सर निम्नलिखित प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं:- क्षेत्रीय पहचान का प्रभाव, जातीय एवं सांस्कृतिक निकटता, राजनीतिक नेटवर्क और शक्ति समूह, “अपना” और “पराया” की अवचेतन मनोवृत्ति।
जब किसी राष्ट्रीय दल में मधेस मूल के नेता की हार या पहाड़ी समुदाय के नेता की सफलता को केवल योग्यता के बजाय पहचान की दृष्टि से देखा जाता है, तो यह संकेत देता है कि नेपाल का लोकतंत्र अभी भी सामाजिक मनोविज्ञान के स्तर पर पूर्ण रूप से समावेशी नहीं बन पाया है।
*क्या, यह केवल एक दल की समस्या है? *
यह प्रश्न केवल किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। नेपाल के लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों का इतिहास देखें, तो पाएंगे कि नेतृत्व संरचनाओं में क्षेत्रीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व का असंतुलन समय-समय पर विवाद का विषय रहा है। चाहे वह पारंपरिक दल हों, वामपंथी दल हों या स्वयं को वैकल्पिक राजनीति का वाहक कहने वाले नए दल-सभी को इस प्रश्न का सामना करना पड़ा है कि क्या उनके संगठनात्मक ढाँचे वास्तव में नेपाल की सामाजिक विविधता को प्रतिबिम्बित करते हैं?
विडंबना यह है कि एक दल के समर्थक दूसरे दल पर प्रतिनिधित्व की कमी का आरोप लगाते हैं, लेकिन अपनी पार्टी की संरचनात्मक कमजोरियों पर उतनी स्पष्टता से चर्चा नहीं करते।
*इतिहास से सीख: श्रीलंका और भारत का अनुभव:*
नेपाल का यह संकट अद्वितीय नहीं है।
श्रीलंका में सिंहली और तमिल पहचान की राजनीति ने दशकों तक गृहयुद्ध को जन्म दिया। बहुसंख्यक प्रभुत्व और अल्पसंख्यक असुरक्षा के बीच संतुलन न बना पाने की कीमत पूरे राष्ट्र को चुकानी पड़ी। दूसरी ओर, भारत ने भी भाषा, जाति और क्षेत्रीय पहचानों के बीच अनेक संघर्षों का सामना किया। किंतु संघीय ढाँचे, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा के माध्यम से विभिन्न पहचानों को राष्ट्रीय ढाँचे में समाहित करने का प्रयास किया गया।
नेपाल के लिए भी यही चुनौती है:- पहचान को नकारना नहीं, बल्कि उसे राष्ट्रीय एकता के व्यापक ढाँचे में समाहित करना।
मधेसवाद बनाम खसवाद: वास्तविक संघर्ष या राजनीतिक आख्यान?
वास्तविकता यह है कि नेपाल का संघर्ष केवल “मधेस बनाम पहाड़” का नहीं है। यह संघर्ष चार स्तरों पर चल रहा है—
1. ऐतिहासिक प्रतिनिधित्व बनाम वर्तमान समावेशिता का संघर्ष,
2. पहचान आधारित राजनीति बनाम नागरिक राष्ट्रवाद का संघर्ष,
3. सांस्कृतिक असुरक्षा बनाम लोकतांत्रिक साझेदारी का संघर्ष।
4. संविधान संशोधन बनाम संख्यानुपातिक प्रतिनिधित्व का संघर्ष।
ध्यान रहे! यदि मधेसवाद केवल पहचान की राजनीति तक सीमित रह जाए और राष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित न करे, तो वह संकीर्ण क्षेत्रीयता में बदल सकता है। इसी प्रकार यदि खसवाद ऐतिहासिक प्रभुत्व को ही राष्ट्रीयता का पर्याय मानता रहे, तो वह लोकतांत्रिक समावेशिता के सिद्धांत के विपरीत होगा। जिसका परिणाम दुखद हो सकता है।
*नेपाल को किस दिशा में जाना चाहिए?
नेपाल को न तो खस प्रभुत्ववादी उग्रराष्ट्रवाद की आवश्यकता है और न ही संकीर्ण पहचानवादी क्षेत्रीय राजनीति की। उसे एक ऐसे समावेशी नेपाली राष्ट्रवाद की आवश्यकता है, जिसमें-
पहचान का सम्मान हो, योग्यता का मूल्यांकन हो, संख्यानुसार प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो और नागरिकता सर्वोच्च राजनीतिक आधार बने।
राजनीतिक दलों को भी अपने संगठनात्मक ढाँचे में आत्मालोचना करनी होगी। केवल संविधान में समावेशिता लिख देने से समावेशी राजनीति स्थापित नहीं होती; इसके लिए नेतृत्व चयन, निर्णय प्रक्रिया और राजनीतिक संस्कृति में वास्तविक एवं व्यावहारिक परिवर्तन आवश्यक है।
निष्कर्ष
नेपाल आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। यदि राजनीतिक दल आंतरिक लोकतंत्र और समावेशिता को केवल नारों तक सीमित रखेंगे, तो “अपना” और “पराया” का मनोविज्ञान और गहरा होगा। जिसका सीधा लाभ तीसरा वर्ग उठाने के लिए सक्रिय है। लेकिन यदि वे नेपाल की बहुलतावादी वास्तविकता को स्वीकार करते हुए साझा राष्ट्रीय पहचान का निर्माण करेंगे, तो मधेसवाद और खसवाद का द्वंद्व सहयोग और सहअस्तित्व में परिवर्तित हो सकता है। और यही परिवर्तन नेपाल के सुनहरा भविष्य को निर्माण करेगा। अंततः, प्रश्न यह नहीं है कि नेपाल मधेस का है या खसों का; प्रश्न यह है कि क्या नेपाल अपने सभी नागरिकों का समान रूप से अपना बन पाएगा? यही इक्कीसवीं सदी के नेपाली लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा है। चुनौती भी है। ध्यान रहे! इस चुनौती को राजनीति कर्मी से समाधान की अपेक्षा न रखें। नेताओं का लक्ष्य सत्ता प्राप्ति होती है। उनकी सफलता हर हाल में सत्तासीन होने में है। समस्याओं को और अधिक जटिल कर युवाओं को उस जलती हुई समस्या रूपी भट्ठी में झोंककर अपने लिए जन समर्थन जुटाना है। सामान्य मनोविज्ञान के अनुसार सामाजिक या राजनैतिक समस्याओं को समाधान करने से जनाकर्षण भी समाप्त हो जाता है। अतः इस पुनीत कार्य के लिए लेखकों, विचारकों, विद्वानों और शिक्षकों को सक्रिय होना होगा। धन्यवाद!
विद्यावाचस्पति अजयकुमार झा

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *