क्या लोकतन्त्र की बाध्यता है, डा. के.सी का अनशन ? :रमेश झा
लोकतन्त्र प्राप्ति के बाद किसी समय जनता के होठों से यही वाक्य उच्चरित होता रहता था कि अब देश में भ्रष्टाचार हत्या, अपराध मुक्त समाज का निर्माण होगा और माफिया मुक्त स्वास्थ्य शिक्षा क्षेत्र होगा । राजनीतिक संक्रमणकाल के अन्त होने के बाद राष्ट्र समृद्धि की ओर बढेÞगा पर हुआ उल्टा । गणतान्त्रिक लोकतन्त्र आने के बाद राष्ट्र माफिया तन्त्र में फंसकर रह गया है । माफियाकरण राष्ट्र के स्वरुप को ही कुरुप कर दिया है । शिक्षा–स्वास्थ्य क्षेत्र तो व्याप्त माफियाकरण के कारण इस प्रकार दुश्चक्र में फंसकर रह गया है, जिससे निकलना दुरुह हो गया है । विश्वविद्यालय से लेकर कॉलेज आदि सभी शिक्षा क्षेत्र के प्रमुख लोग भागबण्डा को प्रमुख आधार बनाकर आगे बढने को अपनी नियति बना चुके हैं । भागबण्डा के आधार पर आगे बढने वाला लोकतन्त्र से आज की चेतनशील पीढ़ी चिन्तित है । यदि भागबण्डा के ही आधार पर देश को आगे बढ़ाना लोकतान्त्रिक लक्ष्य था तो पंचायती शासन या राजतन्त्र को क्यों कसुरदार आजतक ठहराया जा रहा है ?

आज के लोकतान्त्रिक परिवेश में दलगत भागवण्डा को दरकिनार कर इमानदार विषयगत या क्षेत्रगत विज्ञता के आधार पर व्यक्ति को चयनित कर उच्च पदों पर नियुक्त करना चाहिये था, पर ऐसा हो न सका । जिससे देश में चारों ओर निराशा ही निराशा व्याप्त है । विश्वविद्यालय के भीसी, रेक्टर, रजिष्ट्रार आदि की नियुक्ति पार्टी के झण्डा उठाने के आधार पर जो हो रहा है उससे कभी देश का विकास नही होने वाला है । इसी तरह की नियुक्ति ने मेडिकल माफिया को जन्म दिया है और इसी कारण सृजन डा. गोविन्द केसी को पांचवी बार आमरण अनशन पर बैठने को बाध्य किया है ।
प्रधानमन्त्री कोइराला द्वारा चिठ्ठी प्रेषित करने के बाद डा. केसी ने सार्क के समय होने वाले अपने आमरण अनशन को स्थगित किया था । प्रम की चिठ्ठी में लिखा गया था कि प्रक्रिया में रहने वाले मेडिकल कॉलेजों का सम्बन्धन तत्काल स्थगित किया जाएगा । राष्ट्रीय चिकित्सा तथा स्वास्थ शिक्षा नीति उच्चस्तरीय समितिद्वारा नीति बनाने के बाद मनमोहन मेमोरियल, पिपुल्स डेण्टल, काठमाडौँ नेशनल मेडिकल तथा नेपाल प्रहरी मेडिकल इन चारों को सम्बन्धन प्रक्रिया कानुन के मुताबिक सम्बन्धन दिया जाय । इसी आधार पर पांचवी बार आमरण अनशन पर डा. केसी बैठने का निर्णय लिया । प्रधानमन्त्री, शिक्षामन्त्री ने त्रि.वि.वि. एवं विश्वविद्यालय चिकित्सा शास्त्र अध्ययन संस्थान(आईओएम)को निर्देशन देने के बाद गुरुबार विभागीय बोर्ड की बैठक ने सम्बन्धन नहीं देने का निर्णय किया पर फिर केसी अनशन करने की तैयारी में है क्यों ? उनका कहना है कि मेरी मांग बैठक के निर्णय में सीमित नहीं है । उनका कहना है कि विभागीय बोर्ड का निर्णय आंशिक अंश को ही सम्बोधन किया है । मंैने कहा था प्रधानमन्त्री के साथ–साथ न्यायालय अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग के प्रमुखों के उपर भी कारबाई हो । पांचवी विन्दु में मैंने मांग किया है कि सहमति उल्लंघन करने वाले शिक्षामन्त्री पर भी कारबाई की जाय । उनका यह भी कहना है कि मेडिकल कांउसिल और आईओएमद्वारा लिये जाने वाले विशुद्ध प्राविधिक निर्णयों में अदालत द्वारा बार–बार अविचारित या अवांछित हस्तक्षेप करते हुए गुणस्तरहीन कॉलोजों में सीट नहीं घटाने का निर्णय करना, प्रवेश परीक्षा में नहीं बैठने वाले विद्यार्थी तथा अनुत्तीर्ण विद्यार्थी को भी पढ़ने देने का निर्णय देकर निरपेक्ष दण्डहीनता की स्थिति की सृजन की गई है । ऐसे निर्णय के सन्दर्भ में जाँच पड़ताल कर कारबाई हो यही मेरी दूसरी मांग है । इस प्रकार राज्य का संवेदनशील क्षेत्र, स्वास्थ्य–शिक्षा, मेडिकल कॉलेज आदि माफिया के दुश्चक्र में फंसता जा रहा है । इस कारण मुझे यह मांग करना पड़ रहा है ।
उक्त चार मेडिकल कॉलेजों को सम्बन्धन दिलाने के लिए प्रमुख पार्टियों के शीर्षस्थ नेताओं के दबाब एवं डा. केसीद्वारा किसी भी स्थिति में सम्बन्धन नहीं देने के दबाब के बीच डा. के.सी. का आमरण अनशन पांचवीं बार ग्यारह दिन से चल रहा है । डा. के.सी. के समर्थन में सम्पूर्ण चिकित्सा क्षेत्र तथा सम्पूर्ण नागरिक समाज की ऐक्यबद्धता की लहर जोर पकड़ चुकी है । इस स्थिति में भी सरकार की दृष्टि इस ओर क्यों नहीं जा रही है यही चिन्ता का विषय है । ऐसी अवस्था में निश्चय ही कहा जा सकता है कि सरकारी दृष्टि मेडिकल माफिया की आर्थिक गिद्ध दृष्टि को ही गतिशील बनाने में सहयोग दे रही है । क्योंकि सम्बन्धन के पक्ष में सरकार एमाले पार्टी के शीर्षस्थ पंक्ति के नेतागण साम–दाम–भेद–नीति को अपनाते हुए जोड़ तोड़ में संलग्न है । प्रम कोइराला की स्थिति लाचार, निरीह एवं संवेदनहीन बनी हुई है । इसका दुष्परिणाम क्या होगा समय बताएगा । लेकिन आज की अवस्था में स्वास्थ्य सेवा प्राप्त होने से वंचित मरीजों की मानसिक अवस्था किस स्थिति से गुजर रही होगी अकल्पनीय है । फिर भी वत्र्तमान सरकार कुम्भकरणीय अवस्था में सोई हुई है । इसे कौन सी संवेदन शुन्यता की संज्ञा दी जाय ? जनप्रतिनिधि गण देश को समृद्ध बनाने के बदले अपने–अपने पक्ष के निजी मेडिकल कॉलेजों को संबंधन दिलाने के लिए दबाव सृर्जना करना कहाँ तक न्यायोचित है ?
डा. केसी का द िसूत्रीय मांग होने पर भी मुख्य मांग चिकित्सा शिक्षा नीति निर्माण नहीं होने तक नये मेडिकल कॉलेजों का सम्बन्धन नही देने का है । इस के अतिरिक्त चिकित्सा विश्वविद्यालय सम्भाव्यता अध्ययन समिति और चिकित्सा शिक्षा राष्ट्रीय मापदण्ड निर्धारण समिति द्वारा प्रदत प्रतिवेदन तत्काल कार्यान्वित करने की मांग मुख्य है । विगत में हुए समझौते को यदि सरकार ईमानदारी पूर्वक लागू करती है तो केसी की वर्तमान अनशन समस्या समाधान हो सकती है । इस सन्दर्भ में प्रधानमन्त्री सुशील कोइराला को चाहिये कि प्रधानमन्त्री के उच्च पदीय दायित्व को निर्वाह करते हुए दूरदर्शी नेता बनकर हस्तक्षेप करें और इमानदार योग्य भ्रष्टाचार विरोधी व्यक्ति डा. केसी की आत्मिक इच्छा को पूरा करने के लिए आगे बढ़ें । इसी में लोकतान्त्रिक नेपाल राष्ट्र का कल्याण और प्रम की गरिमापूर्ण पदीय महत्ता संरक्षित होगा ।

