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फ़िल्म रिव्यू : ‘मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ’

 

मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ

निदेशक: शोनाली बोस

कलाकार: कल्कि केकलां, रेवती150417165458_kalki_in_margarita_624x351_viacom18 150417170052_kalki_koechlin_margarita_624x351_viacom18

रेटिंग: ***

एक अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म उत्सव के ज्यूरी के जिन सदस्यों ने कल्कि केकलां को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार के लिए चुना था, उन्हें लगा था कि सेरीब्रल पैल्सी से पीड़ित किसी लड़की ने यह किरदार किया है.

इससे पता चलता है कि ‘मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ’ में लायला नाम की विकलांग लड़की का कितना ज़बरदस्त अभिनय कल्कि ने किया है.

बेहतरीन अभिनय

अभिनय की ही बात करें तो रेवती ने भी माँ के क़िरदार में ग़ज़ब का काम किया है.

लायला का क़िरदार दक्षिण मुंबई में रहने वाली असल क़िरदार मालिनी चिब के जीवन पर आधारित है. फ़िल्म देखकर लगता है कि शोध कारगर रहा है.

यदि अभिनय संवेदनशील हो तो इस तरह की भूमिका कई बार पुरस्कार जीतने के मक़सद से भी गढ़ी जाती है. इसमे कोई संदेह नहीं कि इसमें अभिनय वाक़ई जीवंत है.

मिसाल के लिए प्रतिस्पर्द्धा के बावजूद ‘द थ्योरी ऑफ़ एवरीथिंग’ के स्टीफ़न हॉकिंग के लिए एडी रेडमायन को ऑस्कर मिलना तय था.

ख़ैर फ़िल्म की बात करें तो लायला ने जब जीवन में पहली बार, बार में शराब पी थी, वहीं से फ़िल्म का नाम लिया गया है, ‘मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ.’

सेक्स की इच्छा

लायला को स्ट्रॉ की ज़रूरत इसलिए है कि सेरीब्रल पैल्सी में मोटर न्यूरॉन काम नहीं करते, जबकि व्यक्ति का दिमाग़ पूरी तरह सामान्य होता है. वह अच्छी गीतकार है.

सामान्य मस्तिष्क में सेक्स की इच्छा समेत सभी तरह की प्राकृतिक क्रियाएं चलती रहती हैं.

पहली बार सेक्स के प्रति आकर्षण पर इंकार मिलने का काफ़ी गहर असर लायला के ज़हन पर पड़ता है.

हालांकि लगता है कि उस दृश्य को बहुत तुरत फुरत निपटा दिया गया है. मुझे लगता है कि सेंसर बोर्ड का इससे कुछ लेना देना है.

लायला को अच्छा लगने वाला पहला शख़्स एक असमिया लड़का था. लायला के पिता सिख हैं और माँ दक्षिण भारतीय. बाद में वो जब न्यूयॉर्क चली जाती है तो पाकिस्तानी और बांग्लादेशी मां बाप की नेत्रहीन लड़की के नज़दीक आती है.

तब लायला को अपने समलैंगिक होने का पता चला. क़िरदारों के इस घालमेल से ही आप बता सकते हैं कि कास्टिंग कितनी दिलचस्प है.

मुख्य क़िरदार के किसी भी तरह से विकलांग होने पर ज़्यादातर लोग उसमें दिलचस्पी यह सोच कर नहीं लेते कि वह निहायत ही दुख भरा होगा. अगर इस फ़िल्म को किसी कैटगरी में रखा ही जाना हो तो इसे एलजीबीटी फ़िल्मों की श्रेणी मे रख सकते हैं.

मुझे एक बार समलैंगिक विषयों पर बनी फ़िल्मों के उत्सव में जज बनने का मौक़ा मिला. मैं चक्कर में पड़ गया था कि कोई व्यक्ति एक हफ़्ते में इस तरह की आख़िर कितनी फ़िल्में देख सकता है.

लेकिन मुझे मज़ा आया. उस फ़िल्मोत्सव में फ़िल्में वैसी ही थीं जैसी किसी और उत्सव में होती हैं.

दरअसल, कोई आदमी सौ फ़ीसदी समलैंगिक, लेस्बियन या हेटरोसेक्सुअल, विकलांग या मानसिक रोगी नहीं होता है कि उनका पूरा जीवन इसी के इर्द गिर्द घूमता रहे.

अंततः जीवन उन्हीं भावनाओं के इर्द गिर्द घूमता है जो जज़्बात किसी भी सामान्य व्यक्ति में होते हैं.

‘मार्गरीटा विद अ स्ट्रॉ’ के साथ भी ऐसा ही है. हां इसमें काफ़ी अवसाद है. पर खुशी भी कम नहीं है.

फ़िल्म के अंत में आप भी मार्गरीटा के साथ जाना चाहेंगे, एक ड्रिंक के लिए. अब इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि वह स्ट्रॉ से शराब पीती है?

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