दलित साहित्यकार ओम प्रकाश वाल्मीकि की जयंती मनायी गयी

जनकपुरधाम/मिश्री लाल मधुकर 31 जून को सुप्रसिद्ध दलित साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की जयंती के अवसर पर विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग में विभागाध्यक्ष प्रो.उमेश कुमार की अध्यक्षता में संगोष्ठी हुई। कार्यक्रम की शुरुआत ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की तस्वीर पर पुष्पांजलि से हुई।
अध्यक्षीय उद्बोधन में विभागाध्यक्ष प्रो.उमेश कुमार ने कहा कि दलित साहित्य ने ही हिन्दी साहित्य में सबसे पहले यथार्थवाद को साकार किया है। ओमप्रकाश वाल्मीकि या अन्य दलित साहित्यकारों की रचनाओं में सामाजिक यथार्थ का सबसे प्रामाणिक चित्रण देखने को मिलता है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की आत्मकथा ‘जूठन’ है। यह आत्मकथा भारतीय समाज के विभत्स यथार्थ को बेहद प्रामाणिकता से अभिव्यक्त करती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की विशिष्टता कही जाएगी कि वे दलित जीवन के सांस्कृतिक पक्ष को कभी अनदेखा नहीं करते। समझना होगा कि दलित वर्ग के सांस्कृतिक पक्ष की उपेक्षा कर हम वंचित वर्ग के यथार्थ को पूर्णता में समझ ही नहीं सकते बल्कि उनके सांस्कृतिक पक्ष की उपेक्षा करने वाला साहित्य भी मुकम्मल नहीं होगा। दलित साहित्य महज सिलेबस और परीक्षाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह सुंदर और स्वस्थ जीवन दृष्टि हेतु हम सबके लिए जरूरी है। समतामूलक समाज के निर्माण में दलित साहित्य की भूमिका को देखते हुए यह कहना पड़ता है कि साहित्य में अंबेडकरवाद भी एक नितांत आवश्यक आलोचना दृष्टि प्रदान करता है।
वहीं विभागीय सह प्राचार्य डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने कहा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि जी सिर्फ कवि, कहानीकार और चिंतक नहीं हैं बल्कि इस देश के सदियों से सताए हुए जो लोग हैं, उनकी आवाज हैं। उनके सदियों के संताप और मुक्ति की आकांक्षा के चितेरे हैं ओमप्रकाश वाल्मीकि।
बहिष्कृत समाज को केवल समाज से ही बाहर नहीं रखा गया बल्कि साहित्य, संस्कृति और भाषा के क्षेत्र से भी उन्हें वर्जित रखा गया है। हिन्दी साहित्य के अंदर अम्बेडकरवाद के रूप में एक ‘वाद’ अवश्य होना चाहिए। इसे केवल दलित विमर्श या दलित साहित्य कह कर चलता कर देने की प्रवृत्ति से निजात पानी होगी। यह समूची विश्व दृष्टि (वर्ल्ड व्यू) का प्रश्न है। ओमप्रकाश वाल्मीकी की बहुत सारी रचनाएं हैं, उनकी आलोचना करते हुए प्रायः दलित पात्रों को दया का पात्र ठहरा दिया जाता है, यह दलित रचनाओं का असंगत पाठ है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की रचनाओं में जो प्रतिरोध है, उसे समझना होगा। वह अंबकेडरवाद की सुचिंतित वैचारिकी पर आधारित प्रतिरोध है। जिस प्रकार अम्बेडकर ने भारतीय समाज के दो सबसे बड़े रोग के रूप में ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद को चिह्नित किया था, ओमप्रकाश वाल्मीकि जी उसी को आत्मसात करते हैं। उनकी रचनाएं इसका साक्ष्य हैं। जबतक आप ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद से नहीं लड़ेंगे तब तक सदियों के संताप से नहीं निकल सकते। उनकी सुप्रसिद्ध कविता ‘ठाकुर का कुंआ’ में कौन से कारक नजर आते हैं सामाजिक–आर्थिक असमानता के? वही कारक हैं, जिन्हें अम्बेडकर ने पहचाना। ओमप्रकाश वाल्मीकि भलीभांति जानते हैं कि इस देश के वास्तविक सर्वहारा कौन हैं, जिनके नेतृत्व में वर्चस्वशाली सत्ता को ध्वस्त करने के लिए निर्णयकारी संघर्ष होगा। इसलिए उनके रचना–संसार का नायक वही सर्वहारा दलित वर्ग है।
स्वागत भाषण में विभागीय सह–प्राचार्य डॉ. आनन्द प्रकाश गुप्ता ने कहा कि ओमप्रकाश जी ने करोड़ों शोषितों की पीड़ा को वाणी दिया। वे उत्पीड़ित वर्ग के सबसे प्रामाणिक स्वर थे। कहना न होगा, समकालीन हिन्दी साहित्य विमर्शों से लबरेज है। विमर्श सतत चलने वाली प्रक्रिया है। जिन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया है उन्हें मुख्यधारा में लाना इसका उद्देश्य है। दलित विमर्श के माध्यम से ओमप्रकाश वाल्मीकि हाशियाकृत समाज की वंचना और शोषण को व्याख्यायित करते हुए उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहे। आज समाज की जो दशा और दिशा है, उसमें ओमप्रकाश वाल्मीकि की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। आज भी दलित वर्ग अमानवीय स्थितियों में जीवनयापन करने के लिए विवश है, तमाम तरह की बर्बरताओं के वे शिकार बनाए जा रहे हैं। ऐसे में ओमप्रकाश जी जैसे प्रतिरोधी चेतना के क्रांतिकारी कवि की सामाजिक–साहित्यिक जरूरत अप्रश्नेय है।
विभागीय सहायक प्राचार्या डॉ.मंजरी खरे ने कहा कि ओमप्रकाश वाल्मीकि जी ने साहित्यिक जगत में नई लकीर खींची है। उनका जीवन बहुत ही संघर्षमय रहा है। वे स्वयं को सबसे पहले मनुष्य मानते हैं और अपनी तमाम रचनाओं से मनुष्यता को पहचानने का संदेश देते हैं। उन्होंने दलित वर्ग के आर्थिक उत्थान के साथ–साथ सामाजिक न्याय पर विशेष बल दिया है। सामाजिक न्याय में दलितों के शोषण का मानसिक पक्ष भी आता है। दलितों को नजाने कितनी तरह की मानसिक प्रताड़नाओं से गुजरना पड़ता है। उनके अच्छे नाम नहीं होते, उन्हें रे, बे, तुम–ताम कहकर पुकारा जाता था। मानसिक प्रताड़ना की भीषणता को इससे समझना चाहिए कि जिन चूहों को लोग प्रायः ढूंढ–ढूंढ कर मारते हैं अपने घरों में, उन पर उनकी जातियों के नाम रखे गए। यह जो आतंक और हिंसा का वर्चस्ववादी सामाजिकरण है, इसपर सवाल उठाए जाने की जरूरत है। ओमप्रकाश वाल्मीकि अपने लेखन से बखूबी यह कार्य करते हैं। जो गंगा ब्राह्मणों को पवित्र कर सकती है, वह दलितों को क्यों पवित्र नहीं कर पाती? ऐसे कठिन प्रश्नों के साथ ओमप्रकाश वाल्मीकि हमारे सामने आते हैं।ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी रचनाओं के माध्यम से दलित समाज में व्याप्त पितृसत्ता और आंतरिक भेदभाव को भी प्रश्नांकित किया है। इसमें कोई दोमत नहीं कि वे व्यापक सरोकारों के बड़े रचनाकार हैं।
कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी कंचन रजक ने तथा ध्यानवादज्ञापन शोधार्थी समीर ने किया।
मौके पर शोधार्थी रोहित कुमार, सुभद्रा कुमारी, अमित कुमार, बबीता कुमारी, अंशु कुमारी, जयप्रकाश कुमार, पुष्पा कुमारी तथा स्नातकोत्तर छात्र राजवीर पासवान, धीरज कुमार आदि ने भी अपनी बातें रखीं। संगोष्ठी में बड़ी संख्या में छात्र–छात्राएं उपस्थित थे।


