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भारत की राज्यसभा में नामांकन की शुचिता – नेपाल को मिलने वाला लोकतांत्रिक संदेश : जयप्रकाश आनन्द

 

 जयप्रकाश आनन्द,भारत के राष्ट्रपति ने हाल ही में चार प्रतिष्ठित व्यक्तियों को उच्च सदन यानी राज्यसभा के लिए नामित किया है। यह प्रक्रिया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत होती है, जिसमें राष्ट्रपति को कला, साहित्य, विज्ञान एवं सामाजिक सेवा के क्षेत्र में विशेष योग्यता रखने वाले व्यक्तियों को नामित करने का अधिकार होता है।

आज जब भारत की केंद्र सरकार, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और केन्द्रीय जांच ब्यूरो जैसे संवैधानिक संस्थानों को प्रभावित करने के आरोपों का सामना कर रही है, ऐसे में राज्यसभा में विपक्ष का दबाव अधिक है। इस राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रपति द्वारा जो चार नामित सदस्य चुने गए हैं, वे केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि एक गंभीर लोकतांत्रिक संदेश देने वाले भी माने जा रहे हैं।

चार नामित सदस्यों का संक्षिप्त परिचय और उनका महत्व:

  1. उज्ज्वल देवराव निकम
    देश के सबसे चर्चित और प्रतिष्ठित सरकारी वकीलों में से एक माने जाने वाले उज्ज्वल निकम ने 1993 मुंबई बम धमाके, गुलशन कुमार हत्या, 26/11 हमला (अजमल कसाब केस), प्रमोद महाजन हत्या और कोपर्डी बलात्कार जैसे मामलों में अभियोजन का नेतृत्व किया है। उन्हें 2016 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। उनकी नियुक्ति न केवल कानूनी विशेषज्ञता का सम्मान है बल्कि न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास की पुनर्पुष्टि भी है।
  2. सी. सदानंदन मास्टर
    केरल के वरिष्ठ समाजसेवी और शिक्षक, जिन्होंने 1994 के एक राजनीतिक हमले में अपने दोनों पैर गंवाने के बावजूद शिक्षा और समाजसेवा को अपना जीवन लक्ष्य बनाया। उनके जैसे व्यक्तित्व को संसद में स्थान देना सामाजिक समावेशिता और नैतिक राजनीति की मिसाल है।
  3. हर्षवर्धन श्रृंगला
    भारत के पूर्व विदेश सचिव और अमेरिका, बांग्लादेश, थाईलैंड में भारत के राजदूत रह चुके श्रृंगला, भारत की रणनीतिक विदेश नीति निर्माण में एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं। G-20 अध्यक्षता के दौरान उन्होंने समन्वयक की भूमिका निभाई। उनकी मौजूदगी विदेश नीति को संसद के विमर्श में लाने में सहायक होगी।
  4. डा. मीनाक्षी जैन
    दिल्ली विश्वविद्यालय की इतिहासकार और शिक्षिका, जिन्हें भारतीय सांस्कृतिक धरोहर पर उनके शोध कार्यों के लिए 2020 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। उनकी नियुक्ति शैक्षणिक गुणवत्ता और सांस्कृतिक विमर्श की प्रतिनिधित्व करती है।
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नेपाल के लिए क्या है संदेश?

नेपाल में भी संसद का उच्च सदन—राष्ट्रिय सभा—है, जिसमें राष्ट्रपति द्वारा मनोनयन की संवैधानिक व्यवस्था है। लेकिन नेपाल में इस प्रक्रिया को लेकर हमेशा विवाद रहा है। बी.स. 2048 (1991) में तत्कालीन राजा वीरेन्द्र द्वारा मनोनीत 10 सदस्य विवाद का कारण बने थे, और तब से आज तक लगभग हर नामांकन विवाद या आलोचना की चपेट में रहा है। न तो कोई निष्पक्ष मापदण्ड तय हुआ है, न ही किसी सरकार ने इसे राजनीतिक लाभ से ऊपर उठाकर देखा है।

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भारत का यह उदाहरण नेपाल के लिए विशेष रूप से राष्ट्रपति पद की गरिमा और स्वतंत्रता का स्मरण कराता है। भारतीय राष्ट्रपति ने जिन व्यक्तियों को नामित किया है, वे किसी पार्टी के प्रचारक नहीं, बल्कि अपने-अपने क्षेत्र में जनसेवा और राष्ट्रीय हित में योगदान देने वाले हैं। यह भारत के लोकतंत्र की परिपक्वता और संवैधानिक मर्यादा की ओर इशारा करता है।

निष्कर्ष:

भारत का यह कदम नेपाल के लिए एक महत्वपूर्ण पाठ है—कि किस प्रकार नामांकन को राजनीतिक भागीदारी का साधन नहीं, बल्कि समाज के विविध पक्षों को प्रतिनिधित्व देने का एक अवसर माना जाए। यदि नेपाल में भी राष्ट्रपति पद राजनीतिक कब्जे से मुक्त होकर स्वतंत्र निर्णय लेने लगे, तो राष्ट्रिय सभा न केवल गरिमामय बनेगी बल्कि संसद का उच्च सदन सचमुच ‘उच्च सोच’ और ‘राष्ट्रहित’ का प्रतिनिधि बन सकेगा।

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जयप्रकाश आनन्द, पूर्व मंत्री,
राजनीतिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार
नेपाल

जयप्रकाश आनन्द
राजनीतिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार
नेपाल

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