कबीले में जीती हुई लाश : वसन्त लोहनी
कबीले में जीती हुई लाश
कबीले में सलाह-मशवरे की परंपरा
कब की टूट चुकी थी।
कभी-कभार कोई आवाज़ गूंजती,
उसे ही ‘छलफल’ कहा जाता।
उसके बाद सरदार का फरमान गरजता,
और पूरा कबीला सन्नाटे में डूब जाता —
जैसे कोई मर गया हो,
और बाकी सब
मौन प्रस्ताव में तब्दील हो गए हों।
आज, कबीले में
दबी-दबी फुसफुसाहट सुनाई दी।
कुत्तों की तरह लड़-झगड़ कर
ताक़त हासिल कर चुके वे लोग
एक-दूजे से चौंक उठे।
अपने ही मन से पूछने लगे —
“क्या यह आवाज़… हमसे ही निकली है?”
क्षणभर चौंकने के बाद
आवाज़ में जान आने लगी।
मन में कुछ-कुछ आ रहा था,
मन से कुछ-कुछ जा रहा था।
जैसे जीवन के लिए
थोड़ी-सी ऑक्सीजन आ रही हो,
और डर —
थोड़ा-थोड़ा कम हो रहा हो।
कबीले की हालत में
यह बदलाव कैसे मुमकिन हुआ?
दासों की तरह नहीं —
जीती हुई लाशों की तरह
अरसे से बैठे इन लोगों में
ऐसा परिवर्तन कैसे आया?
ठंड से कांपते हुए इन लोगों को
सुबह की पहली धूप की तरह —
क्या किसी मालिक से
थोड़ी-सी तपिश
मिलने वाली है ?


