प्रकृति ने गलत नहीं किया, यह उसकी अपनी गति है : श्वेता दीप्ति
बाढ़ की सम्भावनाएँ सामने हैं और नदियों के किनारे घर बने हैं ।
चीड़–वन में आँधियों की बात मत करो, इन दरख्Þतों के बहुत नाजुक तने हैं ।
– दुष्यन्त कुमार

काश इन सम्भावनाओं पर हमारी नजरें समय से पहले चली जाएँ तो कई अनहोनी से हमारी सुरक्षा काफी हद तक हो सकती है । भौगोलिक दृष्टिकोण से पूर्व तय था या फिर तय है कि नेपाल भूकम्पीय जोखिम की दृष्टिकोण से अत्यन्त संवेदनशील है । बार–बार भूगर्भशास्त्रियों की चेतावनी या सलाह की अनदेखी क्यों की जाती रही है, सरकार की ओर से या फिर नागरिकों की ओर से ? प्रकृति पर हमारा वश नहीं है किन्तु अपनी एषणाओं को तो रोक सकते हैं । जिन्दगी की सहज गति को असहज बनाने की जिम्मेदारी हमारी भी तो है । आधुनिकता की दौड़ और विकसित होने के दिखावे में ज्यादा और ज्यादा पाने की चाहत बढ़ती चली जाती है और हम प्रकृति पर दवाब बनाते चले जाते हैं, जिसका प्रतिफल २५ अप्रील को हमने देख लिया । प्रकृति ने गलत नहीं किया यह उसकी अपनी गति है । उसके गर्भ में आग भी है, पानी भी है, खनिज भी है और इससे हम निर्मित होते हैं । पृथ्वी हमें देती है सिर्फ देती है किन्तु हम क्या देते हैं उसे ? यह आज चिन्तन का विषय है मानव जाति के लिए । आज देश ने जिस असहनीय पीड़ा को झेला है उस जख्म को भरने में वर्षों लग जाएँगे । फिर भी यह अपूरणीय क्षति कभी पूरी नहीं होगी हाँ, वक्त की धूल की परतें जरूर इस पर जम जाएँगी किन्तु, जब–जब इन परतों को हटाया जाएगा तो जख्मों के दाग अवश्य नजर आएँगे । ऐसे जख्म कम से कम मिले यह प्रयास हमें ही करना है । अपने लिए और हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए । संचार माध्यम से प्रसारित किया जाता है कि भूकम्प आए तो खुली जगहों पर भागें किन्तु क्या हमने खुली जगहों को छोड़ा है ? आखिर ऐसी विपदा में कहाँ जाएँ, कहाँ भागें ? कंकरीट के इस जंगल में, उसी के तले दबने और मरने की हमारी बाध्यता है ।
कुछ बुरे में भी इंसान अच्छा खोज लेता है और खुद को तसल्ली देता है, यह मानवोचित गुण है । आज हम भी ईश्वर को इस बात के लिए धन्यवाद दे रहे हैं क्योंकि जो हुआ निःसन्देह वह अच्छा नहीं हुआ किन्तु यही दुर्घटना शनिवार की जगह किसी और दिन घटी होती तो आज जो क्षति का आँकड़ा हमारे सामने है, वह कई गुणा अधिक होता । गीता के वचनों को हम आत्मसात् करते हैं और दुख में भी सुख को तलाश कर जीवन को गति प्रदान करते हैं । हम जानते हैं कि यह पल कोई अन्तिम सच नहीं है । समय की धार अनवरत बहती है और उसका हर क्षण एक युग समेटे होता है और हर युग से एक नया युग जन्म लेता है । बीता हुआ कल इतिहास बनता है तो आने वाले कल पर भविष्य की नींव का निर्माण होता है । आज हमें इसी भविष्य को देखना है । जिन्दगी कराह रही है, आँखों में उम्मीद की रोशनी कम होने लगी है । अब उन आँखों में सिर्फ सवाल हैं अपने आने वाले कल के लिए । सरकारी तंत्र व्यस्त है बैठकों में, अर्थमंत्री वक्तव्य दे रहे हैं कि अनुदान की राशि आई नहीं है सिर्फ दातृ देशों ने अनुदान राशि की घोषणा की है, किन्तु जो राहत सामग्री आ चुकी है वह जरूरतमंदों तक क्यों नहीं पहुँच पा रही है ? क्यों राहत सामग्री बेची जा रही हंै ? क्यों दुर्गम क्षेत्र में आज भी जनता भूख से मर रही है ? इन सबका जवाब कौन देगा ? इनकी निगाहें सिर्फ अनुदान राशि पर टिकी हुई हैं पर अन्य व्यवस्थापन पर सरकारी तंत्र का ध्यान क्यों नहीं जा रहा है ? इनकी मानवता आज भी नैतिकता से परे नजर आ रही है । नेपाली जनता धन्यवाद की पात्र है जिसने अपने धैर्य और सहनशीलता का अद्भुत परिचय दिया है । इस विपत्ति की घड़ी में सब एक साथ खड़े रहे और एक दूसरे का मदद किया । नेता हमारे साथ नहीं थे । हम स्वयं एक दूसरे के लिए थे । हमारी सेना, हमारे सशस्त्र प्रहरी, हमारे चिकित्सक, हमारे युवा इन सबकी एक्यबद्धता ने पीडि़त जीवन को सम्भाला और उनका साथ दिया । शुक्रगुजार हैं हम, हमारे मित्र राष्ट्रों के जिन्होंने इस विपदा में हमारा साथ दिया और हमारे साथ आगे भी रहने का आश्वासन दिया है । अगर आशंका है तो अपनों से ही कि, कहीं देश विदेश से मिले सहयोग को ये स्व–केन्द्रीयकृत ना कर दें । आवश्यकता ऐसे निकाय की है जो सहयोग के लिए बढ़े हाथ को सही जगहों तक पहुँचाए । अपने हर स्वार्थ से ऊपर उठकर सरकार को आज अभिभावकत्व की जिम्मेदारी का निर्वाह करना है, ताकि जिन्दगी की आस में जी रही जनता को जीवन का अहसास करा सके ।

