सांस्कृतिक सम्पदा का अनुपम संगम हनुमान ढोका दरबार : गोपाल झा

हनुमान ढोका दरबार प्राचीन, मध्य और आधुनिक नेपाल का ऐसा इतिहास है जिसको छुआ और देखा जा सकता है । बैशाख १२ गते २०७२ शनिवार दिन के ११ः५६ बजे से पहले भूकम्प की जब बात होती थी तब ९० साल का भूकम्प (८.४ रेक्टरर २ मिनट) मापदण्ड था । पर सांस्कृतिक सम्पदाओं के लिए ७.९ रेक्टर और करीब एक मिनट का ७२ साल का भूकम्प ही विनाशकारी सावित हुआ । काठमान्डौ उपत्यका में ही सात क्षेत्र को विश्व सम्पदा सूची में सूचीकृत किया गया है । उसमे काठमान्डौ (बसन्तपुर), पाटन, भक्तपुर दरबार क्षेत्र, श्री पशुपति नाथ क्षेत्र, चाँगुनारायण, स्वयम्भु और बौद्ध सूचीकृत किए गए हैं । इन सात क्षेत्रों में बसन्तपुर दरबार क्षेत्र ही एक ऐसी सम्पदा है जिसको देखकर सर्व साधारण नेपाल का सम्पूर्ण इतिहास समझ सकते हैं । इस भूकम्प ने नब्बे प्रतिशत सम्पदाओं को क्षत–विक्षत कर दिया है । कला, वास्तुकला एवं इतिहास के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बसन्तपुर दरबार क्षेत्र ने विश्व समुदाय का ध्यानाकर्षण किया है । इस भूकम्प ने जितनी भी सम्पदाओं को नष्ट किया है वे सभी महत्वपूर्ण है । इनमें से काष्ठमंड़प, नौ तल्ले दरबार, गद्दी बैठक इतिहास, कला और वास्तुकला के दृष्टिकोण से विशेष महत्वपूर्ण माना गया है ।

काष्ठमंड़प का निर्माण १६ वी शताब्दी में लक्ष्मी नरसिंह मल्ल ने किया था तो प्रताप मल्ल ने वि.सं १९२९ में दरबार के मुख्य द्वार पर भगवान श्री हनुमान जी की मूर्ति स्थापना करने से पहले हनुमान ढोका दरबार का नाम गुनपो दरबार था और उस से पहले हिटी चोक दरबार नाम से प्रसिद्ध था ।
हनुमान ढोका दरबार स्थित नौतल्ले दरबार राजा पृथ्वी नारायण शाह ने निर्माण किया था । ये दरबार बसन्तपुर दरबार के नाम से भी प्रसिद्ध है । नेपाल एकीकरण के क्रम में नुवाकोट विजय पश्चात वहाँ पर सात तल्ले दरबार कराया गया । वैसे ही काठमाडौँ विजय पश्चात यहाँ पर नौ तल्ले दरबार का निर्माण कराया गया । इतिहासकारों के मुताबिक ११ तल्ला निर्माण की योजना थी, परन्तु पृथ्वी नारायण शाह के निधन होने के कारण ये योजना अधूरी रह गई । नेपाली वास्तुकला के इतिहास में उदाहरणीय यह नौ तल्ले दरबार हनुमान ढोका में अवस्थित सम्पदाओं में सब से ऊँचा था । इस भवन को बसन्तपुर कैलाश और बसन्तपुर टावर भी कहा जाता है । इस दरबार के पूर्व की तरफ लोंह चोक का चारों ओर निर्माण किया गया सभी भवन पृथ्वी नारायण शाह ने ही करवाया था । चारों कोनों में चार वुर्जाओं सहित यह भवन निर्माण किया गया है । ये चार वुर्जायें, जिसको टावर भी कहाँ जाता है, भक्तपुर, कीर्तिपुर और ललितपुर विजय के प्रतीक के रूप में निर्माण किया गया था । वे सब भक्तपुर टावर, कीर्तिपुर टावर और ललितपुर टावर के नाम से प्रसिद्ध है । वि. सं १९०४ में जंग बहादुर राणा ने न्हुलछे चोक की दक्षिण भाग को तोड़ कर नया भवन का निर्माण किया । वि.सं १९५६ में पृथ्वी वीर बिक्रम शाह के शासन काल में चन्द्र शमशेर ने उसी भवन को तोड़ कर युरोपियन शैली में गद्दी बैठक का भव्य रूप से निर्माण किया ।
प्राचीन काल से ही प्रशानिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में रहा यह दरबार शाह वंशीय राजा पृथ्वी वीर बिक्रम शाह के शासन काल में वि.सं १९४३ में नारायण हिटी दरबार में जाने के बाद कुछ सालों तक राज परिवार के अन्य निकट सदस्यों ने अपने निवास स्थल के रूप में प्रयोग किया था । सन १९७९ में युनेस्को का विश्व सम्पदा सूची में सूचीकृत यह दरबार वि.सं २०३२ साल से हनुमान ढोका दरबार संग्रहालय के रूप में रुपान्तरित किया गया है । नेपाल सरकार, पुरातत्त्व विभाग के अन्तर्गत हनुमान ढोका दरबार संग । हाल में त्रिभुवन स्मृति कक्ष, महेन्द्र स्मृति कक्ष और वीरेन्द्र स्मृति कक्ष हैं, जिनमें इन्हीं शाह वंशीय राजाओं के जीवनी से सम्बन्धित ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक महत्व कीे वस्तुएँं रखी गयी हैं । मल्ल काल से शाह काल तक की विविध वास्तुकला के नमुने से भरा हुआ यह दरबार एक खुला संग्रहालय है । हनुमान ढोका दरबार सिर्फ मूर्त सांस्कृतिक सम्पदा का भण्डार ही नही वल्कि अमूर्त सांस्कृतिक सम्पदा का संगम स्थल भी है । यहाँ साल भर विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधि संचालन होता है । प्राचीन काल से ही यह स्थल जात्रा, पर्व एवं सांस्कृतिक क्रियाकलाप का केन्द्रविन्दु के रूप में रहा है । यहाँ वसन्त श्रवण ९वसन्त श्रवण में जयदेव द्वारा लिखित गीत गोविन्द नामक प्रसिद्ध संस्कृत काव्य का दुसरा अध्याय मूल पुरोहित पढ़ कर सुनाते हैं और उस्ताद वसन्त राग (व्यांजलि राग) गाते हैं । चाँगुनारायण का कलश यात्रा, मत्स्येन्द्र मछिन्द्र नाथ यात्रा, पचली भैरव का खड्ग सिद्धि, खोकना का रुद्रायणी, सिकाली नाच, इन्द्रजात्रा के अवसर में कुमारी यात्रा, लाखे, भक्तपुर का महावली नाच, नुवाकोट भगवती का जात्रा …. आदि अभी तक निरन्तर चल रहा है । उपरोक्त जात्रा, पर्व आदि हनुमान ढोका दरबार का आकर्षण है । मल्ल राजा द्वारा प्रारम्भ की गयी इस परम्परा को शाह वंशीय राजाओं ने भी निरन्तरता दिया और राजतन्त्र के अवसान पश्चात गणतन्त्र नेपाल के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में रहे सम्माननीय राष्ट्रपति का इन पर्व और जात्राओं मे सहभागी होना महत्वपूर्ण पक्ष माना जा सकता है । इसी तरह सेतो मत्स्येन्द्रनाथ के रथ में मैथिल भेष–भूषा (धोती, मिर्जई, कुर्ता) और मुरेठा–पगडी) में सहभागी होते देख मल्ल काल में मैथिल विद्वानों को राजदरबार में मिलने वाला सम्मान का स्मरण कराता है ।
यह हनुमान ढोका दरबार क्षेत्र के मूर्त एवं अमूर्त सांस्कृतिक सम्पदाओं का संरक्षण, सम्वर्धन और पुनः निर्माण के प्रति आम नागरिक, मित्र राष्ट्र और विश्व समुदाय दिलचस्पी दिखा रहा है और सहयोग का हाथ बढ़ाना चाहता है । नेपाल सरकार को इसके प्रति संवेदनशील होना अत्यावश्यक है ।

