राजधानी से बढ़ती दूरियाँ

नेपालगंज रिपोर्ट:स्वदेश और विदेश से राहत की स्थिति भरमार थी, मीडिया में खबरें लगातार आ रही थी, देश की राजधानी काठमाण्डू में किस कदर राहत और उद्धार का काम आगे बढा, लेकिन २ दिन लगातार प्रयास करने के बाद मुश्किल से नेपालगन्ज पहुँचे पत्रकार महेश चौरसिया ने हिमालिनी को बताया कि भूकम्प पीडि़तों की स्थिति दर्दनाक है ।
राजधानी काठमाण्डू को अपना कर्म भूमि बनाने के उद्देश्य से विभिन्न जिलों से जनसंख्या लगातार बढ़ती रही है, २ दशकों में जिले से काठमाण्डू पलायन होने वाले सैकड़ों परिवार हैं जो शनिवार को आए भूकम्प के बाद अपने जिले में वापस आ गए ।
भूकम्प के समय सपरिवार राजधानी में रहे नेपाल टेलिभिजन के पत्रकार विजय बर्मा ने ३ दिन त्रिपाल में बिताया । उत्तर प्रदेश की बस से वह किसी तरह नारायण घाट पहुँचे और वहाँ से नेपालगन्ज के लिए दूसरा साधन लिया ।
हिमालिनी से बातचीत में पत्रकार बर्मा ने बताया कि बस किसी तरह जान बच गई । मौत को सामने देख सभी के होश उड़ गए बर्मा ने कहा, बचे हुए लोगों की स्थिति यह है कि खाना और पानी तक नहीं मिलता ।
नेपालगन्ज रामनगर निवासी दुर्गा तिवारी का हाल भी कुछ ऐसा ही है । बसपार्क में पसीने से लथपथ, सिर पर बैग, हात में झोला और २ बच्चे सहित नेपालगन्ज पहुँची तिवारी के चेहरे पर काठमाण्डू की स्थिति साफ झलक रही थी । उन्हाेंने कहा कि घर में दरारें पड़ गई हैं, खाने और रहने का जगह नहीं है, लोग सड़कों पर पड़े हुए हैं, लाशों के सड़ने के कारण दुर्गन्ध फैलती जा रही है ।
भूकम्प के ५ दिन बाद दुर्गा ने किसी तरीके से नेपालगन्ज पहुँचने की व्यवस्था मिलायी, जिसके लिए उन्होंने लगातार ३ दिन तक प्रयास किया लेकिन गाड़ी न मिलने के चलते उन्हें ५ दिन ड्राई फूड के सहारे बिताना पड़ा ।
तीसरे दिन रात को ११ बजे नेपालगन्ज पहुँचे सुमित शर्मा ने भी आपवीती सुनाई । उन्होंने कहा कि किसी प्रकार से प्लेन का टिकट मिला । अन्य समय में ६ हजार में मिलने वाला टिकट ११ हजार में मिला शर्मा ने कहा किसी तरीके से घर पहुँच गया पैसे तो फिर आ जाएँगे ।
भूकम्प के बाद राजधानी में अध्ययन करने वाले, व्यवसायी, और सर्वसाधारण जैसे लाखों लोगों ने बाहरी जिलों को सुरक्षित स्थान के रूप में चुना । लगातार राजधानी से बाहर जानेवालों की संख्या बढ़ती गई । स्थिति यह रही की सवारी साधन का भी अभाव होने लगा । राजधानी में मौत का मंजर देख लोगों का हताशा लगातार बढ़ती गयी ।
भूकम्प के प्रत्यक्ष प्रभाव में करीब २० जिले पड़े, हालाँकि सारा देश कम्पन से हिल उठा, राजधानी सहित पूरे देश में शोक का माहोल उत्पन्न हो गया, नेपालगन्ज में भी भगदड़ मची, लेकिन हताहत की स्थिति सामने नहीं आयी ।
मुश्किल से गाड़ी मिलती है, दुगूना भाड़ा, असुविधा, और दहशत की व्याख्या और हिसाब किताब नहीं हो सकता नेपालगन्ज कोरियनपुर निवासी सरला बुढ़ा ने कहा, किसी हालत से काठमाण्डू से आने को मिल गया बस उतना ही काफी है ।
नेपालगन्ज आने वाले लोगो में त्रास और डर निरन्तर देखा गया है, बैठते समय कुर्सी हिल जाए तो अब भी वही घटना याद आ जाती है । पत्रकार चौरसिया ने बताया कि हालात इतने बिगड़ गए हंै कि राजधानी वापस होने का २ महीना कोई योजना नहीं । सामने लोगाें को तड़पते हुए देखा है उन्हाेंने कहा काठमाण्डू से मन उखड़ गया ।
भूकम्प के हपm्ते बाद तक ५ रेक्टर के आसपास वाली कम्पन्न ने लोगाें की आशंका को और भी बढ़ा दिया है, लोग अब भी घरों में वापस जाने के लिए तैयार नहीं हंै, जिनका घर नहीं रहा वह किसी प्रकार से अपना दिन शिविरों मे बिता रहे हैं ।
निरन्तर विदेशी सहयोग के बाद भी नेपाल सरकार की अव्यवस्था इस कदर देखने को मिली कि राहत सामग्री एयरपोर्ट पर ही पड़ा रहा, लोग पानी के लिए तरस गए और सरकार के मन्त्रियों ने सिर्फ आश्वासन दिया ।
कलंकी आन्दोलन के प्रत्यक्ष सहभागी नेपालगन्ज निवासी रिजवान हलवाई ने बताया कि भूख और प्यास से लोग इतना उब गए कि गोली मारने की माँग करने लगे, नेपाली शासन व्यवस्था ने महज राजधानी में ऐसी आपदा से निपटने का जतन और पूर्व तैयारी नहीं रखा तो अन्य जिलों का हाल क्या होगा ?
जान बचाने के लिए लोगों को अर्धनग्न प्रदर्शन करना पडेÞ, सरकारको गाली देनी पडेÞ, उच्च जोखिम में माने जाने वाले केन्द्र के लिए सरकारी व्यवस्था ही चरमरा उठी, मानो भूकम्प के बारे में सरकार बेखबर थी ।
निःशुल्क यातायात
राजधानी की स्थिति को मध्यनजर करते हुए बाँके के प्रमुख जिला अधिकारी ने आपातकालीन बैठक बुलाई और बस व्यवसायियों को यातायात के साधान निःशुल्क रूप से चलाने का आह्वान किया । जिले में चार बस व्यवसायी समिति ने भूकम्प पीडि़तों के उद्धार और सहयोग के लिए निःशुल्क यातायात संचालन करने पर सहमति व्यक्त किया । जिला अधिकारी लेखक के संयोजकत्व में हुए बैठक में जिला व्यवसायी ने घायल, वृद्धवृद्धा, बच्चे और अपंग को निःशुल्क करने के विषय पर सहमति जताई और शव निःशुल्क रूप से जिले तक पहुँचाने का प्रबन्ध किया ।
पुराना घर बड़ी समस्या
पुराने जमाने में घर बनाने के लिए किसी ब्राह्मण की जरुरत पड़ती थी, वही निर्धारण करता था घर की दिशा और दशा, लेकिन अब नेपालगन्ज नगरपालिका के इन्जीनियर और कानून निर्धारण करता है कि आपका घर कैसा होना चाहिए ?
राजधानी केन्द्रित भूकम्प दहशत ने पूरे देश के लोगों को अपने घर के विषय में विचार करने पर मजबूर कर दिया है । भौतिक संरचना कमजोर होने के कारण भूकम्पीय क्षति का विवरण बढ़ जाता है । सरकार ने २०६० साल में भवन संहिता लागु किया और कहा गया कि हर व्यक्ति भूकम्प प्रतिरोधी घर बनाए । लेकिन कानून के उदासीपन के कारण अभी भी नेपालगन्ज में भवन संहिता के विपरीत घर निर्माण होते पाए गए ।
नेपालगन्ज ७ निवासी सम्सुद्दीन कबडि़या इस समय अपना नया घर निर्माण करने में लगनशील हैं, भूकम्प के बाद भी आप सामान्य तरीके से घर बना रहे हैं ? इस प्रश्न के जवाब में हिमालिनी से कबडि़या ने कहा, घर मजबूत बनाने के लिए सिमेन्ट और सरिया का उचित प्रयोग कर रहे हंै, कानून में क्या है यह जानकारी नहीं । कबडिया ने नेपालगन्ज उपमहानगरपालिका से किसी किस्म की औपचारिकता पूरा किए बिना ही घर निर्माण जारी रखा है ।
नेपाल सरकार ने २०६० साल में राष्ट्रीय भवन संहिता लागु किया जो बाँके जिला में श्रावण २०७१ से लागु हुआ । नेपालगन्ज में निर्मित करीब आधा दर्जन सरकारी संरचना मात्र भूकम्प प्रतिरोधी बाँकी पुरानी संरचनाएँ उच्च जोखिम में है नेपालगन्ज उप महानगरपालिका के इन्जीनियर श्यामकाजी पिया ने बताया ।
जिले में ऐन लागु होने के बाद २५० नक्सा दर्ता हुआ और कानुन उल्ंलघन करने वाले ५५ संरचना को नगरपालिका ने निर्माण अवधि में ही रोक दिया । नेपालगन्ज क्षेत्र में २७ हजार ६ सौ २८ घर हैं जिनमें पिया के अनुसार ७० प्रतिशत भौतिक संरचना भूकम्प के उच्च जोखिम में हैं ।

