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अब ८०–९० वर्षाें तक बड़ा भूकम्प आने की संभावना नहीं

 

भूगर्भशास्त्री कमल द्विवेदी:हमलोग बचपन से ही दादा–दादी के मंँह से नेपाल के सन् १९३४ के ऐतिहासिक महाभूकंप के बारे में सुनते आ रहे हैं । नेपाल में इससे पहले सन् १८३३ में भी महाभूकंप हुआ था । इसके साथ ही हमलोग पीढ़ी दर पीढ़ी यह भी सुनते आ रहे हैं कि काठमांडू में हर एक सौ वर्ष बाद लगभग ९ रेक्टर स्केल का महाभूकंप होता आया है ।
इस क्षेत्र के भूकंपीय इतिहास का पन्ना खोलें तो पता चलता है कि सन् १८०३ में ७.५ रेक्टर स्केल का भूकंप भारत के गढ़वाल में हुआ था । उसके लगभग एक सौ वर्षाें के बाद गढ़वाल के ही पश्चिम स्थित कांगड़ा को केन्द्रविन्दु बनाते हुए सन् १९०५ में ७.८ रेक्टर स्केल का भूकंप हुआ । जबकि, पूर्वी नेपाल के उदयपुर को केन्द्र विन्दु बनाते हुए सन् १९३४ में ८.४ रेक्टर स्केल का महाभूकंप हुआ । यद्यपि भारत के असम को केन्द्रविन्दु बनाते हुए सन् १९५० में ८.६ रेक्टर स्केल का भूकंप हुआ था लेकिन तब पश्चिमी नेपाल में बड़ा भूकंप नहीं हुआ । इस प्रकार देखें तो काफी लम्बे अर्से से नेपाल में बड़ा भूकंप नहीं हुआ था । इसी कारण वैज्ञानिकों ने यह अनुमान लगाया था कि पश्चिमी नेपाल में लम्बे समय तक भूकंप नहीं हुआ, अर्थात् ‘‘सेसमिक गैप (भूकंपीय अन्तराल)” होेने का अनुमान लगाया था । इसीलिए नेपाल के पश्चिम क्षेत्र में किसी भी समय महाभूकंप होने का पूर्वानुमान लगाया जा रहा था ।
अब देखिए संयोग कैसा होता है – ‘‘शनिवार के भूकंप के ठीक एक दिन पहले शुक्रवार को मैं अपने घर के सामनेवाली सड़क से गुजर रहा था । उसी समय एक अद्र्धवैस दम्पत्ति की आवाज सुनाई पड़ी । वे लोग आपस में बात कर रहे थे । पति महोदय कह रहे थे ‘अब इतना बड़ा भूकंप नहीं आएगा” जिसे पत्नी मानने को तैयार नहीं थी, बार–बार कह रही थी भूकंप का क्या ठिकाना ? कभी भी आ सकता है । फिर भी, पति महोदय फरमाते जा रहे थे ‘‘महाभूकंप हमारे दादा–बाबा के समय में आया था, अब हमलोगों के नाती–पोते के समय में ही आएगा ।” यहीं देखिए उक्त दम्पत्ति की आपसी बातचीत, कितनी सटीक निकली ? उनका कथन, वैज्ञानिक और ऐतिहासिक तथ्यों से कितना मिलता–जुलता दिखता है । वास्तविकता तो यह है कि नेपाल में अनुसंधानरत भू–वैज्ञानिकों की भी यही राय है ।
फ्रान्स के भू–वैज्ञानिक लाँरेंट बोलीडाँगर के समूह ने इस महाभूकंप के आने के मात्र तीन सप्ताह पहले ‘नेपाल भौगर्भिक समाज” के सातवें कांग्रेस ९अधिवेशन० में शोधपत्र प्रस्तुत किया था । उनलोगों के समूह ने पूर्वी और पश्चिमी नेपाल की जमीन में गहरा गढ़ा खोदकर, उसमें ‘‘गोलको काँर्बन डेटिंग”” करके, उक्त क्षेत्र का दरार कब चलायमान हुआ था, इसका पता लगाया था ।
पूर्वी नेपाल में केन्द्रविन्दु रहे, १९३४ के महाभूकंप के समय, चलायमान हुआ ‘थ्रस्ट (धक्का) इससे पहले सन् १२५५में चलायमान हुआ था । सन् १२५५ में हुए महाभूकंप में काठमांडू घाटी की जनसंख्या के एक चौथाई से लेकर एक तिहाई तक की जान, जाने का अनुमान है । सन् १२५५ में पूर्वी क्षेत्र के चलायमान होने के ८९ वर्ष के बाद सन् १९३४ में पोखरा और काठमांडू के बीच के भाग में विद्यमान थ्रस्ट, चलायमान होकर, अन्य महाभूकंप हुआ था । इस क्षेत्र में अटका हुआ थ्रस्ट एक–डेढ़ दशक के अन्दर ही चलायमान होने का पूर्वानुमान था । इसी प्रकार लगभग सात सौ वर्ष पहले के जैसा ही पूर्वी थ्रस्ट के चलायमान होने के ८१ वर्ष बाद, पश्चिम थ्रस्ट के चलायमान होने से यह महाभूकंप आया है, ऐसा दिखता है । यह वैज्ञानिक तथ्य से यह पता चलता है कि अगले ८०–९० वर्ष तक काठमांडू में महाभूकंप नहीं होगा । – प्रस्तुतिः  रामाशीष

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