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क्या ‘भगवद्गीता’ शान्तिपर्व का सारांश है ? : प्रा.वीरेन्द्र प्रसाद मिश्र

 

प्रा वीरेंद्र प्रसाद मिश्र, हिमालिनी अंक जुलाई । भगवद्गीता, जो ७०० श्लोकों का संग्र है, वह महाभारत को भीष्मपर्व का अंग है । इस तथ्य को सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है, परन्तु कुछ पाश्चात्य विद्वान इससे सहमत नहीं दिखते हैं । इस छोटे से लेख में इस तथ्य का अध्ययन कर वास्तविकता को दर्शाने का एक प्रयास किया गया है । साथ ही गीता के मुख्य उद्देश्यों को निर्धारण करने का यह एक प्रयत्न भी है ।
‘गीता’ मुख्य रुप में अर्जुन और कृष्ण की बीच कुरुक्षेत्र के मैदान में हुए संवाद का वर्णन है, जहाँ अर्जुन युद्ध न करने का निर्णय लेते हैं, कृष्ण युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं ।

गीता का उद्देश्य, धर्म और दर्शन का प्रर्वद्धन

अर्जुन और कृष्ण के संवाद का अंत होने से पहले कृष्ण श्लोक १८.६७–७१ तक अपने दर्शन एवं धर्म की वकालत करते हैं, जिसे अर्जुन से उन्होंने अब तक प्रतिपादित किया था । उपरोक्त श्लोक में उनका अंतिम उद्देश्य स्पष्ट रूप से दिखता है । कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि जो लोग ज्ञान के बिना तप नहीं करते या कृष्ण में भक्ति नहीं रखते, उन्हें यह ज्ञान सुनने की इच्छा नहीं होनी चाहिए । और जो लोग दोष दृष्टि रखते हैं, उन्हें यह ज्ञान नहीं देना चाहिए (१८.६७) । कृष्ण कहते हैं, जो इस गोपनीय उपदेश को उनके भक्तों को बताएगा, वह निःसन्देह कृष्ण की भक्ति करेगा और कृष्ण को प्राप्त करेगा । जो इस उपदेश को दूसरों को सुनाएगा, वह कृष्ण का सबसे प्रिय भक्त होगा और कृष्ण उसे सर्वोत्तम प्रेम देंगे । कृष्ण कहते हैं कि जो मनुष्य इस धर्मपूर्ण संवाद का अध्ययन करेगा, वह कृष्ण द्वारा ज्ञानमय पूजा हो जाएगा । जो श्रद्धायुक्त होकर और दोषदृष्टि से मुक्त होकर इस उपदेश को सुनेगा, वह पापों से मुक्त होकर पुण्य कर्म करनेवालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त करेगा ।

अर्जुन कृष्ण संवाद के अंत में (१८.६३) कहते हैं, “करिष्ये वचनं तव”, अर्थात् मैं आपकी आज्ञा का पालन करूंगा । अर्जुन भविष्य की बात करते हैं, जब वे युद्धभूमि के मध्य में रथ पर निःशस्त्र होकर बैठे होंगे और युद्ध प्रारंभ होने वाला होगा । इस समय उन्हें यह कहना चाहिए था कि “हे केशव, मैं अब लडता हूँ” और यह कहकर अपना धनुष–वाण हाथ में लेकर उठना चाहिए था ।
इस प्रसंग में एक प्रश्न उठता है कि जब युद्ध का प्रारंभ होने वाला है, तो कृष्ण को अपने उपदेश को प्रचारित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी ? यह विचारणीय है कि कृष्ण को यह बताना पड़ा कि जो यह उपदेश सुनेगा और अध्ययन करेगा, वह समुचित फल या मोक्ष प्राप्त करेगा । इस बात को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने पर यह लगता है कि गीता बाद में महाभारत का अंग बन गई, ताकि कृष्ण द्वारा प्रतिपादित या प्रवद्धित धर्म और उपदेश उपयुक्त समय पर प्रचारित और प्रसारित हो सकें ।

समग्र रूप से देखा जाए तो गीता में दो मुख्य विषयवस्तुएं हैं । गीता की शरूआत अर्जुन को सशस्त्र युद्धभूमि में लाने और युद्ध के बीच में जाने से होती है । अर्जुन जब अपने सभी बंधु–बांधवों, पितामह, गुरु और रिश्तेदारों को युद्ध में मरने और मारने के लिए तैयार देखता है, तो उसका मन भारी परिवर्तन से गुजरता है । उनमें वैराग्य उत्पन्न होता है और वह युद्ध न करने का निश्चय करता है ।
कोई भी युद्ध किसी न किसी उद्देश्य से लड़ा जाता है, जिसमें दोनों पक्षों के लिए हताहत होना निश्चित होता है, और एक पक्ष की हार होती है और दूसरे की जीत । ऐसी स्थिति में अर्जुन के मन में दो प्रश्न स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं । एक यह कि युद्ध में कौन–कौन मरेगा, यह निश्चित नहीं है, और दूसरा यह कि जिस उद्देश्य के लिए युद्ध किया जा रहा है, क्या वह उनके लिए उचित और कल्याणकारी है ?
अर्जुन के शोक का दूसरा कारण युद्ध था । वे सोचते हैं कि युद्ध से क्या लाभ होगा ? जिनके लिए राज्य सुख की प्राप्ति के लिए युद्ध लड़ा जा रहा है, वे अगर नहीं रहेंगे, तो इस युद्ध का क्या अर्थ है ? अर्जुन अपने पूज्य जनों से युद्ध कैसे कर सकते हैं, जिन्होंने उन्हें पाला है, जिनसे उन्होंने धनुर्विद्या सीखी है ? अर्जुन तो उन्हें मारने से भीख मांगकर जीवन यापन करना अधिक उचित समझते हैं ।

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अर्जुन और युधिष्ठिर की मनोदशा समान
सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग, जो गीता का आधार बनता है, वह है अर्जुन की युद्ध के प्रति उत्पन्न वितृष्णा । अर्जुन, जो युद्ध करने आए थे और जब युद्ध की सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं, उस समय उनकी युद्ध न करने की मानसिक एवं शारीरिक अवस्था ने उन्हें अपने धनुष–बाण रखकर युद्धभूमि के मध्य में रथ पर बैठने को बाध्य किया– यही गीता के उपदेश का कारण बना । ठीक इसके समान वितृष्णा की मनोदशा हम शान्तिपर्व में यद्धोपरान्त युधिष्ठिर की मनोदशा में पाते हैं ।

अर्जुन के युद्ध न करने के निश्चय के जो कारण थे, उन्हीं कारणों को विजयोपरान्त राजा युधिष्ठिर अपने ऊपर उत्तरदायित्व मानते हुए राज्य त्याग कर वनगमन की इच्छा ‘शान्तिपर्व’ के प्रारम्भिक अध्याय में प्रकट करते हैं । युद्ध से पूर्व अर्जुन की मानसिक अवस्था और युद्ध के बाद युधिष्ठिर का शोक– दोनों स्वाभाविक प्रतीत होते हैं, क्योंकि युद्ध में अपने और पराए सभी मारे गए थे । यही मानसिकता गीता एवं शान्तिपर्व– दोनों में परिलक्षित होती है ।
क्या युधिष्ठिर को ज्ञात नहीं था कि अर्जुन ने युद्ध की भीषणता के विषय में कृष्ण से चर्चा की थी और युद्ध न करने का निश्चय कर चुके थे ? यदि गीता भीष्मपर्व का अंग है, तो शान्तिपर्व में युधिष्ठिर की यह अवस्था अर्जुन के सामने क्यों वर्णित की गई है ? इस प्रसंग को आगे बढ़ाना समीचीन जान पड़ता है ।

‘शान्तिपर्व’ के प्रथम अध्याय में युधिष्ठिर का गंगा के तट पर सभी मृतकों को श्रद्धांजलि देकर एक मास तक निवास करने का वर्णन प्राप्त होता है । इसी समय द्वैपायन व्यास, नारद, महर्षि देवल, देवस्थान, कण्व आदि ऋषिगण युधिष्ठिर से मिलने आते हैं । परिस्थिति के अनुरूप सम्मानित होकर वे सभी भयाकुलचित युधिष्ठिर को चारों ओर से घेरकर उन्हें आश्वस्त करते हुए बैठते हैं ।
सबसे पहले नारद जी युधिष्ठिर से पूछते हैं– “महाराज ! आपने अपने बाहुबल, भगवान कृष्ण की कृपा और धर्म के प्रभाव से सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय प्राप्त की है (शा.१.१०), जिससे समस्त जगत को युद्ध से मुक्ति मिल गई है । अब आप क्षत्रिय धर्म का पालन करने में तत्पर और प्रसन्न हैं न ? आपके सभी शत्रु मारे जा चुके हैं, और आप अपने स्नेही जनों को प्रसन्न रखते हैं न ? राज्यलक्ष्मी प्राप्त कर भी आपको कोई शोक तो नहीं है ?” (शा.१.१२)
इन प्रश्नों के उत्तर में युधिष्ठिर कहते हैं– “भगवान कृष्ण की कृपा, ब्राह्मणों के आशीर्वाद, भीमसेन एवं अर्जुन के पराक्रम से मैंने सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय प्राप्त की है । किन्तु मेरे हृदय में निरन्तर यह महान दुःख बना रहता है कि लोभवश मैंने अपने बन्धु–बान्धवों का महान संहार किया (शा.१.१३) । मुझे अपने पुत्रों की मृत्यु का गहन शोक है ही, किन्तु सबसे अधिक पीड़ा मुझे कर्ण की मृत्यु से है, जो मेरा ज्येष्ठ भ्राता था– जिसकी सच्चाई मेरी माता कुन्ती ने मुझसे गोपनीय रखी थी ।”

युद्धोपरान्त युधिष्ठिर अपनी मनःस्थिति को शान्तिपर्व के सातवें अध्याय में अर्जुन के समक्ष इस प्रकार व्यक्त करते हैं–
“अर्जुन, यदि हम लोग वृष्णिवंशी तथा अन्धकवंशी दाताओं की नगरी द्वारका में जाकर भीख माँगते हुए जीवन यापन करते, तो आज अपने कुटुम्ब को नष्ट करके इस दुर्दशा को नहीं भोगते । हमारे शत्रुओं का मनोरथ पूर्ण हो गया । जिनके लिए यह सब किया, वे सब नष्ट हो गए । अपने स्वजनों की हत्या कर के हम कौन–सा धर्मफल प्राप्त करेंगे ? क्षत्रियों के आचार, बल, पुरुषार्थ और अमर्ष को धिक्कार है, जिनके कारण हम इस स्थिति में पहुँचे हैं । हम तो लोभ और मोहवश राज्य–सुख की इच्छा रखते हुए दम्भ और अभिमान के आश्रय से इस दुर्गति में फँस गए हैं ।

जब हमने देखा कि पृथ्वी के लिए विजय की चाह रखने वाले हमारे बन्धु–बान्धव मारे जा चुके हैं, तब अब हमें तीनों लोकों का राज्य देकर भी प्रसन्न नहीं किया जा सकता । तुच्छ पृथ्वी के लिए हमने अवध्य राजाओं की हत्या की और अब अपने प्रियजनों से हीन होकर अर्थहीन–सा जीवन जी रहे हैं । जैसे मांस के लोभी कुत्तों को अनिष्ट प्राप्त होता है, वैसे ही राज्य के प्रति आसक्त हम लोगों को भी अनिष्ट प्राप्त हुआ है ।
ये जो हमारे सगे–संबंधी मारे गए हैं, उनका त्याग तो हमें संपूर्ण पृथ्वी, स्वर्ण का ढेर, सभी गौएँ और घोड़े प्राप्त करके भी नहीं करना चाहिए था (शा.७.५, ६–११) । माताओं की गोदें सूनी हो गईं । जो लोग मारे गए, वे न तो इस पृथ्वी को भोग सके और न ही देवताओं तथा पितरों के ऋण से मुक्त होकर यमलोक जा सके, क्योंकि उन्हें पिण्डदान भी नहीं मिला (शा.७.१८) ।

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युधिष्ठिर इस समस्त विनाश का उत्तरदायित्व धृतराष्ट्र के पुत्रों को देते हैं, क्योंकि उन्होंने पाण्डवों को ठगने का षड्यन्त्र किया, उनसे द्वेष रखा, परन्तु झूठे विनय और नम्रता का प्रदर्शन किया । पुत्रमोह में फँसे धृतराष्ट्र ने उसकी इच्छाओं का अनुमोदन किया और कभी भी भीष्म एवं विदुर की राय नहीं ली । दुर्योधन तो अपने वृद्ध माता–पिता को शोक की अग्नि में डालकर चला गया ।
युधिष्ठिर कहते हैं– हमने वीरों को मारा, अपनी ही पृथ्वी को विनाश के गर्त में डाल दिया । शत्रुओं को मारकर हमारा क्रोध तो शान्त हो गया, परन्तु यह शोक मुझे निरन्तर घेरे रहता है (शा.७.३६) । अतः वे अर्जुन से कहते हैं कि वे सबको विदा देकर वन में चले जाएँगे । उनका तर्क है कि किया गया पाप–कहने, शुभ कर्म करने, पछताने और दान देने से नष्ट हो सकता है (शा.७.३६) । साथ ही, निवृत्ति–परायण होकर, तीर्थयात्रा करने, शास्त्रों का स्वाध्याय एवं जप करने से भी पाप मिट सकता है ।

श्रुति के अनुसार त्यागी पुरुष पाप नहीं करता और वह पुनर्जन्म–मरण के बन्धन में नहीं पड़ता (शा.७.३८) । युधिष्ठिर कहते हैं कि उन्होंने परिग्रह की इच्छा से पाप अर्जित किया है, जो जन्म–मृत्यु का कारण होता है । अन्त में वे अर्जुन से कहते हैं कि वह इस निष्कंटक एवं सुरक्षित राज्य का शासन करे, क्योंकि अब उन्हें राज्य और भोगों से कोई प्रयोजन नहीं रह गया है (शा.७.४२) ।
इस प्रकार, जो मोक्ष कृष्ण ने अर्जुन को गीता में प्रदान करने का आश्वासन दिया था, वही मोक्ष युधिष्ठिर का भी परम लक्ष्य बन जाता है । अतः मोक्ष की प्राप्ति ही गीता और महाभारत का परम उद्देश्य प्रतीत होता है ।
शांतिपर्व में विवेचित किए गए प्रसंगों को पढ़कर ऐसा भान होता है कि महाभारत का सारांश गीता में रखा गया है । दूसरे शब्दों में, गीता महाभारत और विशेष रूप से शांति पर्व का एक हिस्सा है, जिसमें वशिष्ठ और याज्ञवल्क्य तथा जनक के बीच हुए संवाद, और नारदीय उपाख्यान में प्रकृति और पुरुष, क्षर और अक्षर, और भगवान नारायण का वर्णन बहुत अंशों में दुहराया गया है । इस व्याख्या पर तिलक की टिप्पणी (पृ. ७२, ७३६ गीता रहस्य, अंग्रेजी) ध्यान देने योग्य है ।

गीता का तत्कालीन उद्देश्य अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करना था, और इसका मूल और अंतिम उद्देश्य एक दर्शन और धर्म को प्रतिपादित और प्रसारित करना था । अर्जुन का एक प्रश्न यह भी था कि युद्ध से क्या कल्याण प्राप्त होगा ? गीता में ‘श्रेय’ शब्द का प्रयोग लगभग एक दर्जन बार हुआ है । इसे कहीं ‘कल्याण’ के रूप में, कहीं ‘अच्छा’, ‘श्रेष्ठ साधन’, ‘अधिक लाभ प्रद’, ‘मुक्ति की ओर ले जानेवाला’, और ‘मंगलकारी’ के रूप में बताया गया है ।

दार्शनिक दृष्टिकोण से, अर्जुन का युद्ध से वैराग्य को निवृत्ति मार्ग का अनुसरण माना गया है, जिसमें कर्मों को त्यागकर ज्ञान के द्वारा मुक्ति मिलती है । जब जीवात्मा और परमात्मा का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, तो उससे मुक्ति मिल जाती है । इस तरह गीता में सांख्य दर्शन का अनुसरण किया जाता है । सांख्य दर्शन द्वैतवादी दर्शन है, जिसमें दो परम तत्व हैं–पुरुष और प्रकृति । पुरुष पूरी तरह से चेतन है, और निष्क्रिय भी है, जबकि प्रकृति जड़ है, पर संक्रियाशील है, जिसके तीन गुण हैं–सत्व, रजस और तमस । जब पुरुष यह ज्ञान प्राप्त कर लेता है कि सारी सृष्टि प्रकृति के विकासशील प्रक्रिया का परिणाम है, तो वह मुक्त हो जाता है, और प्रकृति अपनी सक्रियता से पुरुष को ज्ञान देकर उसे मुक्त कराती है । हालांकि, सांख्य दर्शन के पुरुष अनेक होते हैं, जो कर्ता और भोक्ता दोनों होते हैं । इस तरह, सांख्य दर्शन तर्कयुक्त व्यवस्था देने में असफल रहा है । इसलिए, गीता का दर्शन एक ही परम पुरुष (परमेश्वर) के अस्तित्व को स्वीकार करता है और उसे प्रकृति के तीन गुणों से जोड़कर सांख्य दर्शन को ईश्वरवादी बना दिया है, क्योंकि मोक्ष या परमेश्वर की प्राप्ति को परम उद्देश्य बनाया गया है । गीता में सांख्य दर्शन से जुड़े शब्दों का बार–बार प्रयोग हुआ है । जैसे सांख्य–७ बार, सात्विक–१५, तामस–१४, प्रकृति–२८, गुण–३२, पुरुष–१९, और योग–१३ बार ।
गीता कर्म से भागने में नहीं, बल्कि कर्म करने में विश्वास करती है । कृष्ण अर्जुन को युद्ध से विमुख होने से रोकते हुए कर्म पर बल देते हैं और कहते हैं कि कर्म तो करना है, लेकिन किसी अभिलाषा से नहीं । इसे निष्काम कर्म कहा गया है, जिसका अर्थ है बिना किसी स्वार्थ या इच्छाओं के कर्म करना । अर्जुन युद्ध में विजय और पराजय को लेकर चिंता करते हैं और युद्ध से विमुख होते हैं । कृष्ण उन्हें कर्म से विमुख होने के बजाय कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन विजय और पराजय के विचार से मुक्त रहने की सलाह देते हैं । कृष्ण अर्जुन को बार–बार कर्म करने की प्रेरणा देते हैं, जैसे एक कर्मयोगी करता है । गीता में कर्मयोग का महत्वपूर्ण स्थान है, जो कर्म को निष्काम भाव से करने का मार्ग प्रस्तुत करता है ।

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निष्काम कर्म करने को ‘योग’ कहा जाता है, क्योंकि इसमें मन को संकल्पित होकर दृढ़ रहना पड़ता है । कृष्ण अर्जुन को भक्ति मार्ग और ध्यान मार्ग के साथ कर्मों को कृष्ण (जो परमेश्वर हैं) को समर्पित कर निष्काम कर्मी बनने की सलाह देते हैं । इस प्रकार, गीता का दर्शन ईश्वरवादी हो जाता है, जिसमें भक्तिमार्ग को प्रशस्त किया गया है ।
गीता में ईश्वरवाद की स्थापना का प्रयास किया गया है, जिसमें सृष्टि की विविधता को प्रकृति के गुणों के आधार पर स्वीकार किया गया है । गीता को एक वेदांत के रूप में भी देखा जा सकता है, जो एकत्व और अनेकता के बीच समन्वय करने का प्रयास है । वेदांत में ‘माया’ के माध्यम से एक ही परम तत्व से अनेकता की व्याख्या की गई है, जो वेदांत के विभिन्न मतों के लिए एक चुनौती रही है । एकत्व द्वारा अनेकता की और अनेकता द्वारा एकत्व की व्याख्या पूरी तरह से संभव नहीं दिखती, फिर भी गीता का उद्देश्य सांख्य दर्शन और वेदांत दर्शन के बीच सामंजस्य स्थापित करना है । गीता में सांख्य दर्शन को ईश्वरवाद की ओर मोड़ने का प्रयास किया गया है, और सांख्य के प्रकृति संबंधी विचारों के द्वारा परमेश्वर में सृष्टि को समाविष्ट किया गया है, लेकिन परमेश्वर स्वयं सृष्टि में समाविष्ट नहीं है । इस प्रकार, परमेश्वर की सर्वोच्चता पर गीता में अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है ।

निष्कर्ष

ऐसा कहा जाता है कि जो महाभारत में है, वह अन्यन्त्र भी उपलब्ध है और महाभारत में उपलब्ध नहीं वह कहीं भी उपलब्ध नहीं है । ऐतिहासिक दृष्टि से महाभारत ऐतिहासिक लक्ष्यों का एक संकलन है । नैतिक दृष्टिकोण में यह उचित कर्म और अनुचित कर्मों के बीच द्वन्द्व को दर्शाता है जिसमें उचित की जीत अनुचित पर होती है । सामाजिक एवं सांस्कृतिक विचार में यह प्राचीनतम आदर्श व्यवहार, और परम्परा का धरोहर है । राजनीतिक रुप में यह सिमित राजतन्त्र को वकालत करता है । दार्शनिक पक्ष में यह कृष्ण को भगवान, पुरुषोत्तम परम सत्ता परमात्मा के रुप में प्रतिष्ठित करने का एक दार्शनिक कृति है । इन सभी तत्वों का सारांश इसका शान्तिपर्व है । ओर शान्तिपर्व सारंश के रुप में मीठे लयमें लिखा गया एक काव्य है । अतः यह कहना अनुचित नहीं होगा कि गीता का धर्म और दर्शन महाभारत की साराशं है जिसे रचनाकार ने शान्तिपूर्व से पहले भीष्मपर्व में समावेश कर इसे अधिक प्रासांगिक एवं जीवनोपगी बनाने का प्रयास किया है ।

Dr Birendra Prasad Mishra 1
वीरेन्द्रप्रसाद मिश्र

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