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जिला अदालत रुपन्देही ने रवि को छोड़ने से किया इनकार

 

काठमांडू, सावन २७ – जिला अदालत रुपन्देही ने सोमवार की शाम को पूर्व गृहमंत्री एवं राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के अध्यक्ष रवि लामिछाने को बैंक जमानत लेकर तारीख पर छोड़ने से इनकार कर दिया ।
न्यायाधीश नारायण प्रसाद सापकोटा ने मुलुकी फौजदारी कार्यविधि संहिता ऐन, २०७४ की दो धाराओं का विश्लेषण करते हुए उन्हें रिहा करने से मना किया।
पूर्व गृहमंत्री और रास्वपा अध्यक्ष लामिछाने ने इसी कानून की धारा ६८ और ७१ के आधार पर रिहाई की मांग की थी। धारा ६८ में उन परिस्थितियों का उल्लेख है, जिनमें आपराधिक अभियोग लगे आरोपी को जमानत पर छोड़ा जा सकता है।
लेकिन जिला न्यायाधीश नारायण सापकोटा की अदालत ने यह कहते हुए आदेश दिया कि जो मामला तहगत अदालत से होते हुए सर्वोच्च अदालत में निपट चुका है, उसमें फिर से प्रवेश नहीं किया जा सकता। आदेश में कहा गया— “इस अदालत से निवेदक को जमानत पर छोड़ने का जो आदेश हुआ था, वह तहगत अदालत और सम्मानित सर्वोच्च अदालत दोनों से निरस्त हो चुका है, ऐसे में उसी धारा पर दोबारा इस अदालत का प्रवेश संभव नहीं है।”
रवि लामिछाने द्वारा रिहाई की मांग का दूसरा कानूनी आधार था— मुलुकी फौजदारी कार्यविधि संहिता, २०७४ की धारा ७१, जिसमें यह प्रावधान है कि “मुकदमे की कार्यवाही के किसी भी चरण में आरोपी को थुनामा (हिरासत) या जमानत पर रखा जा सकता है।” इस धारा में कहा गया है— “मुकदमे की कार्यवाही जिस भी चरण में पहुँचे, अदालत प्रमाण के आधार पर अभियुक्त को परिस्थिति अनुसार धारा ६७ के अनुसार हिरासत में रख सकती है या धारा ६८ के अनुसार धरौटी, जमानत या बैंक जमानत मांग सकती है…”
जिला अदालत ने उन्हें न छोड़ने के दो कारण बताए। पहला— सहकारी ऐन और संगठित अपराध निवारण ऐन के तहत अभियोग दर्ज होने के बावजूद उनके ऊपर बकाया रकम का निर्धारण बाकी है।
रवि ने कुल बकाया में अपना हिस्सा घोषित करके बैंक गारंटी पेश की थी, लेकिन अदालत ने टिप्पणी की कि बकाया रकम स्पष्ट नहीं है।
मुलुकी फौजदारी कार्यविधि संहिता ऐन, २०७४ की धारा ७१ में यह भी प्रावधान है कि यदि कोई नया साक्ष्य पहले के आदेश को मूल रूप से बदलने वाला पाया जाए, तो अदालत हिरासत में रहे व्यक्ति को छोड़ सकती है या तारीख पर छूटे व्यक्ति को हिरासत में लेने का आदेश दे सकती है। लेकिन रवि ने ऐसा कोई नया प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया, जो आदेश में तात्विक बदलाव लाता।
जिला न्यायाधीश सापकोटा ने कहा कि गवाहों से बयान लेना और अन्य प्रमाण जुटाना अभी बाकी है, इसलिए धारा ७१ लागू नहीं होती। आदेश में कहा गया— “प्रतिवादी द्वारा मांगी गई धारा ७१ की शर्तें विद्यमान होने का प्रमाण संलग्न दस्तावेजों से नहीं मिला, अतः उन्हें बैंक गारंटी लेकर तारीख पर रखना संभव नहीं है, कानून अनुसार कार्यवाही करें।”
जिला न्यायाधीश सापकोटा ने सुप्रिम सहकारी मामले में आरोपी होने और मुकदमे की प्रकृति को देखते हुए जल्द से जल्द निपटारा करने का निर्देश दिया।
अब जिला अदालत रुपन्देही में लंबित मामले का निपटारा होने तक रवि लामिछाने को हिरासत में रहते हुए ही अपने ऊपर लगे आरोपों का सामना करना पड़ेगा ।

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