सीता जन्मभूमि के नव निर्माण के क्या कुछ है मायने और मतलब : अमिय भूषण
अमिय भूषण, पुनौराधाम, १५ अगस्त २०२५ । संपूर्ण मिथिला क्षेत्र मे इन दिनों हर्ष का वातावरण है।चिरप्रतीक्षा के उपरांत सीता प्राकट्य भूमि पर निर्माण कार्य शुरू हो रहा है।यहाँ अबतक एक सामान्य सा मंदिर है जहाँ बड़ी आध्यात्मिक विभूतियों से लेकर यायावर श्रद्धालु तक आते रहते है।यदि इस सब के बावजूद यह सीता जन्म स्थली उपेक्षित रही है तो निश्चित तौर पर इसके कुछ कारण है।बात यदि करे तो इनमे नामों की समानता एवं भ्रामक प्रचार प्रमुख है।भारत भूमि में भगवती सीता के नाम से समानता वाले कई स्थान है।इनमें से ही उत्तर प्रदेश के भदोही जिले का सीतामढ़ी नामक स्थान है।यह भगवती सीता से जुड़े तीर्थ स्थल के तौर पर प्रचारित है।इसी प्रकार नेपाल की तरफ से जनस्थली को लेकर सदैव से दावा किया जाता रहा है।इन दोनों स्थानों को लेकर प्रचार बेहद प्रभावी रहा है।यहाँ शासकीय दृष्टिकोण संग आधारभूत ढाँचागत व्यवस्थायें भी संपूर्ण और पर्याप्त है।
फलतः बहुसंख्यक श्रद्धालु और धार्मिक पर्यटक सीता जन्मभूमि को लेकर सामान्यतया भ्रमित रहते है।इनके लिए सीतामढ़ी बिहार नही अपितु उत्तर प्रदेश में है।वही ये सीता जन्मभूमि -जानकी प्राकट्य स्थली नेपाल के जनकपुर को मान बैठते है।देवी सीता के पिता राजा जनक की राजधानी जनकपुर मे थी।संभवतः इस भ्रम का ये भी एक कारण हो सकता है।किंतु इस तीर्थनगरी के दुर्भाग्य का कारण यही समाप्त नही होता है।बिहार के सीतामढ़ी मे भी इस स्थान को लेकर दो स्थलों के दावे रहे हैं।इतना ही नही वितंडावादियों ने सीता जन्म तिथि पर भी प्रश्न खड़ा कर रखा है।जबकि इन सभी को लेकर साहित्य और पुरातात्विक दोनों प्रकार के प्रमाण उपलब्ध है।ऐसे तमाम कारणों के नाते इस स्थान को भी राम जन्मभूमि की तरह एक लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ी है।इस बीच अयोध्या राम मंदिर के नव निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव को लेकर हुई जोरदार चर्चाओं ने इसका मार्ग भी प्रशस्त किया।बढ़ती जन आकांक्षा एवं राम मंदिर को लेकर आरएसएस भाजपा के बढ़ते प्रभावों ने बिहार सरकार को इस पर सोचने को मजबूर किया।जिसकी परिणति तत्कालीन महागठबंधन सरकार द्वारा सितंबर 2023 में सीता मंदिर निर्माण को लेकर की गई घोषणा के रूप में सामने है।किंतु प्रतिबद्धता और दृष्टिकोण के अभाव नाते ये अब तक मूर्त रूप नही ले पाया।परंतु ये बात चर्चाओं में सदा बनी रही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस पर कई बार अपना मंतव्य रखा है बल्कि वे मंदिर संबंधित प्रतिबद्धता और संकल्पना को दुहराते रहे है।अब जब भव्य दिव्य मंदिर निर्माण और आधारभूत संरचना सुविधाओं का नव निर्माण हो रहा है तो यह निश्चित ही एक शुभ समाचार है।बिहार में राजगृह गयाजी के बाद सीतामढ़ी तीसरे प्रमुख तीर्थनगर के रूप में अब देश एवं दुनिया के सामने होगा।पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के तीर्थ नगरियों के बहुरते दिन और दुनिया भर से लोगो के आते ताते ने बिहार में भी बदलाव की आहट को बल दिया है।यह बिहार में धार्मिक सांस्कृतिक पर्यटन एवं तीर्थाटन के नवीन द्वार खोलेगा।इस बदलाव के संकेत दिखने भी शुरू हो गए है।सीतामढ़ी पुनौरा धाम अवस्थित सीता जन्मभूमि पर भव्य दिव्य निर्माण की घोषणा संग ऐसे दूसरे स्थानों का विकास भी हो रहा है।राम सीता के प्रथम भेंट की स्थली ग्राम फुलहर ऐसा ही स्थान है।मधुबनी जिले मे नेपाल सीमा से लगते इस जगह को लेकर भी शासकीय पहल हुई है। ऐसे में आने वाले समय में बिहार के दूसरे अन्य धार्मिक सांस्कृतिक महत्व के स्थलों के दिन सवरेंगे इसकी पूरी संभावना है।
अकेले पुनौरा धाम का ही विकास सीतामढ़ी जिले के जानकी मंदिर,हलेश्वर स्थान एवं पंथपाकड़ के रामायणकालीन स्थानों के समुचित विकास का मार्ग खोलेगा।राम सीता परिपथ के तीर्थो के जागरण और चर्चों से रामायण से अनुराग जुड़ाव वाले देशों के नागरिकों का भी बड़ी संख्या में बिहार आना हो सकता है।यह गिरमिटिया मूल वाले फिजी मॉरीशस इत्यादि की धरती से लेकर दक्षिण पूर्व तथा पूर्व एशिया के नागरिकों को कही अधिक बिहार भ्रमण को प्रेरित करेगा।निश्चित ही बहुतेरे तीर्थयात्री पड़ोसी देश नेपाल मे अवस्थित रामायण मे वर्णित स्थानों के दर्शन को भी जाएंगे।निश्चित तौर पर जुड़ता बढ़ता ये सांस्कृतिक सरोकार और धार्मिक पर्यटन दोनों देशों में दूरियों को पाटने का एक माध्यम बनेगा।वैसे इस मंदिर निर्माण के श्रीगणेश से आगामी समय में कई और बदलाव देखने को मिलेंगे।सीता जन्म तिथि को लेकर भ्रम का पटाक्षेप होगा ऐसा निश्चित है।जानकी नवमीं भी शासन से लेकर समाज तक मे दूसरे उत्सवों की तरह सर्वत्र मान्य एवं प्रचारति होगा।यही नहीं इस तीर्थ नगरी का विकास और नवीन सीता मंदिर के साथ ही सीतामढ़ी नाम तथा जन्म स्थान संबंधित समस्त विवादों का निस्तारण भी होगा।प्रधानमंत्री मोदी की सन् 2022 की लुम्बिनी यात्रा ने भगवान बुद्ध देव के जन्म स्थान संबंधित मुद्दे का दृश्यांत हुआ था।ऐसे ही इस देव स्थल के विकास से भगवती सीता के जन्म स्थान तक को लेकर होने वाले समस्त विवादों का अंत होना है।बुद्ध शिव राम कृष्ण और सीता सबो को लेकर कुछ भी पृथक अथवा किसी देश विशेष के एकाधिकार वाला अतीत में कभी रहा नही है।इन देवों की लीला क्रीड़ा भूमि तो युगों से भारत ही है।बस राजनैतिक निर्णय सीमाओं के बदलाव और नवीन एवं पृथक देशों के निर्माण नाते कुछ तीर्थ वर्तमान के भारत तो कुछ आसपड़ोस के देशों में अवस्थित है।किंतु ऐतिहासिक रूप से धर्म संस्कृति एवं परंपरा के तौर पर हिमालय से हिंद महासागर तक के सभी देश और उसके निवासी बिल्कुल एक से ही है।धरोहर और विरासत सभी पृथक नही साझे है।इसी सोच के अभाव नाते हाल ही में कंबोडिया और थाईलैंड के आपसी तनाव देखने को मिले है।अतः यदि इन बातों का ध्यान रखा जाए तो निश्चित रूप से ऐसा कोई भी विवाद भविष्य में संबधों मे कटुता अथवा विवादों का कारण नही बनेगा।

हिन्दू संस्कृति परंपरा अध्येता


