तीज और चौठचन्द्र : स्त्री–जीवन, विश्वास और संस्कृति के प्रतीक : कैलाश दास
कैलाश दास, जनकपुरधाम । धार्मिक एवं ऐतिहासिक नगरी जनकपुरधाम इस समय तीज और चौठचन्द्र पर्व की व्रतधारी महिलाओं की चहल–पहल से गुलजार है। हाथों में पूजन की थाली लिए, शिव–पार्वती और चन्द्रमा की आराधना में संलग्न महिलाओं की भीड़ सुबह से ही सरोवरों और मठ–मन्दिरों में देखी जा सकती है। यह दृश्य नारी–शक्ति और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रतीक प्रतीत होता है।
तीज, चौठचन्द्र और गणेश पूजनोत्सव में अधिकांश व्रतधारी महिलाएँ ही होती हैं। संतान प्राप्ति, पुत्र की दीर्घायु, पारिवारिक सुख–समृद्धि और स्वास्थ्य–आरोग्य ही इन व्रतों का मुख्य उद्देश्य है। जनकपुरधाम धार्मिक नगरी होने के कारण यहाँ वर्षभर व्रत–पर्वों की धूम रहती है। इसी बीच तीज की व्रतधारी महिलाओं के लिए विभिन्न मनोरंजनात्मक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया है, जिससे नगर और अधिक उत्साहपूर्ण बना है।
तीज : नारी आत्मबल और सामूहिकता का पर्व
तीज और चौठचन्द्र दोनों पर्व सीधे–सीधे नारी से जुड़े हुए हैं। ये पर्व नारी–जीवन, परिवार और समाज को जोड़ने वाले ही नहीं, बल्कि संस्कृति की निरंतरता और धार्मिक–सामाजिक एकता के अद्भुत प्रतीक भी हैं।
पहले तीज पर्व केवल पहाड़ी समुदाय में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता था, परन्तु अब यह पर्व मिथिला–मधेश में भी श्रद्धा और उल्लास के साथ स्थापित हो चुका है। भाद्र मास की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला तीज, शिव–पार्वती के मिलन दिवस के रूप में स्मरण किया जाता है। महिलाएँ हरितालिका पूजा करके हरी साड़ी, चूड़ी और पोते धारण कर सौन्दर्य और श्रद्धा का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती हैं।
तीज केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि नारी आत्मबल, पीड़ा और उल्लास को उजागर करने का अवसर भी है। विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु और पारिवारिक सुख–शान्ति की कामना करते हुए उपवास रखती हैं। तीज के गीत प्रायः नारी के संघर्ष, वेदना और सपनों से जुड़े होते हैं।
सावन माह से ही तीज की तैयारियाँ प्रारम्भ हो जाती हैं। बाजार हरी चूड़ी, रिबन, साड़ी और मेहन्दी से रंगीन हो उठते हैं। यह पर्व महिला उद्यमशीलता को भी प्रोत्साहन देता है, क्योंकि इस अवसर पर श्रृंगार सामग्री और वस्त्रों का व्यापार उल्लेखनीय रूप से बढ़ जाता है।
चौठचन्द्र : मातृत्व और समृद्धि की कामना
तीज के बाद आने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण पर्व है चौठचन्द्र, जिसे मिथिला भाषा में ‘चौरचन’ कहा जाता है। भाद्र मास की चतुर्थी रात को विवाहित महिलाएँ अपने परिवार और संतान की दीर्घायु एवं समृद्धि की कामना के साथ इसे मनाती हैं।
इस दिन महिलाएँ दिनभर उपवास करती हैं और सायंकाल चन्द्रमा उदय के पश्चात विशेष विधि से पूजा करती हैं। बाँस और मिट्टी के सूपा–डलिया, पकवान, पूरी–कचौरी, दही–चिउरा रखकर पूजा करने की परम्परा है। चन्द्रमा को अर्घ्य अर्पित कर परिवारजनों को प्रसाद बाँटा जाता है।
मिथिला में चौरचन को कृषि–जीवन से भी जोड़ा गया है। अपने ही खेत का चावल, गेहूँ का आटा और आँगन–बाड़ी के फल–सब्जियाँ पूजन में प्रयोग की जाती हैं। सहज और स्वाभाविक ढंग से मनाया जाने वाला यह पर्व राजा–रंक सबको समानता का भाव प्रदान करता है।
पूजा विधान
भाद्र शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व में महिलाएँ निराहार व्रत रखती हैं। सायंकाल चन्द्रमा उदय होने से पहले आँगन में अरिपन बनाकर पूजा सामग्री सजाई जाती है। कलश में दीपक और जल रखा जाता है। चन्द्रमा उदय होने पर महिलाएँ खीरा अथवा फल हाथ में लेकर उसका दर्शन करती हैं, मनोकामनाएँ स्मरण करती हैं और पूजन का समापन करती हैं। प्रत्येक परिवार में गृह–देवता की पूजा का भी विशेष महत्व होता है, जो इस पर्व से जुड़ा हुआ है।
सांस्कृतिक सन्देश
मधेश के ये दोनों पर्व नारी को केन्द्र में रखते हैं। जहाँ तीज वैवाहिक जीवन में विश्वास और समर्पण को बल देता है, वहीं चौठचन्द्र मातृत्व और पारिवारिक उत्तरदायित्व को प्राथमिकता देता है। ये पर्व नारी की भावना, श्रम और संस्कृति को सम्मान देने वाली परम्पराओं को निरंतरता प्रदान कर रहे हैं।
यद्यपि आधुनिकता के साथ–साथ महँगे वस्त्र, आभूषण और बाहरी आडम्बर ने इसकी मौलिकता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है, परन्तु इसके बावजूद भी तीज और चौरचन मधेशी समाज को एक सूत्र में बाँधने, स्त्री–जीवन का सम्मान करने और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का कार्य कर रहे हैं।
ये पर्व केवल धार्मिक कर्मकाण्ड मात्र नहीं हैं, बल्कि नारी–शक्ति, सामूहिकता, सृजनशीलता और संस्कृति के प्रति आस्था के जीवित प्रतीक हैं। आधुनिकता की धारा में भी ये पर्व अपनी मौलिकता बनाए रखें—यही मधेशी समाज की सामूहिक कामना है।



