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कर्फ्यू के बीच माइतीघर मंडल में संविधान पढ़ते अधिवक्ता, समाधान संविधान की चौखट में ही संभव है

 
फ़ोटो लाइब्रेरी

काठमांडू, 26 भदौ। कर्फ्यू के कड़े माहौल के बीच काठमांडू के माइतीघर मंडल में अधिवक्ता राजु बम्जन ने एक अनोखा कदम उठाया। गुरुवार सुबह 9:30 बजे वे काले कोट, सफेद शर्ट-पैंट और हाथ में संविधान लेकर माइतीघर पहुँचे और वहाँ सड़क किनारे बने एक पुराने प्रतीक्षालय की लोहे की बेंच पर बैठकर संविधान पढ़ना शुरू किया।

बम्जन का कहना है कि उनका उद्देश्य एक स्पष्ट संदेश देना था—
“वर्तमान संकट का समाधान संविधान की परिधि के भीतर ही खोजा जाना चाहिए, उससे दाएँ-बाएँ होने की अनुमति संविधान ने नहीं दी है।”

सैनिकों ने कई बार की पूछताछ

करीब 10 बजे से कर्फ्यू प्रभावी होने वाला था। इससे पहले ही सेना की कई टुकड़ियाँ वहाँ पहुँचीं और बम्जन से नाम, पता और पेशा पूछा। सैनिकों ने कहा कि “कुछ देर में कर्फ्यू शुरू होगा, आप यहाँ क्यों आए हैं?”

जवाब में अधिवक्ता बम्जन ने संविधान दिखाते हुए कहा—
“जैसे आप संविधान में व्यवस्था अनुसार नेपाली सेना के कमांडर के आदेश पर हथियार लेकर अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, वैसे ही मैं भी संविधान प्रदत्त दायित्व के अनुरूप यहाँ बैठा हूँ।”

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सैनिकों ने उन्हें बार-बार वहाँ से जाने का आग्रह किया, लेकिन बम्जन डटे रहे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे सिर्फ प्रतीकात्मक तौर पर संविधान पढ़ने आए हैं, किसी भी तरह की अशांति या भीड़ इकट्ठा करने का उनका इरादा नहीं है।

साथ में पहुँचे अन्य वकील

कुछ अन्य अधिवक्ता भी सामान्य पोशाक में वहाँ पहुँचे और बम्जन के अभियान का समर्थन जताया। हालांकि सुरक्षा बलों ने अन्य लोगों को तुरंत वहाँ से हटा दिया।

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करीब एक घंटे तक चले इस घटनाक्रम के बाद बम्जन 10:30 बजे वहाँ से लौटे। इस दौरान फोटो पत्रकारों ने उनकी तस्वीरें खींचीं—एक ओर हथियारबंद सैनिक और दूसरी ओर संविधान पढ़ते अधिवक्ता। यह दृश्य सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया।

“जेन-जी आंदोलन का समर्थन, पर समाधान संविधान में”

बम्जन ने साफ कहा कि वे जेन-जी आंदोलन की भावना के साथ हैं, लेकिन समाधान केवल संविधान के दायरे में ही संभव है। यही संदेश देने के लिए उन्होंने माइतीघर मंडल जैसे प्रतीकात्मक स्थल को चुना, जो हमेशा नागरिक आवाज उठाने का केंद्र रहा है।

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कानून व्यवसाय में सक्रिय

राजनीतिशास्त्र में स्नातकोत्तर बम्जन ने 2072 में संविधान जारी होने के बाद कानून की पढ़ाई शुरू की। वे पिछले 4-5 सालों से वकालत के पेशे में सक्रिय हैं और वर्तमान में कानून में स्नातकोत्तर कर रहे हैं। उनका कहना है कि संविधान के प्रति अपनत्व ने ही उन्हें यह रास्ता दिखाया।

“नागरिकों को यह संदेश पहुँचे कि समाधान संविधान की चौखट में ही संभव है, इसलिए मैं कर्फ्यू के बीच माइतीघर जाकर संविधान पढ़ने बैठा,” उन्होंने कहा। ऑनलाइन खबर से साभार

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