जेन–जी आंदोलन से जन्मा नया राजनीतिक परिदृश्य
देश मध्यावधि चुनाव की राह पर : सुशीला कार्की बनीं नेपाल की नई प्रधानमंत्री
काठमांडू, 13 सितम्बर, विशेष रिपोर्ट । नेपाल की पहली महिला प्रधानन्यायाधीश रह चुकी सुशीला कार्की अब देश की पहली महिला प्रधानमंत्री भी बन गई हैं। जेन–जी आंदोलन की पृष्ठभूमि में बने इस ऐतिहासिक फैसले ने नेपाल को एक नए राजनीतिक अध्याय में प्रवेश कराया है। राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने संविधान के धारा 61 (4) का प्रयोग करते हुए कार्की को देश की 46वीं प्रधानमंत्री नियुक्त किया। उनके नेतृत्व में बना अंतरिम नागरिक सरकार अब 21 फागुन (मार्च 2026) को होने वाले मध्यावधि चुनाव तक देश का संचालन करेगी।
जेन–जी आंदोलन से जन्मा नया राजनीतिक परिदृश्य
23 और 24 भदौ को भ्रष्टाचार और कुशासन के विरुद्ध सड़कों पर उतरे जेन–जी युवाओं के आंदोलन ने महज दो दिनों में राजनीतिक सत्ता पलट दी। इस आंदोलन में अब तक 51 से अधिक युवाओं की जान गई है। उनका सपना था– साफ शासन, जवाबदेही और नई राजनीति। इसी दबाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा और विपक्षी दलों की सहमति से सुशीला कार्की का नाम आगे आया।
संसद विघटन और चुनाव की घोषणा
प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के तुरंत बाद कार्की ने प्रतिनिधि सभा विघटन की सिफारिश की, जिसे राष्ट्रपति ने मान लिया। अब छह महीने के भीतर नए चुनाव होंगे। यह निर्णय कांग्रेस, एमाले और माओवादी जैसे बड़े दलों को स्वीकार्य नहीं है। इन दलों ने संसद विघटन को “असंवैधानिक” बताते हुए इसका विरोध किया है। दूसरी ओर रास्वपा (राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी) ने इसे जनभावना के अनुरूप बताते हुए स्वागत किया है।
अंतरराष्ट्रीय बधाइयाँ
संयुक्त राष्ट्र, भारत, ब्रिटेन और जापान समेत कई देशों ने कार्की को बधाई दी है। सभी ने उम्मीद जताई है कि नेपाल उनके नेतृत्व में शांति, स्थिरता और लोकतांत्रिक संक्रमण की दिशा में आगे बढ़ेगा। भारत ने तो विशेष रूप से “नजदीकी साझेदारी और विकास सहयोग” का भरोसा दोहराया है।
सुशीला कार्की : संघर्ष और निडरता की पहचान
2008 में मोरंग के शंकरपुर में जन्मी कार्की लंबे समय तक वकालत और न्यायपालिका में सक्रिय रहीं।
2016 में वे नेपाल की पहली महिला प्रधानन्यायाधीश बनीं।
भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के मामलों में कठोर रुख अपनाने के कारण उन्हें महाभियोग का सामना करना पड़ा, लेकिन वे अपने निर्भीक स्वभाव और ईमानदारी के लिए जानी जाती हैं।
नई सरकार के सामने चुनौतियाँ
सुशासन और भ्रष्टाचार नियंत्रण : जेन–जी आंदोलन की मूल मांग यही थी। कार्की को पारदर्शी छानबीन और कठोर कार्रवाई करनी होगी।
मध्यावधि चुनाव की तैयारी : 21 फागुन तक चुनाव कराने के लिए सभी दलों को शामिल कर समावेशी माहौल बनाना सबसे कठिन कार्य होगा।
राजनीतिक सहमति का अभाव : बड़े दल संसद विघटन से असहमत हैं। यह मुद्दा अदालत में भी जा सकता है।
आर्थिक पुनर्निर्माण : आंदोलन और दमन के दौरान नेपाल को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। आठ खरब से अधिक की क्षति का आकलन किया गया है।
अंतरराष्ट्रीय विश्वास : नेपाल को राजनीतिक अस्थिरता से बाहर निकालकर विदेशी सहयोग और निवेश का भरोसा पुनः अर्जित करना होगा।
निष्कर्ष
सुशीला कार्की का प्रधानमंत्री बनना केवल एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि जनआक्रोश और युवाशक्ति की जीत है। लेकिन यह जीत तभी सार्थक होगी जब आने वाले छह महीनों में भ्रष्टाचार पर काबू पाया जाए, सुशासन की नींव रखी जाए और शांतिपूर्ण ढंग से चुनाव सम्पन्न हों।
नेपाल अब एक निर्णायक मोड़ पर है—या तो यह परिवर्तन देश को नई दिशा देगा, या फिर दलों के बीच टकराव इसे और गहरे संकट में धकेल देगा।


