देश के सभी नेताओ को जेल भेजा जाय : जेनजी
जेन जी प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि देश के सभी नेताओ को जेल भेजा जाय. नेताओं का साथ देने वाले अफसरों को भी तुरंत पद से हटाया जाए और सलाखों के पीछे भेजा जाए. सुशीला कार्की कह चुकी हैं कि देश में कानून का शासन स्थापित करने के लिए सबकुछ करेंगी. भ्रष्ट लोगों पर एक्शन लिया जाएगा, लेकिन प्रदर्शनकारी मानने को तैयार नहीं. रोज नई शर्तें रख रहे हैं.
जेन जी का नेतृत्व कर रहे सुदन गुरुंग ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, केपी शर्मा ओली सरकार के सभी मंत्रियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए. हमारी सबसे पहली डिमांड यही है कि करप्शन को अगर देश से खत्म करना है तो नेताओं को जेल भेजना होगा. पीएम सुशीला कार्की हमारी मां हैं और हम मानते हैं कि वह हमारी रक्षा करेंगी. सुदन गुरुंग एक एनजीओ हामी नेपाल के संस्थापक हैं. वे कहते हैं कि ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के 2024 करप्शन परसेप्शन्स इंडेक्स में नेपाल 180 देशों में 107वें स्थान पर पहुंच गया, ये सब नेताओं की वजह से हुआ.
फिर पलट देंगे सरकार
सुदन गुरुंग से जब पूछा गया कि क्या आपको लगता है कि यह आंदोलन फेल हो जाएगा? इस पर गुरुंग ने कहा, फेल होने की कोई गुंजाइश नही. उन्होंने 6 महीने का वक्त दिया है और यह अच्छा समय है. सुदन गुरुंग ने धमकी दी कि अगर उनकी मांगें नहीं पूरी की गई तो वह सुशीला कार्की सरकार को भी गिरा देंगे. हालांकि, उन्हें उम्मीद है कि सरकार उनकी सारी डिमांड पूरा करेगी. कुछ पर काम भी शुरू हो गया है. गुरुंग ने कहा, प्रधानमंत्री ने एंटी करप्शन कमेटी बनाने का वादा किया है, हमले की जांच के लिए पैनल बनाया है, यह अच्छा कदम है.
भड़क सकता है विद्रोह
नेपाल के पूर्व आर्मी जनरल बिनोज बस्नेत ने कहा, ओली जैसे ताकतवर नेताओं के खिलाफ कार्रवाई बवाल बढ़ा सकती है. क्योंकि वे आज भी नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (यूनिफाइड मार्क्सवादी–लेनिनवादी) के अध्यक्ष हैं. उन्हें देश में मजबूत समर्थन मिला हुआ है. जहां अन्य दलों नेता शांति में यकीन रखते हैं, वहीं ओली की पार्टी विद्रोह कर सकती है.
नेपाल किस मोड़ पर
नेपाल की राजनीति पर नजर रखने वाले एक्सपर्ट्स का मानना है कि नेपाल एक ऐसे मोड़ पर है, जैसा 2008 में था जब माओवादी आंदोलन ने राजशाही को उखाड़ फेंका था. जिसके बाद एक दशक से अधिक समय तक अशांति रही, सरकार अस्थिर रही और अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई. तब से नेपाल में 14 सरकारें बदल चुकी हैं. लगातार विद्रोह की वजह से गरीब अमीर की खाई बढ़ रही है. बेरोजगारी दर 20% से ज्यादा हो चुकी है. नेपाल की युवा आबादी का एक तिहाई हिस्सा नौकरी के लिए देश छोड़ चुके हैं.
बांग्लादेश से तुलना क्यों
नेपाल की तुलना बांग्लादेश से हो रही. कहा जा रहा कि पीएम सुशीला कार्की को बांग्लादेश की तरह मुश्किलें नहीं झेलनी पड़ रहीं. नेपाल में जहां तख्तापलट के बाद से शांति है. वहीं बांग्लादेश में आज भी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. नेपाल सरकार में सलाहकार की भूमिका निभा चुके पुरंजन आचार्य कहते हैं कि अगर कार्की प्रयोग सफल नहीं हुआ तो आने वाले वक्त में ऐसी सरकार बनना मुश्किल हो जाएगा, जिस पर सब भरोसा कर सकें. इससे देश दशकों तक अशांति में फंस सकता है.
कार्की के सामने क्या चुनौतियां
राजनीतिक संकट के बीच नेपाल की 43 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था दुरुस्त करनी होगी. क्योंकि प्रदर्शनों की वजह से टूरिज्म और इन्वेस्टमेंट में गिरावट आई है.
कार्की सरकार ने कहा है कि वह 5 मार्च को चुनाव कराने की योजना बना रही है, हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसे और छह महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है. क्योंकि युवाओं को अपना नेतृत्व तय करने का समय देना होगा.
यह आंदोलन पूरी तरह से भ्रष्टाचार के बारे में है. इसलिए ओली और शेर बहादुर देउबा जैसे नेता और उनके करीबी सहयोगी चुनाव नहीं लड़ेंगे. पार्टियों को नए चेहरे तलाशने होंगे.
सुदन गुरुंग एक नई पार्टी बनाने की कोशिश में जुटे हैं. उन्होंने कहा, ऐसा चुनाव होना चाहिए जिसका नतीजा हर कोई स्वीकार करे ताकि फिर से देश में प्रदर्शन की नौबत न आए.

