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बोक्सी (डायन)–विरोधी प्रतिरोध और लोकसंस्कृति का जीवंत प्रतीक : झिझिया नृत्य कैलाश दास

 

कैलाश दास, जनकपुरधाम, २५ सितम्बर। दशहरे के प्रारंभ के साथ ही तराई–मधेश विशेषतः मिथिलांचल के गाँव–गाँव और चौक–चौराहों में लोकनृत्य झिझिया की गूँज सुनाई देने लगती है। यह नृत्य सामान्य नृत्यों से सर्वथा भिन्न है, जिसे हर कोई प्रस्तुत नहीं कर सकता। विशेषकर दलित समुदाय की महिलाएँ इसे प्रस्तुत करती हैं। इसमें आस्था, रहस्य और सामाजिक प्रतिकार का गहरा भाव समाया है।

किंवदंती है कि झिझिया का आरंभ डाइन–जोगिन अर्थात् बोक्सी (डायन) की काली शक्तियों और जादूटोना से बचाव के लिए हुआ। घटस्थापना से लेकर विजयादशमी तक महिलाएँ अपने सिर पर छिद्रयुक्त घड़ा रखती हैं, जिसके भीतर मिट्टीतेल का दीपक प्रज्वलित होता है, और तालबद्ध लय में नृत्य करती हैं। लोकविश्वास है—यदि कोई बोक्सी उस घड़े के छिद्र गिनने में सफल हो जाए, तो नृत्य करने वाली महिला तत्काल प्राण त्याग देगी। यही रहस्य इस नृत्य को और भी गंभीर व रोमांचक बनाता है।

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झिझिया के अपने गीत और ताल होते हैं। इन गीतों में देवी दुर्गा की स्तुति के साथ-साथ बोक्सी को गालियाँ और धमकियाँ दी जाती हैं। समाज में आज भी विश्वास है कि “बोक्सी को गाली देने से उसकी अनिष्टकारी शक्ति नष्ट हो जाती है।” वरिष्ठ साहित्यकार रामभरोष कापड़ी कहते हैं—“झिझिया केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का एक सांस्कृतिक अस्त्र है, जो सुरक्षा और प्रतिरोध का प्रतीक है।”

इतिहासकार मानते हैं कि सातवीं–आठवीं शताब्दी में जब बोक्सी प्रकरण और अंधविश्वास चरम पर था, उसी समय समाज ने प्रतिरोध स्वरूप झिझिया का सूत्रपात किया। उस दौर में बच्चों की मृत्यु, महामारी और आपदाओं को डायन के टुनामुना से जोड़कर देखा जाता था। माताएँ अपने संतानों की रक्षा के लिए दुर्गा की स्तुति करते हुए यह नृत्य करती थीं।

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आज भी विजयादशमी की रातें जनकपुरधाम झिझिया से आलोकित रहती हैं। चौक–चौराहों पर महिलाएँ समूह में नृत्य करती हैं, देवी को पुकारती हैं और गीत गाती हैं। अब यह परम्परा प्रतियोगिताओं और मंचीय प्रस्तुतियों तक पहुँच चुकी है, किन्तु इसका मूल भाव अब भी आस्था और सुरक्षा ही है।

झिझिया गीतों का रंग भी अनोखा है। इनमें देवी की स्तुति के साथ बोक्सी को सामाजिक बहिष्कार और अपमान की चेतावनी दी जाती है—

“कोठा के ऊपर डैनिया, खिड़की लगै ले ना…
गदहा पर चढ़ैबौ, गदहा चढ़ाए डैनिया, नमुहाँ हसैबौ ना…”

भावार्थ—यदि तूने जादूटोना करने की चेष्टा की, तो गाँववाले तुझे गधे पर बिठाकर पूरे गाँव में घुमाएँगे और तेरे अपमान का डंका बजाएँगे।

किन्तु झिझिया का एक व्यंग्यात्मक और मनोरंजक पक्ष भी है। नृत्य प्रस्तुत करते हुए महिलाएँ गाँव के प्रतिष्ठित लोगों के घर जाती हैं और “पूर्णाहुति” के नाम पर चन्दा मांगती हैं। इस प्रकार यह नृत्य केवल अंधविश्वास के प्रतिरोध तक सीमित नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता और सहभागिता का भी प्रतीक है।

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समाज रूपान्तरण के साथ बोक्सी घटनाएँ घट चुकी हैं, पर झिझिया की परम्परा आज भी जीवित है। मिथिला नाट्य कला परिषद्, राजदेवी युवा क्लब, रामानन्द युवा क्लब जैसे संगठन इसे संरक्षित कर रहे हैं और दशहरे में प्रतियोगिताएँ आयोजित कर नई पीढ़ी तक लोकप्रिय बना रहे हैं।

सिर पर प्रज्वलित दीपक सहित घड़ा धारण कर नृत्य करती महिलाएँ केवल कलाकार ही नहीं, बल्कि संस्कृति की संरक्षक और समाज के आत्मबल की प्रतीक भी हैं। झिझिया वास्तव में मिथिला समाज की आस्था, प्रतिकार और कला का अद्वितीय संगम है—जिसे सुरक्षित रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

कैलास दास
जनकपुरधाम

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