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तबाही के मंजर में विकास की तलाश : डॉ. श्वेता दीप्ति

 

लगभग दो–तिहाई जनमत वाली एक शक्तिशाली सरकार २८ घंटों में गिर गई

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी आवरण, सितम्बर ।

एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में नेपाल की पहचान विश्व–मानचित्र पर है, जो कभी गुलामी की जंजीर में नहीं बंधा, किन्तु यह विडम्बना है कि यहाँ शांति और विकास की गति हमेशा अनिश्चित रही है और यह हमेशा अस्थिर रहा है । राजतंत्र से लोकतंत्र का सफर अत्यन्त दुरूह रहा । २०४६ के जनांदोलन की ताकत से बहुदलीय व्यवस्था की बहाली के बाद से ही नेपाल में हर दस साल में उथल–पुथल मचती रही है । तत्कालीन नेपाली कांग्रेस और संयुक्त वाम मोर्चा द्वारा चलाए गए आंदोलन की ताकत से ३० साल पुरानी निरंकुश पंचायत व्यवस्था २६ चैत्र, २०४६ ईसा पूर्व को ध्वस्त हुई थी ।

उस समय, राजा और आंदोलनकारी दलों के बीच एक संवैधानिक राजतंत्र और बहुदलीय व्यवस्था स्थापित करने के लिए एक समझौता हुआ था । हालाँकि, गणतंत्र समर्थक दलों ने इस समझौते को अस्वीकार कर दिया था । राजा और संयुक्त आंदोलन के दलों के बीच समझौता देश और जनता के साथ एक बड़ा विश्वासघात माना गया था । जनआन्दोलन के नायक प्रचण्ड बने । कई उतार चढाव और विघटन के बाद उनके नेतृत्व में, १ फाल्गुन, २०५२ को तत्कालीन शाही शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह की घोषणा की गई । यह संयोग ही है कि जब से माओवादियों ने जनयुद्ध शुरू किया है, नेपाल की राजनीति में हर १०–१० साल में उथल–पुथल मची है । माओवादियों ने राष्ट्रीयता, लोकतंत्र और लोगों की आजीविका से जुड़ी ४२ मांगों के साथ जनयुद्ध की घोषणा की थी । हालाँकि, सरकार द्वारा माओवादियों की मांगों को समय पर पूरा न करने पर राज्य को भारी नुकसान हुआ था । गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और आर्थिक पिछड़ेपन से घिरे मजदूरों, किसानों, श्रमिकों, उत्पीडि़त जातीय समूहों, महिलाओं, मुसलमानों, मधेशियों, थारूओं और अन्य वर्गों व समुदायों के बल पर माओवादी विद्रोह अपने चरम पर पहुंच गया था । १९ जेष्ठ, २०५८ को राजमहल नरसंहार में राजा वीरेंद्र के वंश के विनाश के बाद ज्ञानेंद्र १९ माघ, २०६१ को सत्ता में आए । ज्ञानेंद्र के तख्तापलट से नाराज तत्कालीन सात संसदीय दल माओवादियों के साथ मिल गए । ७ मंसिर, २०६२ को दोनों दलों के बीच १२ सूत्री समझौता हुआ । उस समझौते के आधार पर २०६२÷६३ में १९ दिनों के जनांदोलन ने २३८ साल से चले आ रहे राजतंत्र का अंत कर दिया । २४ चैत्र, २०६२ को शुरू हुआ यह आंदोलन ११ बैसाख तक चला ।

राजशाही के पतन के बाद, संविधान सभा ने १५ जेष्ठ, २०६५ को एक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की घोषणा की । हालाँकि, संविधान सभा स्वयं २०६९ में भंग हो गई थी क्योंकि वह गणतंत्र को संस्थागत बनाने वाला मुख्य कानून नहीं बना सकी थी । २०७० में आयोजित दूसरी संविधान सभा में संघवाद, शासन के स्वरूप और राज्य पुनर्गठन पर प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनने के बाद, २०७२ को एक नया संविधान लागू किया गया । उस वर्ष की शुरुआत में, विनाशकारी भूकंप में हुई भारी जान–माल की क्षति के बाद, सभी दलों ने अपने मतभेदों को भुलाकर एक संविधान का मसौदा तैयार करने पर सहमति व्यक्त की थी । इसे नेपाल के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण ‘मोड़’ भी माना जाता है ।

आम जनता का मानना था कि नेपाल में के नए संविधान के बनने के बाद, देश राजनीतिक स्थिरता, सुशासन और समृद्धि प्राप्त करेगा । इसी विश्वास के आधार पर, पारंपरिक राजनीतिक दलों को जनता ने मान्यता दी । जैसे–जैसे चुनाव जीतने वाले राजनीतिक दल अपने ‘जनादेश’ के विपरीत सरकार बनाने और गिराने में व्यस्त होते गए, जनता का आक्रोश बढ़ता गया ।

२०७९ में हुए चुनावों में, राष्ट्रीय स्वतंत्रत पार्टी, जनमत पार्टी और नागरिक उन्मुक्ति पार्टी जैसी नई और वैकल्पिक ताकतों को राजनीतिक दलों के प्रति जनता के आक्रोश के कारण लोकप्रिय वोट मिले । लेकिन नई पार्टियों वाली सरकार भी आम असंतोष को दूर करने वाला कोई कार्यक्रम नहीं बना सकी । व्यापक जन असंतोष के बावजूद, पारंपरिक दल, कांग्रेस, एमाले और माओवादी, सत्ता की राजनीति के पुराने खेल में शामिल हो गए । प्रचंड के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार को हटाने के बाद, पिछले साल दो प्रमुख दलों, कांग्रेस और एमाले, की गठबंधन सरकार बनी । परंतु यह सरकार भी आम जनता के असंतोष को सुलझाने के बजाय उसे और भड़काने की ओर ही अग्रसर रही । जिसका परिणाम आज नेपाल की जनता के समक्ष है ।

एक बार फिर नेपाल के इतिहास में एक और काला दिन शामिल हो गया । भाद्र २३ को न्यू बानेश्वर में भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ जेन जी ने विरोध प्रदर्शन किया । जेनरेशन जेड, जिसे फेसबुक, इंस्टा, रेडिट, डिस्कॉर्ड, पबजी और फ्री फायर का शौकीन कहा जाता है, यानी १९९७ से २०१० के बीच पैदा हुई पीढ़ी, जिसे हम जेनजी भी कहते हैं, इस प्रदर्शन के केंद्र में थे । इनके नारों में गुस्सा था और यह गुस्सा अनावश्यक भी नहीं था । लेकिन इस आवाज को दबाने के लिए सरकार ने जो कदम उठाए, वह निंदनीय ही नहीं बर्बरतापूर्ण था । आन्दोलन के दो घंटे के बाद ही सरकार ने गोली चलाने का आदेश देकर जो दमन नीति अपनाई उसने देश की दशा और दिशा दोनों ही बदल दी । दो घंटे के भीतर बीस युवाओं की मौत हो गई । देश सन्नाटे में था । जो खून बहा था वह किसी पार्टी, किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं बहा था, बल्कि देश के लिए बहा था । ये वो युवा थे जो अपने ही देश से नाराज और निराश थे । सड़कों पर लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक शांतिपूर्ण विद्रोह हो रहा था, जो रक्तरंजित हो गया था । मौत का आंकड़ा बढ़ता जा रहा था और उसके साथ ही आक्रोश भी । उसके बाद जो हुआ वह सोच से बिल्कुल विपरीत था । जेन जी आन्दोलन हैक हो गया और नेपाल जल उठा ।

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ये साजिश किसकी थी, घुसपैठ कहाँ से हुई यह तो समय बताएगा किन्तु यह एक कु्रर सत्य है कि देश की जो क्षति हुई वह सालों संभलने का मौका नहीं देगी । प्रदर्शन का अर्थ ही होता है आक्रोशपूर्ण नारे और थोड़ी अराजकता । किन्तु क्या ऐसे में देखते ही गोली मारने का आदेश देना उचित था ? ये युवा स्वतः स्फूर्त रुप में सड़कों पर थे सिर्फ स्नैपचैट, डिस्कॉर्ड, रेडिट आदि नेटवर्कों की आभासी अपीलों के माध्यम से । नेपाल, एक ऐसा देश जहाँ लगातार आंदोलन होते रहे हैं । इस नई पीढ़ी ने अपने जीवनकाल में कोई बड़ा परिवर्तनकारी आंदोलन नहीं देखा, बल्कि फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, रेडिट आदि पर अपनी भावनाओं और गुस्से को व्यक्त किया है, जो सड़कों पर थे । यह पीढ़ी समझती है कि सोशल मीडिया बंद होने से उनकी जीवनशैली पर कब्जÞा कर लिया गया है । यह आक्रोश इनमें मौजूद था । किन्तु सोशल मीडिया बंद होना विद्रोह के लिए एक तात्कालिक कारण बना । आक्रोश की आग तो पहले से ही आम जन में मौजूद थी ।

जेन जी की मौत से आक्रोशित युवाओं ने राज्य के तीनों अंगों– कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका को जला कर राख कर दिया और उस पर कब्जा कर लिया । उन्होंने शासक, प्रशासन और पार्टी नेताओं के आवासों और पार्टी कार्यालयों में आग लगा दी । राज्य के तीनों अंगों के मुख्य केंद्रों को जलाने वाले प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति आवास, शीतल निवास और प्रधानमंत्री आवास, बालुवाटार को भी जला दिया । नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा और उनकी पत्नी आरजू को पीटा गया और उनके घरों को जला दिया गया ।

अधिकांश पार्टी कार्यालय जला दिए गए । नेताओं के घर जला दिए गए । हालाँकि, शीर्ष नेताओं को नेपाली सेना द्वारा संरक्षित किया गया था । इतना ही नहीं देश के कई व्यापारिक संस्थान सीजी ग्रुप, भाटभटेनी आदि को भी जलाकर राख कर दिया गया । अरबों की लागत से बना होटल हिल्टन को धाराशायी कर दिया गया । कई शिक्षण संस्थान समाप्त हो गए । विभिन्न जेलों से हजारो कैदी भाग गए । यह सारी परिस्थितियाँ आज या आने वाले कई सालों के लिए देश हित में तो बिल्कुल नहीं है । इतनी विध्वंश स्थिति के पीछे जेन जी का हाथ हो सकता है, यह संभव नहीं लगता । पर्दे के पीछे किसका हाथ है यह शोध का विषय है । परंतु इन सबके बीच सरकार के हाथों से सत्ता निकल गई और २८ घंटों के अन्दर ओली सरकार का पतन हो गया । नेपाल के इतिहास में शायद यह पहली बार है कि लगभग दो–तिहाई जनमत वाली एक शक्तिशाली सरकार २८ घंटों में गिर गई । तानाशाही का रूप बने ओली को इस्तीफा देना पड़ा । सरकार ने प्रतिरोध के नाम पर जो क्रूर दमन किया, उससे यह पहले ही स्पष्ट हो चुका था कि देश में केपी ओली के नेतृत्व वाली सरकार की वैधता अब समाप्त हो चुकी है । नई पीढ़ी की भावनाओं का लगातार अवमूल्यन करके सत्ता में बने रहने वाले प्रधानमंत्री ओली और उनके सत्ता सहयोगियों के इरादे पूरे समाज के सामने उजागर हो चुके थे । इसके साथ ही, शीर्ष नेतृत्व में शामिल शेर बहादुर देउबा और पुष्प कमल दहाल की राजनीतिक उपयोगिता भी समाप्त हो गई थी । उन्होंने २०६३ के बदलाव के बाद के महत्वपूर्ण वर्षों को अपनी अदूरदर्शिता के कारण बरबाद कर दिया ।

देश का बदलता परिदृश्य
चार दिनों के बदलते परिवेश ने यह तो स्पष्ट कर दिया कि सभी पार्टियों को जेनजी पीढ़ी के भीतर उठ रहे असंतोष और आक्रोश की जानकारी नहीं हुई, और अगर जानकारी थी भी, तो सरकार समय रहते इसका समाधान क्यों नहीं कर पाई ? युवा पीढ़ी और राजनीतिक दलों के बीच इतनी दूरी कैसे बढ़ गई ? लगभग सभी दलों के पास छात्र संगठन थे, लेकिन वे छात्र संगठन समय रहते जेन जी पीढ़ी की माँगों को समझकर अपनी पार्टियों को आगाह क्यों नहीं कर पाए ? इन सभी सवालों का जवाब सीधा है– नेतृत्व के लिए पुरानी पीढ़ी का बढ़ता लालच और पार्टी के भीतर अलग राय रखने वालों की लगातार उपेक्षा । शासन का नशा ऐसा था कि युवाओं को नेतृत्व देने की इच्छा ही नेताओं की नहीं थी । ऐनकेन प्रकारेण वो सत्ता में बने रहना चाहते थे । भ्रष्टाचार ने तो अपनी सारी सीमाएँ ही पार कर ली है । बेरोजगारी, गरीबी, युवाओं का निरंतर पलायन, ये सारी बातें ऐसी थीं कि परिवर्तन की आकांक्षा लाजिमी थी । परंतु इन सभी बातों में एक सवाल सभी के जेहन में है कि क्या किसी बड़ी शक्ति या सहायता के बिना यह आन्दोलन संभव था ? आखिर इस पर्दे के पीछे कौन है ? नेपाल की राजनीति में जब भी कोई परिवर्तन हुआ है तो सबसे पहले आरोप की ऊँगली पड़ोसी राष्ट्र भारत की ओर ही उठती है । भारत के ऊपर यह आरोप लगता रहा है कि वह नेपाल में शांति नहीं चाहता किन्तु वर्तमान का अगर आकलन किया जाए तो यह आरोप निराधार नजर आता है । क्योंकि भारत अभी इस स्थिति में बिल्कुल नहीं है कि वह नेपाल की अस्थिरता में भारत की मजबूती तलाश करे । अभी जबकि पाकिस्तान, बांगलादेश, श्रीलंका, तुर्की सभी भारत के खिलाफ मोर्चाबंदी कर रहे हैं इस हालात में वह नेपाल को अस्थिर करने की नहीं सोच सकता । चीन चुप है और उसकी नीति हमेशा से अपने लगाए हुए निवेश की सुरक्षा पर निर्भर रहती है । वैसे नेपाल में अपने वर्चस्व को कायम रखने की उसकी चाहत हमेशा रही है और इसके जड़ में भारत को कमजोर करना रहा है । दूसरी ओर अमेरिका है जो भारत और चीन की नजदीकी से परेशान है । वह किसी भी हालत में भारत और चीन की नजदीकी नहीं देख सकता । ऐसे में नेपाल में दखल करना उसकी साजिश हो सकती है । विश्लेषक भी इस ओर इशारा कर रहे हैं । खैर, बहुत ऐसे सवाल हैं जिसका जवाब वक्त के साथ देश की जनता अवश्य जानेगी ।

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सरकार के पतन के साथ ही सरकार के गठन की प्रक्रिया भी शुरु हुई । नई सरकार के गठन में कई संवैधानिक चुनौतियाँ थीं । नए प्रधानमंत्री के रूप में सबसे अधिक जो नाम सामने आ रहा था, वह था काठमान्डू के मेयर बालेन शाह का । बालेन शाह ने जेन जी को आगे बढ़ने के लिए उत्साहित किया था । किन्तु जब सब कुछ अस्तव्यस्त था तब ये जाने कहाँ नदारद थे । और उन्होंने प्रधानममंत्री बनना स्वीकार नहीं किया । फिर एक नाम सशक्त रूप से सामने आया जो था पूर्व प्रधानन्यायाधीश सुशीला कार्की का । जो नेपाल की पहली महिला प्रधानन्यायाधीश हैं और आज नेपाल के इतिहास में पहली महिला प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य भी उन्हें प्राप्त हुआ है । राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने आंदोलन के माध्यम से स्थापित जेन जी शक्ति की माँग के अनुसार सुशीला कार्की को प्रधानमंत्री नियुक्त किया है ।

विश्व के इतिहास में ऐसे कई राजनीतिक परिवर्तन हुए हैं, जिनमें आंदोलन के माध्यम से स्थापित सत्ता भविष्य का मार्ग तैयार करती है । नेपाल के राजनीतिक इतिहास में भी अब तक यही होता आया है । जेन जी के आंदोलन ने संविधान को कुछ हद तक चोट पहुँचाई है । लोकतांत्रिक मूल्यों को कुछ हद तक कमजÞोर किया है । ऐसे में, देश का नेतृत्व करने के लिए राजनीतिक क्षेत्र में आए नेताओं को स्थिति का सही आकलन करना चाहिए और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देश को संकट से उबारने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन करना चाहिए ।

यह समय बहुत ही संवेदनशील है । ऐसे में कार्की का प्रधानमंत्री बनना निश्चय ही चुनौतीपूर्ण है । उनके समक्ष एक ऐसा नेपाल है जो हर तरफ से बिखरा हुआ है । उनके समक्ष एक सक्षम टीम की आवश्यकता है । दरअसल, नेतृत्व की असली क्षमता संकट के समय ही परखी जाती है । देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनकर इतिहास रचने वाली पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की अपनी सेवानिवृत्ति के लगभग आठ साल बाद देश की बागडोर संभालने जा रही हैं । न्यायपालिका में अपने कार्यकाल के दौरान अपनी ईमानदारी और निष्ठा के कारण चर्चित रहीं पूर्व प्रधान न्यायाधीश कार्की, जेन जी विरोध प्रदर्शनों के दौरान क्षतिग्रस्त हुए देश को नेतृत्व प्रदान कर रही हैं और आगामी चुनावों के बाद आने वाले नए जनप्रतिनिधियों को देश की सत्ता सौंपेंगी । पिछले कुछ वर्षों से देश के राजनीतिक स्तर पर देखी जा रही विकृतियों और विसंगतियों पर तीखी टिप्पणियाँ करती रही कार्की को प्रदर्शनकारी जेन जी, काठमांडू महानगरपालिका के मेयर बालेन और प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने समर्थन दिया है ।

पूर्व प्रधानन्यायधीश कार्की का कार्यकाल काफी चर्चित रहा है । कार्की एक जीवट, जिद्दी और सशक्त महिला के तौर पर जानी जाती हैं । उनके कार्यकाल के दौरान, उच्च न्यायालय में ८० न्यायाधीशों की नियुक्ति हुई, जो बाद में विवादास्पद हो गया । अपनी आत्मकथा में, उन्होंने खुलासा किया कि तत्कालीन कांग्रेस नेता रमेश लेखक और माओवादी नेता बर्षमान पुन ने नियुक्ति प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने और उन पर दबाव बनाने की कोशिश की थी । प्रधान न्यायाधीश के रूप में सेवानिवृत्त होने से लगभग ४० दिन पहले ही उन्हें महाभियोग का सामना करना पड़ा । सत्तारूढ़ कांग्रेस और माओवादी सांसदों ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव दायर किया, लेकिन बाद में सर्वोच्च न्यायालय के एक अंतरिम आदेश के कारण महाभियोग प्रस्ताव रद्द कर दिया गया । सड़कों पर व्यापक विरोध के बाद, सांसदों को महाभियोग प्रस्ताव वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा । महाभियोग के बाद सर्वोच्च न्यायालय में लौटने पर, उन्होंने लगभग एक महीने तक सर्वोच्च न्यायालय में मामलों की सुनवाई नहीं की और प्रशासनिक कार्यों तक ही सीमित रहकर सेवानिवृत्त हो गईं । वह महाभियोग का सामना करने वाली पहली मुख्य न्यायाधीश भी बनीं । पुलिस महानिरीक्षक की नियुक्ति विवाद में न्यायालय के फैसले से अपने हितों की पूर्ति न होने पर कांग्रेस और माओवादियों ने उन पर महाभियोग चलाया था । सर्वोच्च अदालत की संवैधानिक पीठ ने उनके महाभियोग को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ कहा था । कार्की की छवि साफ सुथरी है शायद इसलिए जेन जी ने उनके नेतृत्व में नए नेपाल के निर्माण की संभावना देखी है ।
राजनीति में नैतिकता सबसे मूल्यवान शक्ति है । नैतिकता के बिना राजनीति अव्यवस्थित और अराजक होती है । इसलिए, जो कोई भी राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करता है, उसे नैतिकता की कसौटी पर खरा उतरना होता है । आज देश की जो हालत है वह इसी नैतिकता की कमी की वजह से है । जेन जी पीढ़ी के युवाओं को विद्रोह करना पड़ा क्योंकि न केवल कांग्रेस, एममाले, माओवादी केंद्र के नेता, बल्कि वैकल्पिक शक्ति होने का दावा करने वाली रास्वपा के नेता भी नैतिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाए । हमें यह उम्मीद करनी होगी कि आगे का परिदृश्य ऐसा नहीं हो क्योंकि अगर ऐसा कुछ होता है तो एक और अकल्पनीय आपदा का सामना करना पड़ सकता है, जिसके परिणामों का आकलन करना भी मुश्किल होगा ।

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वर्तमान में, सभी दल संसद के विघटन पर सवाल उठा रही हैं । संसद का विघटन राष्ट्रपति द्वारा आंदोलन द्वारा स्थापित सत्ता के साथ एक समझौते के अनुसार किया गया है । किसी भी आंदोलन की सफलता के बाद उत्पन्न होने वाले संक्रमण काल के प्रबंधन में आंदोलन द्वारा स्थापित सत्ता के रोडमैप को महत्व देने का इतिहास विश्व राजनीति के कई अध्यायों में मिलता है । जिस तरह से पुरानी शक्तियाँ अभी संसद के विघटन पर सवाल उठा रही हैं, उससे संक्रमण काल को लम्बा खींचने और देश को और अस्थिरता की ओर ले जाने के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा ।

तालिबान, जिसे दुनिया कभी ‘आतंकवादी’ कहती थी, अब अफÞगÞानिस्तान की आधिकारिक सत्ता है और दुनिया ने इसे स्वीकार कर लिया है । तालिबान वहाँ के संविधान के किसी भी अनुच्छेद के अनुसार सत्ता में नहीं आया है । नेपाल के राजनीतिक इतिहास में माओवादियों को भी मान्यता मिली है, जिन्होंने दस साल तक सशस्त्र संघर्ष किया और दूसरे जनांदोलन को सफल बनाने में भूमिका निभाई । पहले संविधान सभा चुनाव में जनता का माओवादी केंद्र पर इतना विश्वास था कि माओवादी नेतृत्व भी इसका अंदाजÞा नहीं लगा सका था । आज माओवादियों की क्या स्थिति है ? यह सभी के सामने स्पष्ट है । आज जेन जी के युवा एक ऐसी ताकत के रूप में स्थापित हो चुके हैं, जिसका सही उपयोग करना अगर उन्हें नहीं आया, तो कल उनकी स्थिति भी माओवादियों की तरह हो सकती है । इसलिए, जेन जी पीढ़ी के लिए जÞरूरी है कि वह इतिहास की गलतियों और

 

कमजÞोरियों से सीख लेकर आगे बढ़े । वर्तमान में यह सावधानी अवश्य बरतनी होगी कि जेन जी की शहादत का गलत इस्तेमाल ना हो और फिर से वही पुराने चेहरे ना दोहराए जाएँ । सामूहिक विवेक पर भरोसा करने, नागरिकों को हमेशा सर्वोपरि मानने और ४२ प्रतिशत से ज्यादा युवाओं को नेतृत्व के केंद्र में लाने का प्रयास करना चाहिए । देश एक सशक्त नागरिक सरकार की उम्मीद करता है । अंतरिम सरकार का गठन और नए चुनावों की समय–सीमा इसी का एक अध्याय है । ऐसे में, अब सभी को ६ महीने के भीतर प्रतिनिधि सभा के चुनाव कराने का माहौल बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए । देश का नेतृत्व जल्द से जल्द निर्वाचित निकायों को सौंप दिया जाना चाहिए । एक उज्ज्वल भविष्य की तलाश में एक बार फिर से नेपाल युवा शक्ति की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है ।

डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमालिनी

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