Wed. Apr 22nd, 2026
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देश का निर्माण हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा– अधिवक्ता कृष्णप्रसाद खनाल (विराज)

 

काठमांडू, आश्विन १० – जेन –जी आन्दोलन २३ और २४ गते का दिन, सड़कों पर हजारों की भीड़, नारेबाजी और उससे हुए भारी नुकसान का स्मरण करते हुए अधिवक्ता कृष्णप्रसाद खनाल (विराज) ने कहा है कि – “राज्य निर्माण की जिम्मेदारी से कोई भाग नहीं सकता है । ये जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है । इसकी जिम्मेदारी हम सभी नागरिकों पर भी है ।” खनाल ने इस बात पर भी जोर दिया कि – देश का निर्माण हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा  ?
खनाल की आवाज में केवल विरोध का स्वर नहीं र्है । उन्होंने विकल्प सहित आग्रह किया है । उन्होंने कहा है कि “अब वो समय समाप्त हो गया है जब केवल विरोध के लिए विरोध किया जाता था । अब बातचीत के लिए दरवाजे खोलते हैं, अब संवाद के लिए दरवाजे खोलते हैं, आइए, विकल्प का रास्ता खोजते हैं । इसके लिए मैं और मेरी टीम तैयार है, क्या आप भी तैयार हैं ?”
खनाल धुलिखेल नगरपालिका–८ के निवासी हैं । उनकी उम्र पचास के पार हैं , लेकिन उनकी आँखों में आज भी युवा जोश झलकता है । पेशे से वकील हैं, अपना लगभग दो दशक उन्होंने इस इस पेशे को दिया है । पेशे से वकील हैं शायद इसलिए उन्होंने अपने जीवन को न्याय और सेवा की धरोहर बनाया ।
वे लिखते हैं कि – हमारे लिए केवल अदालत के कठघरे में खड़े लोगों के आँसूओं को पोछना महत्व नहीं रखता है, वरन गाँव गली के विपन्न लोगों के आँसूओं को पोछना भी समान महत्व रखता है । बी.एल. और राजनीति विज्ञान में एम.ए. खनाल की पत्नी गीता खनाल हैं । उनकी दो बेटियां हैं और एक बेटा । लेकिन उनका मानना है कि उनका परिवार बस यहीं तक सीमित नहीं है — वो उस हर विपन्न नागरिक को अपने परिवार का सदस्य मानते हैं जो न्याय की तलाश में हैं या न्याय मांग रहे हैं ।
लगभग २३ वर्ष पहले उन्होंने निःशुल्क कानूनी सेवा शुरु की, ये सिर्फ पैसे वालों के लिए ही नहीं वरन आम लोगों के लिए भी न्याय का दरवाजा खोलने का एक प्रयास था । उनका कहना है कि “न्याय पैसे से खरीदी जाने वाली वस्तु नहीं है, ये प्रत्येक का हक है ।” इसी विश्वास ने खनाल को समाज में निरंतर सक्रिय रखा है ।
इसी तरह जब २०७२ साल में विनाशकारी महाभूकंप आया उस समय भी खनाल बचाव और राहत के काम में लगे रहे । जब कोविड–१९ का समय आया और लोग अपने घरों में बंद हो गए । जब बाहर लोगों ने निकलना बंद कर दिया उस अंधकार की अवस्था में भी खनाल ने राहत की रौशनी जलाई । लगभग एक दशक उन्होंन यूनिसेफ में काम किया । इस दौरान बच्चों और समुदाय के लिए किए गए काम और उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है ।
देश के युवा पलायन क्यों कर रहे हैं? इस बात को लेकर वो बहुत दुखी हैं । वे कहते हैं “यदि सरकार समय पर रोजगार सृजन के लिए गंभीर योजना लाती तो इस युवा शक्ति को रोजगार के लिए विदेश नहीं जाना पड़ता, और न ही नेपाल को ‘जेन जी आन्दोलन’ का दंश झेलना पड़ता ।”
खनाल का कहना है कि “जेन जी आन्दोलन की घटनाओं की निष्पक्ष छानबीन होनी चाहिए । इसके लिए सक्षम नेतृत्व पर आधारित समावेशी उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जाना चाहिए ।” वैसे खनाल किसी पार्टी से आबद्ध नहीं है, फिर भी न्याय, समानता और नागरिक अधिकारों के मुद्दें को लेकर वो स्पष्ट और दृढ़ हैं ।

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