जेन-जी समूह में वैचारिक भ्रम, केवल श्रेय लेने की होड़
काठमांडू, रविवार, ०२ कात्तिक २०८२ । नेपाल में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था के विरुद्ध भदौ २३–२४ गते हुए जेन-जी आंदोलन ने जिस तरह तत्कालीन केपी शर्मा ओली सरकार को गिराने में भूमिका निभाई थी, वही आंदोलन अब स्पष्ट वैचारिक दिशा और राजनीतिक उद्देश्य के अभाव में बिखराव का शिकार होता दिखाई दे रहा है।
आंदोलन की पृष्ठभूमि
ओली सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के बाद आक्रोशित युवाओं ने स्वतःस्फूर्त ढंग से विरोध प्रदर्शन किया था।
नयाँ बानेश्वर में संसद भवन के सामने हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर सुरक्षा बलों द्वारा गोलीबारी की गई, जिसमें तत्काल १९ लोगों की मौत हो गई। अगले दिन भड़की हिंसा में सरकारी व निजी संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचा और ७५ लोगों की जान गई।
इस घटनाक्रम के बाद ओली सरकार गिर गई और राजनीतिक अस्थिरता गहराती गई।
सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार
जेन-जी आंदोलन के दबाव में पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ।
इस सरकार ने प्रतिनिधिसभा भंग कर फागुन २१ गते के लिए आम चुनाव की घोषणा की।
हालाँकि, आंदोलन के नेताओं में वैचारिक एकता और राजनीतिक रोडमैप की कमी के कारण उनके प्रमुख एजेंडा ठंडे बस्ते में जाने की आशंका बढ़ गई है।
विप्लव का बयान — “विद्रोह अपने राजनीतिक लक्ष्य में असफल”
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव नेत्रविक्रम चन्द ‘विप्लव’ ने कहा कि
“जेन-जी विद्रोह ने सरकार और संसद् को गिरा दिया, लेकिन अपने राजनीतिक उद्देश्य पूरे नहीं कर सका।
समूहों के बीच मतभेद हैं, और यदि स्थिति नहीं सुधरी तो देश फिर अराजकता की ओर जा सकता है।”
उनका कहना था कि संविधान संशोधन, राज्य की शासन-व्यवस्था में बदलाव और संविधान के पुनर्लेखन जैसे मुद्दों पर जेन-जी असफल रहा।
प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने भी अपने संबोधन में कहा था कि संविधान संशोधन अंतरिम सरकार के कार्यक्षेत्र से बाहर है।
आंतरिक मतभेद और बिखराव
आंदोलन के विभिन्न समूहों के बीच एकजुटता की कमी साफ दिख रही है।
सुदन गुरुङ के नेतृत्व वाला समूह संविधान संशोधन का पक्षधर है, लेकिन संशोधन की रूपरेखा पर अभी भी अस्पष्ट है।
मिराज ढुंगाना ने नया राजनीतिक दल गठन की घोषणा की, पर कहा कि
“हम तब तक चुनाव नहीं लड़ेंगे, जब तक हमारी ‘बॉटम लाइन’ पूरी नहीं होती — यानी प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी प्रणाली लागू नहीं होती।”
ढुंगाना के एनजीओ खोलने संबंधी बयान को राजनीतिक अपरिपक्वता बताया गया है।
प्रवेश दाहाल का मानना है कि अंतरिम सरकार खुद आंदोलन की देन है, इसलिए संविधान संशोधन के लिए संसद की आवश्यकता नहीं है।
उन्होंने कहा —
“जब राष्ट्रपति ने संविधान की अनदेखी कर वर्तमान प्रधानमंत्री को नियुक्त किया, तो संशोधन क्यों नहीं हो सकता?”
रक्षा बम, जो आंदोलन की महिला चेहरों में से एक हैं, ने स्वीकार किया —
“हम राजनीतिक रूप से अनुभवी नहीं हैं। हम सीख रहे हैं और वैकल्पिक शक्ति को एकजुट करने की प्रक्रिया में हैं।”
राजनीतिक दलों द्वारा ‘श्रेय हड़पने’ की कोशिश
विश्लेषकों का कहना है कि पुरानी पार्टियाँ — नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले, माओवादी केन्द्र और राष्ट्रिय प्रजातन्त्र पार्टी (राप्रपा) — सभी जेन-जी आंदोलन के एजेंडा को अपना बताने की कोशिश कर रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषक दीपक ज्ञवाली के अनुसार —
“जेन-जी में राजनीतिक अपरिपक्वता स्पष्ट दिख रही है। यह उनका पहला अनुभव है और वे शुरुआती चरण में ही ठोकर खा गए हैं।”
आगामी चुनाव से पहले एकता की कोशिश
पुराने दलों द्वारा अपने मुद्दे हड़पने के डर से जेन-जी समूह के प्रतिनिधि और नए वैकल्पिक दलों के नेता अब चुनाव से पहले एकजुट मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि, क्या वे ऐसा करने में सफल होंगे या आंदोलन का बलिदान व्यर्थ जाएगा — यह आने वाला चुनाव तय करेगा। (स्रोत: रातोपाटी)


