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गोरैया का संदेश : चंद्रकिशोर

 

गोरैया का संदेश

फुर्र से वह आई —
जैसे किसी अनदेखे लोक से
हवा के परों पर सवार होकर।
मेरे आँगन में,
धूप की किरणों के बीच उतर आई —
एक छोटी, अनजान गोरैया।

उसकी आँखों में सुबह का उजाला था,
उसके पंखों में पवन का गीत।
वह चहकी —
मानो किसी भूले हुए स्वप्न की याद दिला रही हो,
या शायद कह रही हो —
“क्या तुम अब भी सुन सकते हो
पेड़ों की नब्ज़,
धरती की साँस?”

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मैं उसके स्वर को नहीं समझ सका,
पर मेरे भीतर कुछ काँपा —
जैसे हृदय की किसी खिड़की से
पुरानी रौशनी भीतर उतर आई हो।

वह चहचहाई,
और लगा — यह कोई भाषा नहीं,
यह तो वही प्रार्थना है
जो हर जीव अनकही करता है —
जीवन की, प्रेम की, अस्तित्व की।

फिर वह उड़ गई —
धूप की परतों को चीरते हुए
आसमान में विलीन।
और मैं रह गया —
अपने मौन में,
उसके गीत की गूंज लिए,
मानो किसी अदृश्य मित्र ने
छूकर कह दिया हो —
“सुनो, तुम अकेले नहीं हो।”

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चंद्रकिशोर
बरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

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