असहमति जरूरी है, लेकिन अभद्रता नहीं : कंचना झा

कंचना झा, हिमालिनी अंक ऑक्टोबर । फिलहाल नेपाल में अंतरिम सरकार है । सुशीला कार्की, जेन–जी के आदेश पर प्रधानमंत्री बनीं हैं । जेन–जी अब देश के हर छोटे–बड़े निर्णय में सक्रिय रूप से दखल दे रहे हैं । वे उन्हीं लोगों को मंत्री बनवा रहे हैं जिनका चरित्र साफ–सुथरा है, जिन्होंने भ्रष्टाचार नहीं किया और किसी न किसी रूप में देश के विकास में योगदान दिया है ।
लेकिन यह भी सच है कि अब सरकार के हर निर्णय में उनकी स्वीकृति अनिवार्य हो गई है । यदि किसी नाम की घोषणा बिना उनकी मर्जी के कर दी जाती है, तो विवाद खड़ा हो जाता है और अंततः सरकार को झुकना पड़ता है ।
जेन –जी आंदोलन से देश ने बहुत कुछ खोया है । जिस संपत्ति को जोड़ने में सालों साल लगे थे उसे कुछ ही क्षणों में तहस नहस कर दिया गया । वर्तमान अवस्था की यदि बात करें तो आंदोलन के बाद देश में एक नई प्रवृत्ति ने जन्म लिया है, वो है– उच्छृंखलता, उदंडता, और मर्यादाहीनता ।
खासकर जो देश के, प्रांत के नेतृत्वकर्ता हैं बिना किसी नीति के तहत जो मन में आता है बोल जाते हैं । जिसे जो मर्जी होती है तो वही अनाप शनाप बोलने लगते हैं । लोगों की बोली में संयम नहीं रहा, भाषा में मर्यादा खो गई है ।
कभी यह देश जो शांतिप्रिय कहलाता था । जिसे विकास की ओर उन्मुख होना था वो अपनी भाषा, अपनी बोली, अपनी सभ्यता तथा अपनी मर्यादा को भूल बैठा है । इसकी जगह पर लोगों ने अपनी बोली में अभद्रता को अपना लिया है । नेताओं से लेकर आम नागरिक तक, किसी की भी भाषा में वह शालीनता नहीं रही जो एक विकसित समाज की निशानी होती है ।
लेकिन हाँ इसका सारा दोष जेन– जी पर नहीं दिया जा सकता है कि ये उनके के आने से हुआ है या आंदोलन के बाद से हुआ है । इसकी नींव तो बहुत पहले ही रखी जा चुकी थी ।
इतिहास के पन्नों को उलटाएं तो यही मिलेगा कि कोई भी क्रांति या आंदोलन अचानक नहीं होता । उसके पीछे एक लम्बी तैयारी की जाती है । वर्षों पहले उसके बीज बोए जाते हैं । जेन–जी का आंदोलन भी एक दिन की उपज नहीं था– इसकी तैयारी पहले ही शुरू हो चुकी थी। इसलिए आज जो उच्छृंखलता दिख रही है, वह भी किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों से बन रही मानसिकता का परिणाम है ।
केपी शर्मा ओली जो जमाने से अपनी अक्खड़ बोली के लिए प्रसिद्ध हैं । हालाँकि आज भी उनकी बोली में नरमी कहीं नहीं दिखती है । आज भी वो खुलकर बोल रहे हैं कि दो चार लोगों के बोलने से मैं अपना अध्यक्ष पद छोड़ दूँगा क्या ? जो होगा अधिवेशन से होगा । मैंने कोई गलती नहीं की है । मैं किसी भी हालत में अभी यह पद नहीं छोडूँगा । लोग उनकी बोली को हास्य व्यंग्य में ले बात आई गई कर देते हैं । इस भाषा की नींव दी है ओली ने । जहाँ लोग एक दूसरे का आदर नहीं करते हैं ।
इसी शैली को आगे बढ़ाया काठमांडू के मेयर बालेन शाह ने । जब वो मेयर चुनकर आए तो लोगों को उनसे बहुत उम्मीदें थीं । एक पढ़ा लिखा समझदार और लोकप्रिय युवा । जिसकी गायकी के सभी दीवाने थे । सभी को उनका ललकारना, आम नागरिकों खासकर युवाओं को बहुत भाया था । लोगों को लगा था कि अब काठमांडू में नई दिशा आएगी । मेयर की जिम्मेदारी एक युवा के हाथों में सौंपी जा रही है तो ये तो कमाल कर देगा । लेकिन बालेन फेसबुकिया बनकर रह गए । सच तो यह था कि बालेन का ध्यान काम से ज्यादा फेसबुक पर बयानबाजी में रहने लगा ।
कभी शेर की तरह दहाड़ते कहते कि– मैं सिंहदरवार में आग लगा दूँगा । कारण क्या ? तो उनकी पत्नी सबीना काफ्ले की गाड़ी को तीनकुने में पुलिस ने कुछ मिनटों के लिए रोका, इसी बात को लेकर उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “आज कुछ नहीं हुआ, कल से अगर हमारे महानगर का कोई भी वाहन सरकार ने रोका तो मैं सिंह दरबार में आग लगा दूंगा । याद रखना चोर सरकार ।”
यह बयान किसी सामान्य व्यक्ति का नहीं, बल्कि काठमांडू के मेयर का था । एक मेयर जो जनता का सेवक है । काठमांडू उपत्यका का अभिभावक है । वें एक तरह का बयान लिखते हैं ।
जहाँ तक सिंह दरवार की बात है तो इसका अपना एक अलग महत्व है । इस सिंहदरवार को उन्होंने नहीं बनाया है तो वे कौन हैं कहने वाले ? मैं सिंह दरवार में आग लगा दूँगा । आपको पता करना चाहिए था कि बात आखिर क्या थी ? या सीधे आप आग ही लगा देंगे । ये कहाँ की बुद्धिमानी है । और ये कहाँ की बोली है ? इस तरह का बयान देकर उन्होंने न केवल अपनी गरिमा खोई, बल्कि उस पद की मर्यादा भी तोड़ी, जो जनता ने उन्हें सौंपी थी।
सच कहें तो एमाले अध्यक्ष ओली के बाद बालेन ने ही इस शैली को अपनाया । जब भी मौका मिला है उन्होंने सोशल मीडिया पर ही लिखा । इसके बाद फिर कभी गुस्सा आया तो बालेन ने अदालत को लेकर टिप्पणी की– “न्यायालय में सभी चोर हैं ।” क्या किसी मेयर को इस तरह की टिप्पणी शोभा देती है ?
उनकी भाषा ने आम जनता को भड़काने का काम किया है । आम नागरिक या वें जो उनके भरोसेमंद कार्यकर्ता थे उन सभी को लगता था कि यही है मसीहा जो देश को विकास की ओर ले जाएगा । लेकिन अब धीरे धीरे लोगों का विश्वास उनपर से उठता जा रहा है । उन्हें अब जाकर लग रहा है कि मेयर की पत्नी को पुलिस ने पाँच मिनट के लिए गाड़ी रोककर पूछताछ की तो मेयर को इतना बुरा लगा कि वो सिंह दरवार ही जला देगा । लेकिन आम आदमी को तो दैनिकी ऐसा भोगना पड़ता है । तब तो कोई ऐसा नहीं बोलता यानी यहाँ भी पद, पावर और पैसे का रौब दिखता है । अब बालेन अपना विश्वास स्वयं खो रहे हैं ।
दूसरा कारण यह भी है कि जेन –जी ने उनपर आँख मूंदकर विश्वास किया था जिसे उन्होंने तोड़ दिया । हलांकी उन्होंने दूरदर्शिता से काम लिया है । चुँकि उन्होंने बोल दिया था सिंहदरवार वाली बात तो आम नागरिक को संदेह होने लगा है कि कहीं उन्होंने ही तो नहीं करवाया है । कुछ दिन पहले की अगर बात करें तो मेयर बालेन के काम की चारों ओर प्रशंसा हो रही है । लेकिन अब उनके विरोध में भी स्वर उठने लगा हैं ।
नेताओं की भाषा तो पहले भी बहुत परिष्कृत नहीं थी । लेकिन वर्तमान अवस्था तो यह है कि अब यह पूरी तरह बिखर चुकी है । धीरे–धीरे सबने अपनी भाषा में अच्छे शब्दों का प्रयोग करना बंद कर दिया । युवा ने भी अपनी बातों में, भाषण में अच्छे शब्दों का प्रयोग नहीं करते हैं । कहे तो अराजकता से भरी बातों को ही बोलते हैं । जेन जी के कुछ सदस्य खुलकर पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहते हैं कि– आपको पत्रकारिता करना नहीं आता । जबकि सवाल जायज पूछा जाता है । एक दंभ जिससे आम जनता पहले भी परेशान थी और आने वाले समय में भी इसका सामना करेगी ।
अब विश्वेंद्र पासवान की बात करें जो चिल्ला चिल्लाकार कह रहे थे एक कार्यक्रम में– “ओली को शर्म नहीं आती है । ये देश ओली के बाप का है क्या ?” हालाँकि कार्यक्रम में वे देश की अवस्था को लेकर बात कर रहे थे और शैली इतनी खराब कि देखने और सुनने वाले चाहे कितनी भी विरोधी क्यों न हो उन्हें अच्छा नहीं लगा । इस तरह की भाषा किसी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती । असहमति जरूरी है, लेकिन अभद्रता नहीं ।
यही बात वो मर्यादा के तहत शांत भाव से भी कह सकते थे । शिकायत अपनी जगह है । बोलने की शैली हमारे संस्कार को दिखाती है तो क्या सच में नेपाल के लोग संस्कारहीन हो गए हैं ? जिन्हें बोलने और बात करने तक का तरीका नहीं आता है । यही भाषा हमारे संस्कारों को तोड़ रही है, हमारी पहचान को मिटा रही है ।
वो राष्ट्रपति को चुनौती देते हुए कह रहे हैं कि जेन जी को बायपास कर रहे हैं । केपी ओली को गिरफ्तार नहीं करना चाहिए ? देउवा को गिरफ्तार नहीं करना चाहिए ? उन्होंने कहा कि अभी तो सिंहदरवार जलाया गया है अब आप लोगों को भी जलाया जाएगा । इसलिए बोलना कम करें । सभी अपनी अपनी राजनीति कर रहे हैं । विश्वेंद्र पासवान भी बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं । जान रहे हैं कि समय अभी जेन जी का है तो क्याें न चीख–चीख कर उनका समर्थन करुँ ।
जबकि सच्चाई है कि जेन जी आंदोलन के तुरंत बाद जिस तरह के दृश्यों को लोगों ने देखा वो किसी को भी अच्छा नहीं लगा । सबके सब्र का बांध टूटा, सभी ने निन्दा की । हाँ नेताओं के साथ जो कुछ हुआ उससे किसी को कोई आपत्ति नहीं थी क्योंकि आम नागरिक ऊब चुके थे । उनकी बातों,उनके कार्यशैली और भ्रष्टाचार को लेकर ।
अब महेश बस्नेत ने क्या कहा किन शब्दों का प्रयोग किया है ओली को बचाने के लिए । उन्होंने कहा कि “अगर तुम्हारे बाप में हिम्मत है, तो केपी ओली को गिरफ्तार करो। ‘तुम्हारे बाप में हिम्मत है’ शब्द एक बुरा शब्द है ।” “केपी ओली दोषी हैं और अगर तुम्हारे बाप में हिम्मत है, तो उन्हें गिरफ्तार करके दिखाओ ।”
वो किसके बाप की बात कर रहे हैं ? आम नागरिकों के बाप के या सरकार के बाप को चुनौती दे रहे हैं ? कब हमने राजनीतिक से उठकर गौली गलौज की भाषा को अपना लिया पता ही नहीं चला । यह राजनीतिक संवाद नहीं, गालियों की भाषा है । ऐसा लगता है जैसे नेताओं ने मर्यादा और संस्कार को तिलांजलि दे दी हो ।
कोई सिंहदरवार जला रहा है । कोई न्यायालय को लेकर बोल रहा है । कोई किसी के बाप को चुनौती दे रहा है वो भी उस आधार पर जहाँ उसे स्वयं मालूम है जिनके लिए वो इतनी बड़ी बात कह रहे हैं वो दूध का धुला नहीं है ।
जेन –जी आंदोलन के बाद जब पुलिस ने आत्मसमर्पण कर दिया । सेना ने अपने नियंत्रण में ले लिया और ओली नजरबंद हुए । वो चुपचाप बैठे थे । लेकिन जब जनता के बीच आए भी तो उन्होंने एक बार भी संवेदना नहीं जताई, उन परिवारों के प्रति जिनके बच्चों को पुलिस ने गोलियो से भून दिया था । एक संवेदनहीन नेता, जिसने न खुद संवेदना दिखाई न अपने साथियों को सिखाई– क्या वही फिर से देश का नेतृत्व करेगा ?
जो पद पर हैं । नेता हैं । जो नेतृत्वकर्ता हैं । उन्हें अपनी भाषा पर कन्ट्रोल नहीं है । सच तो ये है कि ये लोग करते हैं राजनीति की लेकिन इनमें किसी के लिए कोई संवेदना नहीं है लेकिन जनता तो जनता है वह उनकी बातों को सीरियस रूप में ले लेते हैं । जनता समझ ही नहीं पाती है कि ये लोग अपना दांव खेल रहे हैं ।
भविष्य कोई नहीं जानता है । जिस दिन को अभी जनता जी रही हैं उसने सपने में भी इसकी कल्पना नहीं की थी । लोग रहें न रहें लेकिन देश था, देश है और देश हमेशा रहेगा । इस इस बात की ओर सभी का ध्यान जाना चाहिए । देश को बहुत दूर तक जाना है इसके लिए जरुरी है कि लोग क्या बोलते हैं ? देश की आत्मा उसके लोगों में बसती है– उनकी भाषा, उनकी संस्कृति, उनके संस्कार में । हम कैसी भाषा शैली का प्रयोग करते हैं ? ये बहुत मायने रखता है । एक देश के विकास में । यह आपके देश के संस्कार को दिखाती है । अगर हमारी बोली और भाषा ही बिगड़ गई, तो विकास कितना भी हो जाए, देश भीतर से खोखला हो जाएगा ।
देश को आगे बढ़ाने के लिए जÞरूरी है कि उसके नेतृत्वकर्ता की भाषा में शालीनता और संवेदना हो । इतिहास नेताओं को उनके पद से नहीं, उनके व्यवहार और बोली से याद रखता है । आपके द्वारा बोले गए शब्द ही आने वाले कल में देश के भविष्य की दिशा तय करेंगे । क्योंकि भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, संस्कार का आईना होती है । क्या कोई चाहेगा कि देश पर सवाल उठे ? मर्जी है आपकी कि आप क्या चाहते हैं ?

कार्यकारी संपादक,
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