क्या निधि काँग्रेस छोडकर महन्थ ठाकुर बन सकते हैं ? श्वेता दीप्ति

काठमांडू,८ जुलाई.२०१५ | विरोधों के बीच लगातार संविधान प्रक्रिया को बढ़ाया जा रहा है । विरोधी पक्ष ही नहीं सत्ता दल के नेताओं ने भी अपना विरोध जारी रखा हुआ है किन्तु हाल ये है कि नक्कारखाने में किसी को तूती की आवाज सुनाई नहीं पड़ रही है । कांग्रेस के दो प्रबल नेता अमरेश सिंह जी और विमलेन्द्र निधि जी खुले तौर पर विरोध जता रहे हैं । अमरेश जी कई वर्षों से अकेले अपनी आवाज पुख्ता करते आए हैं किन्तु, विमलेन्द्र निधि ने मधेश के मुद्दे पर ५ वर्षों से जो चुप्पी अख्तियार की हुई थी वो आज टूटी है । आज आलम ये है कि उनकी एक विरोध की आवाज से, मधेश उनकी पूर्व की गलतियों को भी भूलने के लिए तैयार हो गया है । सौ खामियाँ हैं, पेश किए गए मसौदे में जिसमें किसी न किसी रूप में मधेश को ही निशाना बनाया गया है । उन सभी खामियों को निधि जी ने महत्ता न देते हुए संघीयता विहीन संविधान का विरोध किया है और संघीयताविहीन संविधान को मानने से इनकार किया । पर क्या सिर्फ यही एक ज्वलंत समस्या है मधेश के लिए पेश किए हुए मसौदे में ?
एक शक्तिविहीन संघीयता अगर मधेश को मिल भी जाती है तो आप उसका क्या करेंगे ? निधि के एक विरोध की आवाज ने मधेशी जनता में आशा का संचार पैदा किया है, उनकी ईच्छा तो यही होगी कि निधि जी हर उस मुद्दे को अपनी आवाज दें, जो मधेश को कमजोर करने के लिए उठाए जा रहे हैं, मधेशी जनता उम्मीद करेगी कि निधि जी मधेश आन्दोलन के मर्म को समझें और चाहे प्रदेश की बात हो, सीमांकन की बात हो या फिर नागरिकता की बात हो उसपर अपनी सत्ता का ध्यानाकर्षण कराएँ और कम से कम अन्तरिम संविधान के अनुसार आने वाले संविधान के निर्माण में अपनी भूमिका का निर्वाह करें । विरोध का स्वर अगर उठाया जा रहा है तो ईमानदारी के साथ उठाना पड़ेगा महज मधेश को आकर्षित करने के लिए नहीं । निधि जी सिर्फ सीमांकन की बात बोल रहे हैं, किन्तु मधेश को कौन सा प्रदेश मिलना चाहिए यह भी निर्धारित करना होगा क्योंकि पूर्व में अगर मोरंग, सुनसरी और झापा और पश्चिम में कैलाली कंचनपुर नहीं मिला तो ऐसी संघीयता या ऐसी सीमांकन मधेश के कितने हित में होगी ? अगर अपनी ही सरकार के विरोध में खड़े होने की हिम्मत की है, तो विरोध की आवाज पुरअसर और पुरजोर होनी चाहिए । विमलेन्द्र निधि का नेपाली काँग्रेस में एक मजबूत और महत्वपूर्ण स्थान रहा है । किन्तु परिदृश्य ये है कि आज इनकी भी नहीं सुनी जा रही है । परन्तु मधेश की उम्मीद भरी नजरें निधि की ओर देख रही हैं । मधेश को अभी जरुरत है उर्जावान नेता की । एक समय में महन्थ ठाकुर नेपाली काँग्रेस के महत्वपूर्ण नेताओं में से माने जाते थे और गिरिजा प्रसाद कोईराला के निकटस्थ भी, किन्तु मधेश के मामले में उन्होंने नेपाली काँग्रेस का साथ छोड़ा आज निधि से भी इसकी उम्मीद की जा रही है कि उन्हें खुलकर मधेश का साथ देना चाहिए और आवश्यकता हो तो मधेश के हक के लिए नेपाली काँग्रेस से अलग हो जाना चाहिए ।
विगत को देखा जाय तो निधि जी के परिवार का मधेश में वैसा ही महत्व है जैसा कोईराला परिवार का । इनके पिता स्व. महेन्द्रनारायण निधि जी मधेश के प्रति समर्पित व्यक्तित्व माने जाते हैं । मधेश की समस्याओं को लेकर और सत्ता के रवैये को लेकर उन्होंने हमेशा अपनी आवाज उठाई । यहाँ तक की मधेश में हिन्दी की अवस्था को लेकर भी वो चिन्तित थे । उन्होंने हिन्दी रक्षा समिति भी खोला था, जिसके वो अध्यक्ष थे । अपने मंत्रीत्व काल में हिन्दी साहित्य कला संगम का भी उद्घाटन किया था । जिसकी वजह से पूर्व प्रधानमंत्री मातृका प्रसाद कोईराला से उनकी बहस भी हुई थी । विमलेन्द्र निधि जी के साथ उनके परिवार का पूर्वाधार है उन्हें इसका सम्मान करना ही चाहिए । वैसे भी नेपाली काँग्रेस में निधि जी का व्यक्तित्व कुछ अलग पहचान की रही है जो, शपथ ग्रहण के दौरान भी देखा गया था जब उन्होंने धोती और दउरा सुरुवाल को छोड़कर सूट पहनकर शपथ ग्रहण किया था । उस वक्त उन्होंने शायद बीच की राह अपनाई थी किन्तु आज कोई बीच की राह नहीं बल्कि एक स्पष्ट और निश्चित नीति को अपना कर आगे बढ़ने की आवश्यकता है ।
तुष्टिकरण के सिद्धान्त पर आधारित यह मसौदा मधेश आन्दोलन के पश्चात् अन्तरिम संविधान सभा में जगह पाए संघीयता को किसी भी तरह कमजोर कर के खत्म करने की तैयारी में है । ऐसी हालत में मधेशी दलों और मधेशी नेताओं की चेतावनी की अब आवश्यकता नहीं है, बल्कि जिस फास्ट ट्रैक से संविधान लाने की तैयारी की जा रही है उसी फास्टट्रैक से मधेशी दलों के द्वारा निर्णय और कार्यान्वयन की भी आवश्यकता है । पेश किया हुआ मसौदा पूर्णरुपेण पूर्वाग्रह और दुराग्रह से ग्रसित है । तानाशाही को आज ही नहीं भविष्य में भी पुख्ता आधार मिले इसकी भी भरपूर तैयारी उक्त मसौदे में की गई है । संविधान लागु करने के लिए मधेश को सैनिक छावनी में तब्दील करना, प्रहरी को समयानुसार फायर करने की छूट देना और संचार माध्यम पर अंकुश लगाना यह सब किसी अच्छे भविष्य का संकेत नहीं दे रही है । नेपाल जैसे दुरुह और कठिन भौगोलिक संरचना वाले देश में क्या ये सम्भव है कि १५ दिनों के अन्दर जनता की सलाह और सुझाव संकलन किए जा सके ? किन्तु मद मोह में वो सब किया जा रहा है जो पूर्णतया अवैज्ञानिक और गलत है । इन सभी हालातों को देख कर मधेशी नेताओं को तत्काल निर्णय लेना होगा । निधि जी का नेपाली काँग्रेस में मजबूत स्थिति भले ही रही हो पर यह तो स्पष्ट है कि आज उनके विरोध की वजह से नेपाली काँग्रेस अपनी नीति तय करने या बदलने वाली नहीं है । इसलिए उन्होंने अगर मधेश की समस्याओं और उसके हक की बात उठाई है तो सभी मुद्दों पर मधेश का साथ दें और नेतृत्व की क्षमता को लेकर आगे आएँ । मधेश और मधेशी जनता को निधि और सिंह जैसे नेताओं की आवश्यकता है इतना ही नहीं अभी सभी मधेशी दलों के एकीकरण की जरुरत है तभी मधेश अपनी अधिकार की लड़ाई लड़ सकेगा ।


