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नई पीढी का राष्ट्रवाद और राजनीतिक दल : अंशुकुमारी झा

 

अंशुकुमारी झा, हिमालिनी अंक ऑक्टोबर । भौगोलिक हिसाब से नेपाल, भारत और चीन के बीच में है । नेपाल, भारत से २२ गुणा और चीन से ६५ गुणा छोटा है । नेपाल सदियों से कला, संस्कृति, व्यापरिक गतिविधि और मित्रवत व्यवहार के लिए जाना जाता रहा है । यह देश हमेशा से शांति के पक्ष में ही रहा है फिर भी यहाँ का इतिहास रक्तरंजित है । राजतन्त्र हो, प्रजातन्त्र हो या गणतन्त्र, रक्त से ही इतिहास का पन्ना लिखा हुआ मिलेगा । वैसे कहा जाता है कि बिना रक्तपात परिवर्तन नहीं होता है, परन्तु इतने से छोटे देश में समय–समय पर इतने सारे लोगों का शहीद होना मन को विचलित कर देता है । गौतम बुद्ध का देश, माँ सीता की धरती, युद्ध का मैदान कैसे बन सकता है ? यह सोचनीय विषय है । सच में इस देश को सती का श्राप लगा है क्या ? या शक्तिशाली व्यक्ति के सनकी रवैये का परिणाम है ?

फिलहाल नेपाल की राजनीति एकदम अस्थिर है । देश अभी राजनीतिक, सामाजिक तथा कूटनीतिक रूपान्तरण के संवेदनशील मोड़ पर खडा है । पहले की राजनीतिक परम्परा जिसे पुरानी पीढ़ी ने निर्माण किया था उस पर से नयी पीढ़ी का विश्वास समाप्त हो गया है । नई पीढ़ी में राष्ट्रवाद कूट–कूट कर भरा हुआ है । वे अपने देश में स्पष्ट दृष्टि, जवाबदेही और परिणाम ढूँढ रहे हैं । राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और युवा पीढ़ी की निराशा के बीच राष्ट्रवाद को भावनात्मक हथियार के रूप में प्रयोग करना अब आसान नहीं है । २१ वीं सदी की नई पीढ़ी जिसे जेन जी कहा जाता है, वह तकनीकी युग की सन्तान है । इन्टरनेट, सोशल मीडिया और वैश्विकरण के बीच पली बढ़ी यह पीढ़ी सोच, समझ और दृष्टिकोण में पहले की पीढि़यों से काफी अलग है । आज का राष्ट्रवाद केवल झंडा फहराने या नारों तक सीमित नहीं है ।

आज का राष्ट्रवाद तो देश के विकास, समानता और जिम्मेदारी के भाव से जुड़ा हुआ है, और जेन जी इसी नए राष्ट्रवाद की पहचान है । जेन जी की पहचान स्वतन्त्र विचार, डिजीटल जागरुकता और वैश्विक दृष्टिकोण से होती है । यह पीढ़ी इन्टरनेट के माध्यम से देश दुनिया के मुद्दों को गहराई से समझती है और सही गलत पर खुलकर अपनी राय रखती है । वे परम्परागत देशभक्ति की जगह तर्कसंगत राष्ट्रवाद को महत्व देती है । नई पीढ़ी के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा नहीं बल्कि पर्यावरण की रक्षा, समानता और न्याय की स्थापना, तकनीकी और शैक्षिक उन्नति तथा देश की वैश्विक पहचान को मजबूत करना है । वो मानती हैं कि सच्चा देशप्रेम वही है जो देश को आगे बढ़ाने के लिए काम करे ।

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नेपाल में राजनीतिक दलों द्वारा राष्ट्रवाद जैसे संवेदनशील विषय को एक खिलौना बनाकर खेल खेलने की गतिविधि पुरानी है । इसी खिलौना का प्रयोग कर उन्होंने जनसमर्थन प्राप्त किया है और अपने संगठन को विस्तार करने में कामयाब हुआ है । चाहे उन्हें राष्ट्रवाद की परिभाषा पता हो या न हो परन्तु भावनात्मक रूप से जनता को राष्ट्रवाद का नारा देकर ही आकर्षित किया है । यह राष्ट्रवाद देश के हित में कभी नहीं होता बल्कि भावनात्मक राष्ट्रवादी भावना जगाकर कार्यकर्ता परिचालन और समर्थन का आधार मजबूत बनाया जाता है । पार्टियाँ हमेशा विदेश से सम्बन्धित विवाद को जनता में उछालती रहती है । चाहे भारत के साथ सीमा का विवाद हो, चीन के साथ व्यापार का विषय हो या अमेरिका और युरोप के साथ का विकास समझौता का विषय हो, राजनीतिक दल इन्हीं विषयों को भावनात्मक ढंग से परोसती है । जनता को अगाह करती है कि हमारे देश के ऊपर खतरा है । भोलीभाली जनता भी इनकी बातों में आ जाती हैं क्योंकि उन्हें देश की परवाह होती है । सीमा समस्या, अन्तरराष्ट्रीय सम्झौता वा विकास साझेदारी का विषय उठाकर राजनीतिक दल कूटनीतिक तैयारी याा दीर्घकालीन दृष्टि नहीं बनाती वह तो बस अपनी पार्टी विस्तार करने की नीति के तहत यह विषय उठाती है । दलों ने हमेशा राष्ट्रवाद को राजनीतिक प्रतिस्पद्र्धा तथा संगठन विस्तार के लिए ही प्रयोग किया है । परन्तु अभी उनलोगों की राष्ट्रवाद की नीति उल्टी पड़ गई है । नई पीढ़ी भावनात्मक नारा से प्रभावित नहीं होती है । नई पीढ़ी सामाजिक सञ्जाल, अन्तर्राष्ट्रीय समाचार, तथ्य और तर्क से जानकारी लेती है । नई पीढ़ी आँख मूँदकर किसी विचार का समर्थन नहीं करती है । वे सवाल पूछती है, विचार करती है और मानती है कि राष्ट्रवाद का अर्थ सभी धर्मो, भाषाओं और समुदायों के सम्मान से है । उनके राष्ट्रवाद में मानवता और वैश्विक सहयोग की भावना भी शामिल है ।
कहा जाता है कि हाथी के दो प्रकार के दाँत होते हैं, एक खाने वाला और एक दिखाने वाला । उसी प्रकार हमारे यहाँ राजनीतिक पार्टियाँ है, देश के अन्दर राष्ट्रवाद की बात करते हैं और बाहर दूसरी बात, जिससे अन्तरराष्ट्रीय साझेदारों के बीच नेपाल की विश्वसनीयता कम हो गई है । फलस्वरूप अब राष्ट्रवाद विषय से जनसमर्थन हासिल करना बहुत ही कठिन है । इसके विपरित नई पीढ़ी राष्ट्रवादी नारा से सहानुभूति नहीं एक ठोस तथ्य का खोज कर रही है । अब राजनीतिक दलों को नई पीढ़ी से बहुत कुछ सीखना चाहिए जिससे उन्हें राष्ट्रवाद के बारे में यथार्थ जानकारी मिल सके । राजनीतिक दलों के लिए यह एक बहुत बड़ी चुनौती है । चाहे तो वह इसे स्वीकार करें या अपने परम्परागत राष्ट्रवाद को लेकर भटकें । अभी देश में राजनीतिक दलों की खुद के क्रियाकलाप से अस्तित्व कम होता हुआ प्रतीत हो रहा है । नेता लोग फिलहाल बहुत ही सुरक्षित रूप से रहने की कोशिश में लगे हुए हैं । जनता में पार्टी के प्रति वितृष्णा पैदा हो गई है ।

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भाद्र २३ और २४ गते की घटना से नई पीढ़ी और उनके अभिभावकों को सबसे अधिक आघात पहुँचा है । वैसे तो इस घटना से समूचे देश को क्षति हुई परन्तु जो अब इस दुनिया में नहीं रहे उनके लिए उक्त घटना अत्यधिक पीड़ादायी हुई । उस वक्त राजनीतिक दल के शीर्ष नेता लोग उनके लिए कुछ करने के बजाय खुद छिपने में लगे रहे । वह समय देश के लिए एक बहुत ही भयावह समय था जिसे शब्दों में बयाँ करना नामुमकिन है । इस सबका कारण है, देश में राजनीतिक दलों द्वारा अराजक व्यवहार होना । विगत के राजनीतिक व्यवहार से देश गम्भीर समस्या में है । इस पर बुद्धिजीवियों का ध्यान जाना अत्यन्त आवश्यक है ।
अभी भी देश विकट परिस्थिति में ही है । कुछ चयनित लोग देश की बागडोर सम्भाले हैं । परन्तु कुछ राजनीतिक नेतागण, स्वार्थसम्बद्ध समूह और कुछ मीडिया वाले राष्ट्रवाद की भावना को राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग कर रहे हैं । उनका कहना है कि नई पीढ़ी इतना बडा आन्दोलन नहीं कर सकती है । यह आन्दोलन बाह्य शक्ति द्वारा निष्कर्ष पर पहुँचा है । सच तो यह है, इस प्रकार की अफवाहजनक बातें आन्दोलन को कमजोर करने के लिए की जा रही है साथ ही युवा पीढ़ी की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है । इस प्रकार के आरोप प्रत्यारोप से जनता को भ्रमित किया जा रहा है । समर्थन को कमजोर बनाने की साजिश है और राजनीतिक जिम्मेदारी से ध्यान भटकाने की योजनाएँ स्पष्ट दिखाई दे रही है । चिन्ता का विषय यह है कि यह राष्ट्रवाद का नारा कहीं उल्टा न हो जाय ।

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समग्र में आज की पीढ़ी पुरानी राजनीतिक शैली से पृथक है । नई पीढ़ीे स्वतन्त्र सूचना, सामाजिक संजाल और नागरिक चेतना से प्रेरित है । उन्हें कोई बनावटी विदेशी कथा पर विश्वास नहीं होता है वे किसी विषय को लेकर खुद संवेदनशील रहती है । राष्ट्रवाद के नाम से अगर युवा पीढ़ी को भ्रमित करने का प्रयास किया गया तो उनमें एक प्रकार का असन्तोष पैदा होगा जिससे आन्दोलन और भी भ्रामक हो सकता है । इस प्रकार के रबैये से राजनीतिक नेतृत्व से जनविश्वास का अन्त हो सकता है । इसलिए हमें अपने देश और जनता की अवस्था को ध्यान में रखते हुए किसी भी बात को रखना चाहिए । भ्रमित विषय को अत्यधिक हवा नहीं देना चाहिए और तथ्यपूर्ण बातों का प्रयोग करना चाहिए । देश की हर जनता को अपने देशप्रति प्रेम होता है । वे अपने देश और देश के हित के लिए सदैव तत्पर होते हैं ।

अंशु झा

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