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उथल-पुथल के बाद—निर्वाचन की प्रतीक्षा : धन कुमारी थापा ‘सरु’

 

धन कुमारी थापा ‘सरु’, काठमांडू । २०१५ में गणतांत्रिक संविधान जारी होने के बाद अधिकांश नेपाली नागरिकों को लगा था कि अब देश स्थिर राजनीतिक दिशा में आगे बढ़ेगा। लेकिन एक दशक बाद परिस्थितियाँ बिल्कुल बदल चुकी हैं।

पिछले दस वर्षों में दो स्थानीय तहों के चुनाव और दो बार संघीय व प्रादेशिक संसद के चुनाव हो चुके हैं। स्थानीय सरकारें—यानी पालिकाएँ—अधिकांश स्थानों पर अच्छे से काम कर रही हैं। लेकिन प्रदेश सरकार और संघीय सरकार के प्रति लोगों, विशेषकर युवा पीढ़ी के मन में भारी असंतोष था। यही असंतोष ८/९ सेप्टेम्बर २०२५ को जेन-ज़ी आंदोलन के दौरान विस्फोटक रूप में सामने आया।

प्रधानमंत्री केपी ओली को पद से इस्तीफा देना पड़ा और सुरक्षा कारणों से उन्हें हेलिकॉप्टर से गुप्त स्थान पर जाना पड़ा। पूर्व प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउवा के निवास पर हमला हुआ। सिंहदरबार, सर्वोच्च अदालत, संसद भवन समेत कई सरकारी संरचनाओं में आगजनी हुई। ऐसी अराजक और राज्यविहीन स्थिति नेपाल के इतिहास में पहले कभी नहीं देखी गई थी, जिसके कारण आज भी जनता के मन में भय की छाया बनी हुई है।

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बेहद जटिल राजनीतिक स्थिति और सरकार-विहीन माहौल के बीच
राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया।
दूसरी गणतांत्रिक संसद को भंग किया गया और ५ मार्च २०२६ के लिए चुनाव की घोषणा हुई।

देश के दो सबसे बड़े दल—नेपाली कांग्रेस ने चुनाव का स्वागत किया है, जबकि नेकपा एमाले संसद पुनःस्थापना की मांग पर अड़ी हुई है। इस बीच कई नए दल भी चुनाव में भाग लेने के लिए दर्ता हो चुके हैं।

नेपाल के शहरी इलाकों में हाल के स्थानीय और संघीय चुनावों में जो तेज वोट-स्विंग दिखाई दिया था, और लगभग १० लाख नए मतदाता पहली बार वोट करने वाले हैं—इन परिस्थितियों में आगामी जनमत किस दिशा में जाएगा, इसका अनुमान लगाना अनुभवी राजनैतिक विश्लेषकों के लिए भी कठिन है। आने वाली संसद फिर त्रिशंकु होगी या स्थिर सरकार दे पाएगी—यह चुनाव परिणाम तय करेंगे।

अन्योल के बीच कुछ सकारात्मक संकेत

अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की स्पष्ट कह चुकी हैं कि
“अंतरिम सरकार के पास संविधान संशोधन करने का कोई अधिकार नहीं है।
जिसे संविधान बदलना है, वह चुनाव जीतकर आए।”
शिक्षा मंत्री महावीर पुन ने भी यही बात दोहराई।

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युवा पीढ़ी अब समझ चुकी है कि
संविधान संशोधन का एकमात्र मार्ग—संसद में बहुमत और व्यापक राष्ट्रीय सहमति है।
इसी सोच के साथ उन्होंने अपने राजनीतिक संगठन बनाना शुरू कर दिया है।

दूसरी ओर, नेकपा एमाले और जेन-ज़ी समर्थकों की सिमरा में हिंसक झड़पें, दो बार कर्फ्यू लगने की नौबत, चुनावी हिंसा के बढ़ते संकेत दे रही हैं।
ऐसी स्थिति में

एमाले नेताओं को उत्तेजक भाषणों से बचना होगा

जेन-ज़ी के युवाओं को भी जिम्मेदार राजनीतिक व्यवहार प्रदर्शित करना होगा

लोकतंत्र में किसी को दंडित करने का एकमात्र तरीका है—
उसे चुनाव में पराजित करना।
जितनी जल्दी युवा इसे समझेंगे, उतना जल्दी चुनाव का माहौल सामान्य होगा।

अपूर्ण अंतरिम सरकार — प्रशासनिक शून्यता

अंतरिम सरकार आज भी पूर्ण आकार नहीं ले सकी है।
संविधान अनुसार मंत्रिपरिषद में २५ मंत्री हो सकते हैं, लेकिन सुशीला कार्की ने १२–१४ सदस्यों की ही कैबिनेट की घोषणा की थी।
सिंहदरबार में जिन मंत्रालयों में मंत्री मौजूद नहीं हैं—वहाँ पूरी तरह सूना माहौल है।
इस तरह की प्रशासनिक शून्यता, यदि लंबे समय तक बनी रही, तो यह विकास के लिए घातक होगी।

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राजनीतिक संरचना बनाम आर्थिक कमजोरी

नेपाल में सभी राजनीतिक परिवर्तन संवैधानिक ढाँचे में संस्थागत हो चुके हैं,
लेकिन अर्थव्यवस्था अभी तक स्थिर नहीं हो सकी है।
राजनीतिक व्यवस्था तभी टिकाऊ होती है जब आर्थिक आधार उसे मजबूती दे।

जेन-ज़ी आंदोलन के बाद विश्व बैंक ने नेपाल की आर्थिक वृद्धि को ५.१% तक नीचे कर दिया है।
इसके चलते व्यावसायिक क्षेत्र में गहरी निराशा है।

अंधकार में भी उम्मीद की किरण

कहा जाता है—
“काले बादलों में भी चाँदी की एक लकीर होती है।”

आशा की जा सकती है कि
मार्च २०२६ के आम चुनाव के बाद यही चाँदी की लकीर बनकर नए नेतृत्व का उदय होगा—
जो जनता से जुड़ा हो और निराशा को आशा में बदल दे।

तब तक सभी को
अंतरिम सरकार को सहयोग देना चाहिए ताकि चुनाव शांतिपूर्वक सम्पन्न हो सके।

धन कुमारी थापा ‘सरु’

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