कुलांगारों का देश : अजयकुमार झा
अजयकुमार झा, जलेश्वर । नेपाल की राजनीति एक बार फिर एक नए निर्णायक प्रणाली का इंतज़ार कर रही है। असलियत के नज़रिए से देखें तो यह मौजूदा मुश्किल राजनीतिक माहौल सिर्फ़ अस्थिरता और नाराज़गी का ही नतीजा नहीं है, बल्कि अयोग्य नेतृत्व, ओछी सोचवाली राजनीतिक दृष्टि, बिखरी हुई सांस्कृतिक संस्कार, उधार का राष्ट्रवाद, अमानवीय क्रूरता और चिरस्थाई परनिर्भरता के नेता निर्मित राष्ट्रघाती संस्कृति का भी नतीजा है। भले ही देश का पतन हो रहा है और घुट घुट कर दम तोड़ रही है, लेकिन यह समयानुकूल परिवर्तन और परिमार्जन की नींव तैयार करने के लिए संघर्ष भी कर रही है। इतिहास गवाह है कि हर राजनीतिक लड़ाई ने एक नया अध्याय शुरू किया है। आज नेपाल में जो असंतुलन दिख रहा है, पार्टी के अंदर फूट, लोगों में नाराज़गी, नई पीढ़ी के बागी सुर, पार्टियों का वैचारिक पतन और पुराने लीडरशिप की भ्रष्ट और थकी हुई छवि – ये सब नेपाली राष्ट्रीयता पर एक दाग साबित हुए हैं।
यह ब्रह्माण्ड निरन्तर गतिशील होने के कारण हमारे विचार और व्यवहार के संग संग अभिव्यक्ति के जगत भी परिवर्तनशील है। गतिशीलता हीं जिवन्तता के प्रमाण होने के कारण मानव समाज में इसके प्रति स्वाभाविक सम्मान होना सर्वविदित है। यहां कुछ भी स्थिर नहीं है, परन्तु चाक रूपी गतिशीलता के भीतर कील रूपी स्थिरता की कल्पना करने का प्रयास उच्च मानव समाज में ही संभव है। यह प्रयास उसके उत्कृष्ट बुद्धिमत्ता का प्रमाण भी है। हमारे जीवन में उपस्थित हर प्रकार के समस्याओं का समाधान खोजना ही मानवीय संवेदना और बौद्धिकता का प्रमाण है। समाज में निरंतर द्वंद्व चलता रहता है और यही द्वंद्व नया अवसर का भी निर्माण करता है। जीवन में यथार्थ के गर्भ में विपरीत तत्वों के बीच निरन्तर संघर्ष होता रहता है। अतः हमें संघर्षों के अंत के लिए नहीं सोचना चाहिए, बल्कि समयानुकूल रूपांतरण और परिमार्जन ही इसके चरमावस्था है और परम् उपलब्धि भी।
नेपाल की राजनीति भी उसी संघर्ष के गर्भ से मुक्ति पाने हेतु प्रसव बेदना से छटपटा रही है। संबंधित क्षेत्र के चिकित्सक अयोग्य और बिकाऊ प्रमाणित होने के कारण नेपाल माता अपनी ही कुलांगारों से रक्तरंजित अवस्था में पहुंच गई हैं। नेपाली मातृत्व के ऊपर वैदेशिक काले काले बादल मंडराते दिखाई देते हैं। अपनी अस्मिता और राष्ट्रीयता के ऊपर छाए इन बादलों से नवयुवकगण अपनी सामर्थ्य और क्षमता अनुसार प्राणाहुति तक देने को तत्पर दिख रहे हैं। तीन दशक पुराने लोकतान्त्रिक यात्रा ने जनता को अधिकार का आभास तो कराया, लेकिन अपेक्षाकृत उपलब्धियों का न्यायोचित वितरण नहीं हुआ। मुठ्ठीभर नेता, कर्मचारी और कार्यकर्ताओं ने देश को कब्जा कर भ्रष्टाचार और अत्याचार का नंगा ताण्डव करने लगा। परिणाम स्वरूप देश में जेन जीद्वारा लंका काण्ड का आरंभ हुआ। विदेशीयों के इसारा में भीषण नर संहार और लंका दहन की चपेट में राष्ट्रियता रूपी मन्दिर को झोंक दिया गया। “फ्रांस जल रहा है, निरो बाँसुरी बजा रहा है।”

नेपाल में हुए विश्व चर्चित और विश्व प्रेरित ऐतिहासिक जेन जी क्रान्ति केवल सड़क पर युवाओं का आक्रोश नहीं था। यह तो दुर्गन्धित साम्यवादी और क्षुद्र समाजवादी विचारधारा को प्रशोधन और परिमार्जन कर राष्ट्र को अधोगति से मुक्ति और उर्ध्वगति की ओर ले जाने की युग सापेक्ष तथा राष्ट्रीय चेतना का पुनर्जागरण भी है। युवा पुस्ता ने पुरानी नीतिगत जड़ता और नेतृत्व में कुंठित स्वार्थीपन को खुलेआम चुनौती देते हुए राष्ट्र निर्माण के लिए भविष्य में भी अपनी प्राणों की आहुति देने को तत्पर दिख रहे हैं। नेपाल के जेन जी युवा लोग केवल विरोध के लिए विरोध करते हुए राष्ट्र के गति में अवरोध उत्पन्न करना नहीं चाहते हैं। वो तो राष्ट्रघाति विदेशी दलालों को ठिकाने लगाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। वास्तव में जेन जी युवा लोग आम नेपाली जनता के भावनाओं को सम्बोधन करने के उद्देश्य से नया सोच, पारदर्शिता, जवाबदेहिता और संभावनाओं के राजनीति को खोज रहे हैं। क्योंकि सब ओर से जर्जर पुरानी राजनीतिक व्यवस्था और संरचना से जनता के भावनाओं का और राष्ट्रीय आकांक्षाओं को सम्बोधन नहीं किया जा सकता है। अतः ऐसी जटिल अवस्था में ही नया शक्ति का जन्म होता है, जो नेपाली जेन जी युवाओं के नेतृत्व में ही संभव है। वैसे तो नेपाल के सभी राजनीतिक दल आंतरिक पुनर्संरचना के सामाजिक मनोवैज्ञानिक दवाब को झेल रहा है। हरेक पार्टी के युवा कार्यकर्ता और केंद्रीय नेतृत्व के बीच सत्ता और शक्ति पुस्तांतरण के लिए सृजित आंतरिक कलह चरमोत्कर्ष पर है। इसका त्वरित समाधान ही उक्त पार्टी के दीर्घायु का कारक बनेगा, अन्यथा समूल नष्ट अवश्यंभावी है। दनादन नई नई पार्टियों का निर्माण होना वैचारिक क्रांति का ही सूचक है। अतः अपडेट हो जाएं अन्यथा आउट ऑफ डेट होना निश्चित है।

सामाजिक सञ्जाल में आँधी तुफान की तरह प्रसारित अत्याधुनिक राजनैतिक विचार, सिद्धान्त और युग सापेक्ष प्रणालियों को समाहित कर राष्ट्रिय भावना को सम्बोधन कर सकनेवाली एक सशक्त और सार्वभौम अधिकार सम्पन्न राजनीतिक पार्टी के भीतर लोकप्रिय नेतृत्वों को सम्मान सहित समाहित कराने का नागरिक समाज के भागीरथ प्रयास ने नया नेपाल के निर्माण में अहम भूमिका अदा करनेवाली है।
प्रचण्ड नेतृत्व के वैचारिक दिशाहीनता, ओली के सर्वसत्तावादी प्रवृत्ति की आलोचना, कांग्रेस भीतर के पुस्तान्तरण की माग और स्वतन्त्र राजनीतिक समूहों के उदय ने पुराने पार्टियों को आत्म समीक्षा करने पर बाध्य कर दिया है। पार्टी भीतर के लोकतान्त्रिकरण, समयानुकूल वैचारिक समायोजन, और युवापुस्ता के दूरगामी उपलब्धिमूलक सहयात्रा जैसे अनिवार्य बिन्दुओं को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता है। जबकि उपरोक्त विषयों को निजी और जातीय लाभ के लिए अभितक इन धूर्तों ने सर्वमान्य सूत्र के रूपमें स्वीकारने पर मजबूर करते आया है। इनका विरोध करनेवाला हर किसी के हस्ती को धूल बना दिया जाता रहा है। नेपाल के वर्तमान राजनीतिक उहापोह और अन्यौल का एक सशक्त पक्ष यह भी है।
लोकतन्त्र के नामपर नव राजतन्त्र के संस्कार को संस्थागत करने जैसी घटिया मानसिकता ने ही देश की आर्थिक अवस्था को ध्वस्त कर राजनैतिक प्रणाली को तानाशाही शासन व्यवस्था में परिणत करने की कुत्सित मानसिकता के विरुद्ध छिड़े भीषण जेन्जी क्रान्ति को आम नेपाली जनता ने मौन समर्थन किया है। इतनी मानवीय र भौतिक क्षति होने के बावजूद नेपाली जनता में उन युवाओं के प्रति आक्रोश के बदले सहानुभूति दिखना भी सत्ताधारी प्रति के भीषण घृणा को स्पष्ट करता है। एक एक नेपाली जनता के मन में उबल रहे वैचारिक और मानसिक द्वन्द्व ने न्यायोचित और सृजनात्मक निकास के अवस्था को न देख पाने के कारण ही आत्मघाती निकास के रास्ता को अपनाया गया है कि जैसा महसूस होता है। शक्ति को समय में ही समुचित व्यवस्थापन न किया जाए तो वह विस्फोटक रूप धारण करता है, इस सर्वमान्य सिद्धान्त को जानते हुए भी अनजान बननेवाले लोग आज अपनी कमजोरियों को छुपाने के लिए उन युवाओं पर सारा दोष मढ़ने का षडयंत्र कर रहे हैं।
अगर चुनाव में पुराने लोग ही सत्ता में पुनः स्थापित हो जाते हैं तो जेन जी आन्दोलन को नेतृत्व करनेवाले युवा लोग कल के दिन में कानुनी फन्दा में नहीं पड़ेंगे यह नहीं कहा जा सकता। और इस संभावित दुर्घटना को आधुनिक युवा लोग भलीभांति समझते हैं। यही कारण है की युवा लोग अपनी शक्ति को स्थापित करने के लिए पुनः आंदोलित हो गए हैं। परन्तु खण्डित विचार और अपरिपक्व सोच के कारण आज भी जेन जी युवा एक छत के नीचे नहीं आ पाए हैं। ज्ञातव्य हो ! जबतक जेन जी युवा लोग एक स्वर में बात नहीं करेंगे तबतक नव नेपाल के सुंदर भविष्य के आधार की परिकल्पना नहीं की जा सकती।
जेन-जी क्रांति की शुभारम्भ युवा शक्तियों के द्वारा किया गया लेकिन मानवीय हिंसा और नेपाल दहन जैसी राष्ट्रघाती पूर्व नियोजित कार्य घात लगाकर तम्तयार बैठे आतंकी समूहों के द्वारा युवाओं को बदनाम करने के उद्देश्य से किया गया। आन्दोलन की आवश्यकता स्वाभाविक स्वाभाविक होने के बावजूद इसके स्वरूप और स्वार्थ में मतभेद होने से आजतक देश अन्यौलग्रस्त अवस्थामा में ही है। जेन जी के द्वारा निर्मित सरकार और प्रधान मन्त्री को बर्खास्त करने के लिए तीन महिना में ही युवाओं को सडक पर आंदोलनरत होना पड़ गया है। सरकार एक ओर चुनाव की तैयारी में है तो वहीं दूसरी ओर देश बहुआयामिक रूप में आन्दोलन के चक्रव्यूह में फंसती जा रही है।
युवा पुस्ता और आम नेपाली नागरिक के भीतर दबी हुई निराशा और आक्रोश को समाधान करने की केन्द्रिय उद्देश्य से निर्मित वर्तमान सरकार ने अपनेआप को चुनावी अभियान में केन्द्रित रखना कहीँ न कहीँ राष्ट्र के मूल समस्या और एजेन्डा से दूर भागने की तरह दिखाई देता है। यदि चुनाव से ही समाधान संभव होता तो इस सरकार को बर्खास्त करने की जरूरत ही क्या थी? चुनाव में वही लोग अन्य नाम के पार्टियों से विजय होकर सत्ता में स्थापित हो सकते हैं। तो फिर इस ऐतिहासिक क्रांति की क्या उपलब्धि रही? हां, यही विन्दु विचारणीय है और जेन जी आन्दोलन का केन्द्रिय विषय भी यही है। देश द्रोहियों की पहिचान, भ्रष्टों की पहिचान और जनघाती चरित्र की पहिचान कर वैसे को कानून के घेरे में लाकर निष्पक्ष, निश्कलंक तथा योग्यतम व्यक्तियों को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय प्रतिभागी हेतु निर्णायक कदम उठाना था। ज्ञातव्य हो! २३ गते के प्रथम चरण अर्थात् हिंसा, आगजनी लुटपाट होने से पहले आन्दोलनकारी पवित्र मन से भ्रष्टाचार अन्त्य करने, स्थिर सरकार और संसद् की अवधि चार वर्ष के बनाने में ही सीमित थी। लेकिन उनकी मांगों को अपनी स्वार्थ के सेतु बनाने हेतु खलनायकों ने हिंसा और आगजनी जैसे पाशविकता को अंजाम। व्यक्तिगत स्वार्थ और प्रतिशोध के कारण राष्ट्रीय गरिमा को नस्तनावुद करनेवाला कदापि नेपाली नागरिक नहीं हो सकते। नेपाली जनता के सार्वभौम सम्प्रभुता पर प्रहार करने वाले इस मिट्टी के संतान नहीं हो सकते। वे सब के सब कुलांगार हैं, जिसका असली स्थान जेलखाना ही है।
विद्यावाचस्पति अजय कुमार झा


