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प्रिय माँ : मनोज शर्मा गौतम

 

प्रिय माँ,
आप कितनी महान हैं न ?
सौभाग्य छीन लेने वाली जलनों को
आप अपनी मुस्कान के मुखौटे के
पीछे छिपा लेती हैं ।
इस खुरदुरी हंसी के पीछे की पीड़ाओं को
आप अपनी ही ह्दय में दबा लेती हैं ।
और बरबस बरसे आँसूओं की धाराओं को ,
कोई देख न सके सूखा लेती हैं ।

प्रिय माँ,
मैं देख रहा हूँ,
आपके दोनों प्रतिबिम्ब,
वो पीड़ा और वो शक्ति,
पिता के स्वर्ग यात्रा को सहज बनाने हेतु,
कलश में जल और थाली में दीप जलाकर
स्वर्ग और धरती बीच पुल बनाया है ।
शब्द नहीं है, लेकिन प्रार्थना करती हैं–
कि जहाँ भी रहे , शान्त रहें
मेरे आधे आकाश कहते हुए दोनों हाथ जोड़ती हैं ।।
प्रिय माँ,
सभी चोट में रक्त कहाँ आता है ?
मात्र भीतर ही भीतर आत्मा को गलाता है ।
दिखने वाले घाव के लिए तो मलहम होता है ।
अदृश्य पीड़ा तो ह्दय को जलाती है ।।
हँसना कहाँ आसान होता है ?
कुंठा को रौंदकर, कुचलकर उठना पड़ता है ।
जीवन भी कहाँ आसान होता है ?
पीड़ा को छुपाकर संभलना पड़ता है।।
प्रिय माँ,
उस शोक के भीतर भी एक अदृश्य शक्ति है ।
जब आप कहती हैं “ तुम्हारे पिता मेरे भीतर ही हैं ”
आपकी यह बातें सुनकर
मन टूटता है, लेकिन गर्व का अनुभव भी होता है,
कि पिता के प्रति आपकी अटल श्रद्धा और भक्ति है।
प्रिय माँ,
आपकी मौनता मेरी प्रेरणा है,
आपका साहस मेरी प्रार्थना है,
आपकी गर्म गोद मेरा पहला ब्रह्माण्ड,
जहाँ माया, ममता और धैर्यता मिलती है ।
उलझी आशाएं और थके से कदम
आपके गर्म स्पर्श से हर थकान मिट जाती है।।

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मनोज शर्मा गौतम

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