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नेपाल की राजनीति में बुद्धिजीवियों का दोहरा चरित्र: जेन्जी विद्रोह से नए विकल्पों तक : जय प्रकाश आनन्द

 
जयप्रकाश आनन्द

जयप्रकाश आनन्द, काठमांडू, 30 दिसम्बर । नेपाल का हालिया राजनीतिक इतिहास केवल राजनीतिक दलों की विफलताओं से ही विकृत नहीं हुआ है, बल्कि उन बुद्धिजीवियों के एक वर्ग की दोहरी भूमिका ने भी इसे गहराई से प्रभावित किया है, जो इन दलों को वैचारिक आवरण प्रदान करते रहे हैं। जेन्जी विद्रोह से पहले का कालखंड इसका एक जीवंत उदाहरण है।

जेन्जी विद्रोह से पहले यही बौद्धिक वर्ग कांग्रेस–एमाले सत्ता गठबंधन से खुलकर संतुष्ट नहीं था। केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सरकार की लगातार आलोचना की गई और नेपाली कांग्रेस को “गठबंधन तोड़ने” की नसीहत दी जाती रही। उनके विमर्श में सत्ता अस्थिर थी, गठबंधन अप्राकृतिक था और ‘सुधार’ अपरिहार्य बताया जाता था।
लेकिन जब वही असंतोष भयावह जेन्जी विद्रोह के रूप में विस्फोटित हुआ, तो इन्हीं बुद्धिजीवियों की आवाज अचानक बदल गई।

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विद्रोह को ‘स्वाभाविक’ कहा गया, लेकिन उसके परिणामों को ‘विध्वंसक’ करार दिया गया। यहां एक खतरनाक चुप्पी साफ दिखी— जेन्जी के राजनीतिक, सामाजिक और पीढ़ीगत सवालों पर बोलने का साहस किसी ने नहीं किया। पूरी जिम्मेदारी ‘विदेशी साज़िश’ के खाते में डाल दी गई। यह ईमानदार विश्लेषण नहीं, बल्कि बौद्धिक पलायन था।

हकीकत यह है कि ये बुद्धिजीवी परोक्ष रूप से पुरानी स्थिति की पुनरावृत्ति चाहते थे। कांग्रेस, एमाले और माओवादी के सीमित दायरे में ही ‘चुनाव के बाद’ का राजनीतिक ध्रुवीकरण हो, सत्ता फिर उन्हीं हाथों में घूमती रहे— यही उनकी अघोषित इच्छा थी। परिवर्तन की बात करना, लेकिन परिवर्तन आते ही घबरा जाना— यही इनका असली चेहरा है।

आज हालात फिर एक निर्णायक मोड़ पर हैं। जब पुराने दलों को सीधी चुनौती देने वाले नए संकेत दिखने लगे— बालेन शाह और रवि लामिछाने के बीच चुनावी समझदारी की चर्चा हुई, बालेन शाह को संभावित भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में देखने की बहस शुरू हुई— तब यही बौद्धिक वर्ग फिर से विचलित हो गया। विश्लेषण गायब हो गया, तर्क कमजोर पड़ गए और एक बार फिर ‘विदेशी साज़िश’ का पुराना राग छेड़ दिया गया।

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प्रश्न बेहद सरल हैं—
यदि जनता आधारित नया राजनीतिक विकल्प देशी नहीं है, तो देशी आखिर क्या है?
यदि युवाओं का असंतोष साज़िश है, तो पुराने दलों की विफलता क्या है?

ये बुद्धिजीवी वास्तव में लोकतंत्र की रक्षा से नहीं डर रहे; वे अपने वैचारिक प्रभुत्व के टूटने से भयभीत हैं। क्योंकि नया नेतृत्व न उनके पुराने सिद्धांत ढोता है, न उनकी अनुमति से राजनीति करता है। इसलिए बालेन ‘अराजक’ नजर आते हैं, रवि ‘खतरनाक’ घोषित किए जाते हैं और जनता को ‘भ्रमित’ करार दिया जाता है।

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यह प्रवृत्ति केवल कायरता नहीं, बल्कि बौद्धिक बेईमानी है। जेन्जी विद्रोह के समय सवाल न उठाना, लेकिन नए राजनीतिक विकल्प दिखते ही देश के अस्थिर होने का डर दिखाना— यह दोहरा चरित्र अब पूरी तरह उजागर हो चुका है।

आज नेपाल के लिए विदेशी साज़िश से भी बड़ा खतरा इन स्वघोषित बुद्धिजीवियों की चयनात्मक चेतना है। जब तक यह वर्ग आत्मआलोचना के कठघरे में खड़ा नहीं होता, तब तक न विद्रोह को समझा जा सकेगा, न परिवर्तन को स्वीकार किया जाएगा, और न ही लोकतंत्र मजबूत होगा।

अब सवाल बुद्धिजीवियों से नहीं, जनता से है—
पुरानी गलतियों को वैचारिक भाष्य बनाकर दोहराना है, या नए जोखिमों के साथ नई संभावनाओं को अवसर देना है?
इतिहास इसी उत्तर की तलाश में है।

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