शरणार्थी समस्या : गंभीर मानव संकट – अजय कुमार झा
अजयकुमार झा, हिमालिनी अंक दिसम्बर । विश्व में शरणार्थी समस्या एक जटिल और गंभीर मानवीय संकट है, जो लाखों लोगों को प्रभावित करता है । शरणार्थी वे व्यक्ति हैं जो युद्ध, हिंसा, उत्पीड़न, या प्राकृतिक आपदाओं के कारण अपने देश छोड़कर दूसरे देशों में शरण लेने को मजबूर होते हैं । संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (ग्ल्ज्ऋच्) के अनुसार, २०२३ तक विश्व में लगभग १० करोड़ से अधिक लोग जबरन विस्थापित हुए हैं, जिनमें शरणार्थी, आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्ति (क्ष्म्एक), और शरण चाहने वाले शामिल हैं । इतिहास और वर्तमान में दुनिया के कई देशों ने मुस्लिमों को विभिन्न कारणों से शरण दी है, चाहे वो धार्मिक उत्पीड़न से भाग रहे हों, युद्ध के कारण विस्थापित हुए हों या राजनीतिक अत्याचार से पीडि़त हों ।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में मुस्लिमों को शरण देने वाले देश इथियोपिया (अबीसीनिया)ः पैगंबर मुहम्मद के समय मक्का में मुसलमानों पर अत्याचार हो रहा था, तब उन्होंने अपने कुछ अनुयायियों को ईसाई राजा “नजाशी” के अधीन इथियोपिया भेजा । उन्होंने उन्हें शरण दी और सुरक्षा प्रदान की । यह पहली हिजरत (ःष्नचबतष्यल) मानी जाती है । इसीतरह मदीना (यथ्रिब) जब मक्का में स्थिति और भी खराब हो गई तो पैगंबर और उनके अनुयायी मदीना चले गए । मदीना के “अंसार” (स्थानीय मुसलमानों) ने “मुहाजिरीन” (मक्का से आए प्रवासियों) को शरण दी और भाईचारे का उदाहरण प्रस्तुत किया ।
आधुनिक समय में मुस्लिमों को शरण देने वाले प्रमुख देश मध्य पूर्वः टर्की (त्गचपभथ)ः सीरिया, इराक, अफगानिस्तान आदि से आए लाखों मुस्लिम शरणार्थियों को टर्की ने शरण दी है । टर्की सबसे अधिक सीरियाई शरणार्थियों (४० लाख से अधिक) को शरण देने वाला देश है । जॉर्डन और लेबनानः इन देशों ने भी लाखों सीरियाई और फिलिस्तीनी मुस्लिमों को शरण दी है । ईरानः अफगान शरणार्थियों को १९८० के दशक से शरण दे रहा है । कई हजारा मुस्लिम भी ईरान में बसे हैं । खासकर २०१५ के बाद, जर्मनी ने लाखों सीरियाई और अफगानी मुस्लिम शरणार्थियों को शरण दी । एंजेला मर्केल की नीति को इसके लिए जाना जाता है । स्वीडन, नॉर्वे, फ्रांस, नीदरलैंड्स, बेल्जियमः इन देशों ने भी मुस्लिम शरणार्थियों को स्वीकार किया, लेकिन इसके साथ कई सामाजिक और राजनीतिक विवाद भी उत्पन्न हुए । पाकिस्तान ने १९७९ में सोवियत–अफगान युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने ३० लाख से अधिक अफगान मुस्लिम शरणार्थियों को शरण दी । आज भी कई अफगान शरणार्थी पाकिस्तान में हैं । बांग्लादेश ने म्यांमार के रखाइन राज्य से भागे रोहिंग्या मुस्लिमों (१० लाख से अधिक) को बांग्लादेश ने शरण दी है, विशेषकर कॉक्स बाजार में । भारत ने भी सीमित रूप में कुछ अफगान, रोहिंग्या और अन्य मुस्लिम शरणार्थियों को स्थान दिया है, हालांकि स्थिति जटिल और विवादास्पद रही है । सूडान, चाड, नाइजर, मिस्रः इन देशों ने अपने क्षेत्रों में मुस्लिम शरणार्थियों को स्वीकार किया है, विशेषकर दारफुर, लीबिया और दक्षिण सूडान के संकटों के दौरान । मलेशिया और इंडोनेशिया ने रोहिंग्या मुस्लिमों को समुद्र मार्ग से आकर कुछ हद तक शरण दी गई, हालांकि सीमाएं सीमित रहीं । यूएसए और कनाडा ने युद्धग्रस्त मुस्लिम देशों से आए प्रवासियों को शरण दी, खासकर सीरिया, अफगानिस्तान, इराक से ।
शरणार्थी समस्या के प्रमुख कारण ः
युद्ध और हिंसाः सीरिया, अफगानिस्तान, दक्षिण सूडान, और म्यांमार जैसे देशों में चल रहे सशस्त्र संघर्षों ने लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर किया है ।
राजनीतिक और धार्मिक उत्पीड़न ः अल्पसंख्यक समूहों, जैसे रोहिंग्या (म्यांमार) और यजÞीदी (इराक), को नरसंहार और भेदभाव के कारण शरण लेनी पड़ती है ।
प्राकृतिक आपदाएँ और जलवायु परिवर्तन ः बाढ़, सूखा, और तूफान जैसे पर्यावरणीय संकट छोटे द्वीपीय देशों और तटीय क्षेत्रों में लोगों को विस्थापित कर रहे हैं ।
आर्थिक और सामाजिक अस्थिरता ः कुछ लोग गरीबी और अस्थिरता के कारण बेहतर जीवन की तलाश में अन्य देशों की ओर पलायन करते हैं, हालांकि ये तकनीकी रूप से शरणार्थी नहीं कहलाते ।
वैश्विक प्रभाव ः
मानवीय संकट ः शरणार्थी शिविरों में अक्सर अपर्याप्त भोजन, पानी, और चिकित्सा सुविधाएँ होती हैं । उदाहरण के लिए, बांग्लादेश में रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों में लाखों लोग अमानवीय परिस्थितियों में रह रहे हैं ।
सामाजिक तनाव ः मेजबान देशों में शरणार्थियों की बड़ी संख्या से संसाधनों पर दबाव पड़ता है, जिससे स्थानीय आबादी और शरणार्थियों के बीच तनाव पैदा हो सकता है ।
आर्थिक बोझ ः शरणार्थियों को सहायता प्रदान करने के लिए मेजबान देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भारी आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है ।
अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी ः १९५१ का शरणार्थी सम्मेलन और इसका १९६७ प्रोटोकॉल शरणार्थियों के अधिकारों की रक्षा करता है, लेकिन कई देश इन जिम्मेदारियों को पूरी तरह लागू नहीं करते ।
प्रमुख आ“कड़े (२०२३)ः
– विश्व में २.६ करोड़ शरणार्थी हैं, जिनमें से आधे से अधिक मध्य पूर्व और अफ्रीका से हैं ।
– ५.३ करोड़ लोग अपने देश के भीतर ही विस्थापित हैं (क्ष्म्एक) ।
– तुर्की, कोलंबिया, जर्मनी, और युगांडा जैसे देश सबसे अधिक शरणार्थियों की मेजबानी कर रहे हैं ।
– ७०% शरणार्थी पड़ोसी देशों में शरण लेते हैं, जो अक्सर स्वयं संसाधन–सीमित होते हैं ।
समाधान के प्रयासः
पुनर्वास ः कुछ शरणार्थियों को विकसित देशों में पुनर्वासित किया जाता है, लेकिन यह संख्या बहुत कम है (२०२२ में केवल १.१४ लाख शरणार्थी पुनर्वासित हुए) ।
स्वैच्छिक प्रत्यावर्तन ः जब स्थिति सुरक्षित हो, कुछ शरणार्थी अपने देश लौटते हैं, लेकिन यह प्रक्रिया धीमी और जोखिम भरी होती है ।
स्थानीय एकीकरण ः मेजबान देशों में शरणार्थियों को शिक्षा, रोजगार, और सामाजिक सेवाएँ प्रदान कर एकीकृत करने के प्रयास ।
अंतरराष्ट्रीय सहायता ः ग्ल्ज्ऋच्, क्ष्इः, और अन्य संगठन शरणार्थियों को भोजन, आश्रय, और सुरक्षा प्रदान करते हैं ।
चुनौतिया“ः
राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमीः कई देश शरणार्थियों को स्वीकार करने में हिचकिचाते हैं ।
वैश्विक असमानताः धनी देश अक्सर शरणार्थी संकट का बोझ गरीब देशों पर डालते हैं ।
मानव तस्करीः शरणार्थी अक्सर तस्करों और शोषण का शिकार बनते हैं ।
शरणदाता देशों के धर्म और संस्कृति पर अपनी धर्म और संस्कृति का बुरा प्रभाव डालते हैं । संवंधित देशों को कब्जा करने के उद्देश्य से गतिबिधियाँ चलाते हैं ।
उपरोक्त तथ्यों के विश्लेषण करने पर शरणार्थी समस्या केवल मानवीय नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और गहन राजनीतिक मुद्दा के रूपमें हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहा है । इसके समाधान के लिए वैश्विक सहयोग, एक सीमित समय सीमा का निर्धारण, नागरिक के परम्परागत धारणा और मानसिकता का गहरा खÞयाल होना और मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक है । यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि शरणार्थियों को न केवल सुरक्षा, बल्कि सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन भी मिले और शरणार्थी होने की सभी सम्भावनाओं को जड़ से निर्मूल किया जाय । ध्यान रहे ! शरणार्थी समस्या और योजनाबद्ध धार्मिक–राजनीतिक षडयंत्र का मुद्दा एक जटिल और संवेदनशील विषय है, जो अक्सर विवादास्पद दावों, सिद्धांतों और तात्कालिक राजनीतिक तथा आर्थिक लाभ से जुड़ा होता है । इसे समझने के लिए दोनों पहलुओं को अलग–अलग देखना जरूरी है, साथ ही यह भी विश्लेषण करना कि कैसे कुछ लोग या समूह शरणार्थी संकट को धार्मिक या राजनीतिक षडयंत्र के रूप में प्रायोजित करते हैं ।

धार्मिक जनसांख्यिकी में परिवर्तन ः
– कुछ लोग दावा करते हैं कि शरणार्थियों के पुनर्वास को किसी खास धर्म (जैसे इस्लाम या अन्य अल्पसंख्यक धर्म) की आबादी बढ़ाने के लिए उपयोग किया जा रहा है, खासकर भारतीय महाद्वीप, यूरोप या पश्चिमी देशों में । उदाहरण के लिए, “ग्रेट रिप्लेसमेंट थ्योरी“ का दावा है कि गैर–यूरोपीय शरणार्थियों को जानबूझकर पश्चिमी देशों में बसाया जा रहा है ताकि वहाँ की मूल संस्कृति और जनसांख्यिकी को बदला जा सके ।
राजनीतिक अस्थिरता ः
सामाजिक, सांस्कृतिक अनुसन्धाताओं का यह दावा हैं कि शरणार्थी संकट को कुछ सरकारें या वैश्विक संगठन (जैसे संयुक्त राष्ट्र) जानबूझकर बढ़ावा दे रहे हैं ताकि मेजबान देशों में सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो । इसका उद्देश्य कथित तौर पर सरकारों को कमजोर करना या वैश्विक नियंत्रण स्थापित करना हो सकता है । प्रमाण के तौर पाकिस्तान और बंगलादेस में हिन्दुओं के साथ हो रहे क्रूर अमानवीय व्यवहार का ग्क्ब् द्वारा मौन समर्थन.
आर्थिक और सामाजिक हथियार के रूप में ः
शरणार्थी संकट का उपयोग कुछ देशों द्वारा अपने विरोधी देशों को कमजोर करने के लिए किया जाता है । उदाहरण के लिए, कुछ लोग तर्क देते हैं कि कुछ राष्ट्र शरणार्थियों को पड़ोसी देशों की ओर धकेलते हैं ताकि वहाँ संसाधनों पर बोझ बढ़े और सामाजिक तनाव पैदा हो ।
वास्तविकता और विश्लेषण ः
साक्ष्य की कमी ः अधिकांश योजनाबद्ध धार्मिक–राजनीतिक षडयंत्र सिद्धांतों का कोई ठोस सबूत नहीं है । ये सिद्धांत अक्सर सामाजिक असंतोष, भय, और धार्मिक÷सांस्कृतिक असुरक्षा की भावनाओं पर आधारित होते हैं । ग्ल्ज्ऋच् और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के डेटा से पता चलता है कि शरणार्थी संकट का मूल कारण युद्ध, हिंसा, और धार्मिक÷सांस्कृतिक उत्पीड़न हैं । इसमें अन्तर्निहित सुनियोजित साजिश का ठोस प्रमाण खोजना कठिन काम जरुर है लेकिन घटनाओं के कारण और कारण के भी कारण का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाय तो षडयंत्र के काले बादल स्पष्ट दिखाई देंगे ।
शरणार्थी संकट का मानवीय पक्षः शरणार्थी आमतौर पर अपनी जान बचाने और बेहतर जीवन की तलाश में पलायन करते हैं । उन्हें किसी “षडयंत्र” का हिस्सा मानना मानवता के दृष्टि से एक हिचकिचाहट पैदा करता है परन्तु नजिक के देशों में न जाकर हजारो किलोमीटर दूर देश जहाँ न कोई नाता न कुटुंब है वहाँ जाने के लिए उत्सुक होना और अभिप्रेरित किए जाना योजनाबद्ध षडयंत्र को प्रमाणित करता है ।
राजनीतिक उपयोग ः हालांकि कुछ राजनीतिक समूह या नेता शरणार्थी संकट का उपयोग अपने एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए कर सकते हैं (जैसे, अति सत्तावादी या लोकलुभावन वोट की राजनीति) भारत में कांग्रेस, सपा, ममता आदि इसका ज्वलंत उदाहरण है ।

भारत के संदर्भ में ः
भारत में भी शरणार्थी मुद्दा (जैसे, रोहिंग्या या बांग्लादेशी प्रवासियों) को लेकर धार्मिक–राजनीतिक विवाद देखने को मिलते हैं । कुछ समूह इन्हें “घुसपैठिया” कहकर धार्मिक आधार पर निशाना बनाते हैं, जबकि अन्य इसे मानवीय मुद्दा मानते हैं । भारत १९५१ के शरणार्थी सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, लेकिन फिर भी वह लाखों शरणार्थियों (जैसे, तिब्बती, श्रीलंकाई तमिल) को आश्रय देता है ।
शरणार्थी संकट मुख्य रूप से एक मानवीय और भू–राजनीतिक समस्या है, जिसके पीछे जटिल सामाजिक–आर्थिक कारण हैं । योजनाबद्ध धार्मिक–राजनीतिक षडयंत्र के दावे अक्सर तथ्यों पर आधारित नहीं होते और सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देते हैं । इस मुद्दे को समझने के लिए तथ्य–आधारित विश्लेषण और संवेदनशील दृष्टिकोण जरूरी है । शरणार्थियों के प्रति नीतियाँ मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर आधारित होनी चाहिए, न कि भय या साजिश के सिद्धांतों पर । शरणार्थी प्रवास का धार्मिक और राजनीतिक माहौल पर प्रभाव एक जटिल और संवेदनशील मुद्दा है । शरणार्थियों का आगमन विभिन्न देशों में सामाजिक, सांस्कृतिक, और राजनीतिक गतिशीलता को प्रभावित कर रहा है, लेकिन यह प्रभाव अक्सर स्थानीय संदर्भ, शरणार्थियों की संख्या, और मेजबान देश की नीतियों पर निर्भर करता है । नीचे कुछ प्रमुख देशों का उल्लेख है, जहां शरणार्थी प्रवास ने धार्मिक और राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया है, साथ ही इसके कारण और परिणामों का संक्षिप्त विश्लेषण दिया गया है । यह विश्लेषण तथ्य–आधारित है और यथासंभव निष्पक्ष भी ।
यूरोप (जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन, आदि) ः २०१५ के शरणार्थी संकट (मुख्य रूप से सीरिया, अफगानिस्तान, और इराक से) के दौरान यूरोप में लाखों शरणार्थी पहुंचे । इसने कई यूरोपीय देशों में राजनीतिक और धार्मिक प्रणाली को प्रभावित किया क्योंकि अधिकांश शरणार्थी मुस्लिम पृष्ठभूमि से थे, जिसके कारण कुछ समूहों ने “इस्लामीकरण“ या सांस्कृतिक परिवर्तन के डर को फैलाया है ।
तुर्कीः तुर्की विश्व में सबसे अधिक शरणार्थियों की मेजबानी करने वाला देश है, जिसमें लगभग ३७ लाख सीरियाई शरणार्थी (२०२३ तक) शामिल हैं । चूंकि अधिकांश सीरियाई शरणार्थी सुन्नी मुस्लिम हैं, तुर्की में धार्मिक माहौल पर सीधा प्रभाव कम है, क्योंकि तुर्की भी मुख्य रूप से मुस्लिम देश है । हालांकि, कुछ क्षेत्रों में सांस्कृतिक और सामाजिक अंतर (जैसे, अरबी बनाम तुर्की संस्कृति) ने तनाव पैदा हो रहा है । इस्तांबुल और गाजियांटेप जैसे शहरों में शरणार्थियों की बड़ी संख्या ने स्थानीय संसाधनों पर कब्जा करना शुरू किया, जिससे कुछ क्षेत्रों में सामाजिक तनाव भी बढ़ा ।
बांग्लादेश ः म्यांमार से रोहिंग्या शरणार्थियों (लगभग १० लाख, २०२३ तक) के आगमन ने बांग्लादेश के धार्मिक और राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया । रोहिंग्या मुख्य रूप से मुस्लिम हैं, और बांग्लादेश भी मुस्लिम–बहुल देश है । हालांकि, कुछ स्थानीय समुदायों ने रोहिंग्या को “बाहरी” मानकर उनके प्रति असंतोष व्यक्त किया । अब जबकि भारत के नए कानून क्क्ष्च् के भय से रोहिंगिया घुसपैठिया भारत से लाखों की संख्या में पलायन कर नेपाल में घुसपैठ कर रहें है । जो कल के समय में शरणार्थी के रूपमें अपने को स्थापित करने के लिए वैश्विक दबाव के साथ साथ चक्काजाम और तोड़फोड़ करेंगे । नेपाल के कमजोर और बिकाऊ सरकार वोट, सत्ता और धन के लोभ में उनके पक्ष में लालू, कांग्रेस, सपा, ममता इत्यादि के नेपाली संतान आवाज बुलंद करना आरम्भ कर देंगे ।

