Tue. Feb 17th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

सुशीला कार्की सरकार का फैसला न्यायिक स्वतंत्रता पर आघात है

 

काठमांडू, १६ जनवरी । नेपाल में सहकारी ठगी और उससे जुड़े सम्पत्ति शुद्धीकरण (Money Laundering) के मामलों में हालिया सरकारी निर्णय ने न्यायिक व्यवस्था, राजनीतिक नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं—तीनों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि जहां इच्छाराज तामाङ, केदारनाथ शर्मा, रविन्द्र चौलागाईं और जीबी राई जैसे आरोपियों पर मनी लॉन्ड्रिंग के मुकदमे कायम हैं, वहीं राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के सभापति रवि लामिछाने को उसी श्रेणी के आरोपों से उन्मुक्ति दे दी गई।

रवि लामिछाने का मामला अलग क्यों?

महान्यायाधिवक्ता कार्यालय ने अदालत में दायर आरोपपत्र में संशोधन कर रवि लामिछाने के खिलाफ

  • सम्पत्ति शुद्धीकरण
  • संगठित अपराध

से जुड़े आरोप हटाने का निर्देश दिया। आधिकारिक तर्क यह दिया गया कि पर्याप्त आधार और प्रमाण नहीं हैं तथा यह निर्णय “नो प्रोसिक्युशन” (मुकदमा न चलाने) की अंतरराष्ट्रीय अवधारणा के अनुरूप है।

लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह तर्क कमजोर है, क्योंकि:

  • सहकारी ठगी स्वयं “प्रेडिकेट ऑफेन्स” है
  • और मनी लॉन्ड्रिंग उसका स्वाभाविक “सेकेंडरी ऑफेन्स”
यह भी पढें   वर्टिकल फार्मिंग के माध्यम से अगले 5 वर्षों में 50 लाख रोजगार, जनता समाजवादी पार्टी, नेपाल का घोषणा पत्र सार्वजनिक

ऐसे में मूल अपराध को कायम रखते हुए केवल मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप हटाना कानूनी रूप से असंगत और चयनात्मक (Selective Justice) प्रतीत होता है।

राजनीतिक उद्देश्य क्या है?

वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों और अधिवक्ताओं के अनुसार, इस निर्णय के पीछे तीन प्रमुख राजनीतिक उद्देश्य दिखते हैं:

  1. रवि लामिछाने के लिए सार्वजनिक पद का रास्ता खोलना
    मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप रहने पर निर्वाचित होने के बाद भी उन्हें निलम्बित रहना पड़ता। अब यह बाधा हट गई है।
  2. पीड़ितों से मिलापत्र (Settlement) का मार्ग प्रशस्त करना
    मनी लॉन्ड्रिंग और संगठित अपराध के मामलों में मिलापत्र संभव नहीं होता। आरोप हटते ही सहकारी ठगी को “समझौते योग्य” बनाया गया।
  3. राजनीतिक असहजता से बचाव
    कांग्रेस के विशेष महाधिवेशन और अन्य राजनीतिक हलचलों के बीच यह फैसला अपेक्षाकृत कम चर्चा में पारित हो गया।

सुशीला कार्की सरकार की भूमिका पर सवाल

प्रधानमंत्री सुशीला कार्की, जो स्वयं पूर्व प्रधानन्यायाधीश रह चुकी हैं, के नेतृत्व में लिया गया यह फैसला इसलिए ज्यादा संवेदनशील है क्योंकि उनसे विधि के शासन (Rule of Law) की अपेक्षा अधिक थी।

यह भी पढें   जो बदल सकता है वही बदलाव भी ला सकता है – विश्वप्रकाश शर्मा

वरिष्ठ अधिवक्ताओं का मानना है कि:

  • इतना बड़ा निर्णय प्रधानमंत्री की जानकारी या सहमति के बिना संभव नहीं
  • इससे यह संदेश जाता है कि सरकार अपने “अनुकूल” लोगों के लिए कानून को लचीला बना सकती है

यह न केवल न्यायिक स्वतंत्रता पर आघात है, बल्कि सरकारी वकील संस्थाओं की स्वायत्तता को भी कमजोर करता है।

FATF ग्रे-लिस्ट और राष्ट्रीय हित

नेपाल पहले से ही FATF की ग्रे-लिस्ट में है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेपाल से यह अपेक्षा की गई है कि:

  • आर्थिक अपराधों,
  • विशेषकर सहकारी ठगी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में
    सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई हो।

ऐसे समय में एक हाई-प्रोफाइल राजनीतिक व्यक्ति को मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप से राहत देना:

  • नेपाल को ब्लैक-लिस्ट की ओर धकेल सकता है
  • विदेशी निवेश, बैंकिंग प्रणाली और अंतरराष्ट्रीय विश्वास पर नकारात्मक असर डाल सकता है
यह भी पढें   नेपाल में बढ रहे धर्मातरण चिंता का बिषय : भंडारी

पूर्व सचिव और AML विशेषज्ञों के अनुसार, आगामी FATF प्लेनरी में नेपाल के लिए इस फैसले का बचाव करना कठिन होगा।

निष्कर्ष: कानून से ऊपर कौन?

यह मामला रवि लामिछाने के दोषी या निर्दोष होने से अधिक राज्य के आचरण का है।
यदि:

  • एक ही प्रकृति के अपराध में
  • कुछ को कठोर दंड
  • और किसी एक को विशेष राहत मिले

तो यह न्याय नहीं, बल्कि चयनात्मक सत्ता-प्रयोग कहलाएगा।

सुशीला कार्की सरकार यदि सचमुच भ्रष्टाचार-विरोधी और “रोल मॉडल” बनना चाहती है, तो उसे यह स्पष्ट करना होगा कि:

  • क्या कानून सबके लिए बराबर है?
  • या फिर राजनीतिक हैसियत के आधार पर बदलता है?

फिलहाल, यह निर्णय देशहित से अधिक राजनीतिक सुविधा के पक्ष में जाता हुआ दिखाई देता है—और यही सबसे बड़ा खतरा है।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *