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अहंकार का अवसान… सत्ता में नया चेहरा : कंचना झा

 

कंचना झा, 7 मार्च, 026 फरवरी । फागुन २१ गते का दिन नेपाल के लोकतांत्रिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक दिन के रूप में दर्ज हो गया। चुनाव से पहले पूरे देश में एक तरह की आशंका और अनिश्चितता का माहौल था। लोगों के मन में यह सवाल बार–बार उठ रहा था कि आखिर यह चुनाव होगा भी या नहीं। अंतरिम सरकार की प्रधानमंत्री अपने वादे पर खड़ी उतर पाएंगी या नहीं, इसे लेकर भी संदेह था।
इसी बीच तरह–तरह की अफवाहें और भ्रम भी फैलाए गए। कई राजनीतिक मंचों से यहाँ तक कहा गया कि किसी भी हालत में यह चुनाव संभव नहीं है। कुछ मंत्रियों ने अपने भाषणों में चुनौती भरे अंदाज में यह सवाल भी उठाया कि जब चुनाव का माहौल ही नहीं बना है तो फागुन २१ गते को मतदान कैसे होगा ?
लेकिन प्रधानमंत्री सुशीला कार्की इन तमाम आशंकाओं और दबावों के सामने टस से मस नहीं हुईं। उन्होंने अपने निर्णय पर दृढ़ रहते हुए चुनाव की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और आखिरकार फागुन २१ गते को प्रतिनिधि सभा सदस्य के चुनाव सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए।
इस बार मतदान प्रतिशत बहुत अधिक नहीं रहा। इसका कारण भी स्पष्ट है। नेपाल में अभी ऐसी व्यवस्था नहीं है कि मतदाता जहाँ चाहें वहीं से मतदान कर सकें। बड़ी संख्या में लोग अपने गृह जिलों तक नहीं पहुँच सके, जहाँ मतदाता के रूप में उनका नाम है । यही कारण है कि मतदान लगभग ६० प्रतिशत के आसपास ही रह गया । फिर भी इस ६० प्रतिशत मतदाताओं ने इतिहास रच दिया।
जिन चेहरों को पुराने राजनीतिक दल हल्के में ले रहे थे, वही इस चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरे। विशेष रूप से बालेन और रवि लामिछाने को जिस तरह से परंपरागत नेताओं ने नजरअंदाज किया, वह अब उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल साबित होती दिख रही है।
यह आलेख लिखे जाने तक झापा का अंतिम परिणाम नहीं आया था, लेकिन रुझानों के अनुसार बालेन भारी मतों से आगे चल रहे थे और उनकी जीत लगभग सुनिश्चित मानी जा रही थी ।
अब तक के रुझानों को देखें तो राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) पहली पार्टी के रूप में उभरती दिखाई दे रही है । प्रत्यक्ष चुनाव की कुल १६५ सीटों में से ११७ सीटों की मतगणना के रुझानों में लगभग ९६ सीटों पर रास्वपा आगे चल रही है और २१ सीटों पर वह जीत भी दर्ज कर चुकी है ।
इसी तरह नेपाली कांग्रेस अब तक पाँच सीटें जीत चुकी है और लगभग दस सीटों पर आगे चल रही है । सबसे खराब स्थिति नेकपा एमाले की दिखाई दे रही है ।
हालाँकि चुनाव से पहले एमाले को कई बार चेतावनी दी गई थी कि उसे अपनी नीतियों, अपने दंभ, अपने घमंड और अपनी राजनीतिक भाषा में सुधार करना चाहिए । बार–बार कहा गया कि सत्ता का अहंकार स्थायी नहीं होता। लेकिन ओली और उनके कुछ करीबी नेताओं ने इन चेतावनियों को कभी गंभीरता से नहीं लिया । और आज परिणाम सामने है । जनता ने इस अहंकार को अस्वीकार कर दिया है ।
एक सभा में रवि लामिछाने ने नागरिकों से कहा था —
अगर आपको अब भी लगता है कि पुराने नेता ही देश को समृद्धि के रास्ते पर ले जा सकते हैं, तो इस बार भी आप उन्हें ही चुनिए। हमें वोट मत दीजिए। लेकिन यदि आप बदलाव चाहते हैं, तो हमें पाँच साल दीजिए। हम काम करके दिखाएँगे। और यदि हम असफल रहे, तो हम भी उन्हीं नेताओं की तस्वीर लगाकर उनका ही झंडा उठाएँगे ।
जनता ने इस चुनौती को स्वीकार किया और बदलाव के पक्ष में मतदान किया । दरअसल जनता लंबे समय से ओली, देउवा, महन्थ और अन्य पुराने नेताओं से ऊब चुकी थी। नागरिकों के मन में एक तरह की वितृष्णा पैदा हो चुकी थी। लोगों ने मन ही मन यह तय कर लिया था कि इस बार पुराने चेहरों को नहीं दोहराया जाएगा।
देउवा ने तो पहले ही स्वयं को पीछे कर लिया था, लेकिन ओली हमेशा की तरह आत्मविश्वास से भरे रहे । उन्होंने अपने आपको प्रधानमंत्री पद का प्रमुख दावेदार बनाकर प्रस्तुत किया । यहाँ तक कि अपनी पार्टी के विधान में भी बदलाव करवाया ताकि एक बार फिर प्रधानमंत्री बनने का रास्ता खुला रहे।

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लेकिन जनता ने जो राजनीतिक सबक उन्हें दिया है, उसे वे लंबे समय तक याद रखेंगे। लोकतंत्र में अहंकार और तानाशाही का अंत इसी तरह होता है। जनता जब किसी नेता को सिर पर बैठाती है तो उसे आसमान तक पहुँचा देती है, और जब उसे उतारने का फैसला करती है तो फिर संभलने का अवसर भी नहीं देती । इस चुनाव ने यदि और कुछ नहीं किया, तो कम से कम राजनीतिक अहंकार के अंत का संकेत जरूर दे दिया है ।
एक ऐसा नेता, जिसने जनता को मानो खिलौना समझ लिया था और स्वयं को मदारी बनाकर पूरे राजनीतिक तंत्र को अपनी उँगलियों पर नचाने की कोशिश कर रहा था—उस दंभ का इस चुनाव में अंत होता दिखाई दे रहा है।
हालाँकि यह परिणाम अचानक नहीं आया है । यह लंबे समय से बन रही जनभावना का परिणाम है। लोगों को पहले से ही अंदेशा था कि इस बार चुनाव के नतीजे अलग होंगे । लेकिन इस तरह से एमाले का लगभग पूरा राजनीतिक समीकरण बिखर जाएगा, इसकी शायद ही किसी ने कल्पना की थी।
भाद्र २३ और २४ की घटनाओं के दौरान जिस तरह से सत्ता पक्ष ने आम नागरिकों की पीड़ा की अनदेखी की और अपने अहंकार को प्राथमिकता दी, वह भी इस परिणाम का एक बड़ा कारण माना जा सकता है। आंदोलन में जिन युवाओं ने अपनी जान गंवाई, उनके प्रति संवेदना के दो शब्द भी सत्ता की ओर से नहीं आए । आज जो परिणाम सामने है, वह उसी गैर–जिम्मेदार राजनीति का परिणाम भी है।
जेन–जी आंदोलन के बाद जब अंतरिम सरकार बनी और सुशीला कार्की प्रधानमंत्री बनीं, तब लोगों के मन में आशंका थी कि क्या वे इस कठिन परिस्थिति को संभाल पाएँगी। लेकिन उन्होंने अपनी सूझ–बूझ, दूरदृष्टि और प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया।
उन्होंने चुनाव की तिथि तय की और तमाम राजनीतिक दबावों के बावजूद समय पर चुनाव करवाकर दिखाया । यह आसान काम नहीं था । कई मंत्री चुनाव लड़ने के लिए अपने पद छोड़कर चले गए । लेकिन प्रधानमंत्री कार्की ने किसी को रोका नहीं और सीमित संसाधनों के बावजूद पूरी प्रणाली को संभालते हुए चुनाव सम्पन्न करवाया । यह उनकी एक बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक जीत है । उन्होंने यह भी साबित किया कि अवसर मिलने पर महिलाएँ भी नेतृत्व की हर चुनौती को सफलतापूर्वक संभाल सकती हैं।

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इस बार के चुनाव में जो लहर दिखी, ये लहर रास्वापा की नहीं है । ये लहर बालेन की लोकप्रियता की है । जिसका सही इस्तमाल रवि लामिछाने ने किया है । सही समय, सही रणनीति और सही चेहरे का चयन—यही इस चुनाव की सबसे बड़ी राजनीतिक रणनीति साबित हुई । यहाँ रवि की दूरदर्शिता दिखती है कि रवि ने स्वयं को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाने के बजाय बालेन को आगे किया। उन्होंने जनता की मनोभावना को समझा और उसी के अनुसार राजनीतिक दांव चला । राजनीतिक की उनकी यह रणनीति काम कर गई । उनकी यह रणनीति सफल होती दिखाई दे रही है।
अब केवल यही उम्मीद की जा सकती है कि जिस विश्वास के साथ जनता ने उन्हें सत्ता की ओर बढ़ाया है, वह विश्वास कायम रहे। जनता केवल इतना चाहती है कि यह बदलाव वास्तविक हो, किसी अदृश्य शक्ति का खेल न हो । यदि यह परिवर्तन सचमुच जनता की आकांक्षाओं का परिणाम है, तो आने वाले वर्षों में नेपाल की राजनीति एक नए अध्याय में प्रवेश कर सकती है ।

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