परिवर्तन का आधार – मधेश : राघवेन्द्र साह
राघवेन्द्र साह, जनकपुरधाम, 12 मार्च 026 । नेपाल के आधुनिक राजनीतिक इतिहास को ध्यान से देखें तो एक तथ्य बार-बार सामने आता है—देश में हुए लगभग हर बड़े राजनीतिक परिवर्तन में मधेश की निर्णायक भूमिका रही है। चाहे वह 2007 साल का प्रजातांत्रिक आंदोलन हो, 2046 साल का जनआंदोलन हो, 2062–63 का जनआंदोलन हो या फिर संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र की स्थापना का आंदोलन—इन सभी ऐतिहासिक परिवर्तनों में मधेशी जनता की सक्रिय भागीदारी रही है। मधेश ने हमेशा परिवर्तन के पक्ष में खड़े होकर देश की राजनीतिक यात्रा को नई दिशा दी है।
लेकिन दुखद पक्ष यह है कि इन परिवर्तनों के बाद बनी सरकारों और राजनीतिक दलों पर बार-बार यह आरोप लगता रहा है कि उन्होंने मधेश और मधेशी जनता की अपेक्षाओं को नजरअंदाज किया है ।
नेपाल के राजनीतिक इतिहास में मधेश केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह परिवर्तन का एक शक्तिशाली आधार भी है। विडंबना यह है कि राजनीतिक परिवर्तन के बाद सत्ता में पहुँची शक्तियों ने मधेश की समस्याओं, अधिकारों और पहचान के मुद्दों को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दी। यही कारण है कि मधेशी जनता के मन में बार-बार उपेक्षा और धोखे का एहसास बढ़ता गया है।
नेपाल के राजनीतिक आंदोलनों में मधेश का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। 2007 साल के आंदोलन में मधेश के कई नेताओं ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। इसके बाद 2046 साल के जनआंदोलन में भी मधेश के नागरिकों ने प्रजातंत्र की पुनःस्थापना के लिए बड़ी संख्या में भाग लिया।
2062–63 के जनआंदोलन के बाद नेपाल में संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र की स्थापना हुई। लेकिन इसके बाद भी मधेशी जनता के अधिकार और प्रतिनिधित्व का प्रश्न पूरी तरह से हल नहीं हो सका। इसी पृष्ठभूमि में 2063–64 के आसपास मधेश में एक शक्तिशाली मधेश आंदोलन हुआ, जिसने संघीयता, समावेशिता और समान प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया।
मधेश आंदोलन को नेपाल को संघीय संरचना की दिशा में ले जाने वाला एक महत्वपूर्ण आंदोलन माना जाता है। इस दृष्टि से मधेश केवल आंदोलनों का सहभागी ही नहीं, बल्कि राजनीतिक परिवर्तन का प्रेरक भी रहा है।
नेपाल के बड़े राजनीतिक दल चुनाव के समय मधेशी जनता से वोट मांगते हुए अनेक आश्वासन देते रहे हैं। समान अधिकार, विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिकता समस्या का समाधान और राज्य की संरचनाओं में उचित प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर बार-बार प्रतिबद्धताएँ व्यक्त की जाती हैं।
लेकिन चुनाव के बाद इन प्रतिबद्धताओं का व्यवहारिक रूप में पूरा न होना मधेश में एक व्यापक शिकायत के रूप में सामने आता है।
मधेशी जनता ने अतीत में विभिन्न राजनीतिक दलों को अवसर दिया है। लेकिन सत्ता में पहुँचने के बाद कई दलों पर यह आरोप लगता रहा है कि वे मधेश के मुद्दों को भूल जाते हैं। यही कारण है कि मधेश में नई राजनीतिक शक्तियों के प्रति आकर्षण बढ़ता हुआ दिखाई देता है।
हाल ही में सम्पन्न प्रतिनिधि सभा चुनाव में मधेश प्रदेश के मतदाताओं ने एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी को उल्लेखनीय समर्थन दिया है। चुनाव परिणामों से यह स्पष्ट हुआ कि पार्टी को सबसे अधिक मत मधेश प्रदेश से ही प्राप्त हुए।
प्रदेशवार मत विवरण के अनुसार राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी को मधेश प्रदेश से 12,62,656 मत प्राप्त हुए, जो देश के सभी प्रदेशों में सबसे अधिक है। दूसरे स्थान पर बागमती प्रदेश है, जहाँ पार्टी को 11,19,270 मत मिले। इसी प्रकार लुम्बिनी प्रदेश से 9,33,352, कोशी प्रदेश से 8,53,183, गण्डकी प्रदेश से 5,25,635, सुदूरपश्चिम प्रदेश से 3,17,836 और कर्णाली प्रदेश से 1,32,749 मत प्राप्त हुए।
ये आँकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि मधेश प्रदेश के मतदाताओं ने परिवर्तन की उम्मीद के साथ नई राजनीतिक शक्ति को अवसर दिया है।
मधेशी जनता की मुख्य अपेक्षाएँ बहुत जटिल नहीं हैं। वे समान अधिकार, सम्मान, अवसर और विकास चाहते हैं।
मुख्य अपेक्षाएँ इस प्रकार हैं—
1. राजनीतिक प्रतिनिधित्व – राज्य की सभी संरचनाओं में समान और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व
2. नागरिकता समस्या का समाधान
3. पूर्वाधार विकास – सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग का विस्तार
4. रोजगार के अवसर
5. सांस्कृतिक और भाषाई पहचान का सम्मान
ये सभी मुद्दे मधेश आंदोलन के समय से ही उठते रहे हैं, लेकिन अभी तक इनका पूर्ण समाधान नहीं हो सका है।
मधेश नेपाल का सबसे उपजाऊ क्षेत्र माना जाता है। यहाँ की कृषि उत्पादन देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। इसके बावजूद विकास के मामले में मधेश अपेक्षाकृत पीछे दिखाई देता है।
सड़क, उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे क्षेत्रों में अभी भी व्यापक सुधार की आवश्यकता है। यदि मधेश के विकास को प्राथमिकता दी जाए तो यह पूरे देश की आर्थिक उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
पिछले कुछ वर्षों में मधेशी जनता की राजनीतिक चेतना में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। अब मतदाता केवल जातीय या पारंपरिक आधार पर मतदान करने की प्रवृत्ति से धीरे-धीरे बाहर निकल रहे हैं। वे विकास, सुशासन और पारदर्शिता जैसे मुद्दों को भी महत्व देने लगे हैं।
इसी कारण नई राजनीतिक शक्तियों को अवसर देने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। हालिया चुनाव परिणाम यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि मधेश के मतदाता परिवर्तन चाहते हैं।
अब मुख्य प्रश्न यह है कि राजनीतिक दल मधेश द्वारा दिए गए इस विश्वास को किस प्रकार संबोधित करते हैं। यदि मधेश के मुद्दों को फिर से नजरअंदाज किया गया तो भविष्य में मधेशी जनता के असंतोष के बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
राजनीतिक दलों को मधेश को केवल वोट बैंक के रूप में नहीं, बल्कि देश के विकास और स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखना चाहिए ।
नेपाल के राजनीतिक परिवर्तन का इतिहास मधेश के योगदान के बिना अधूरा है। मधेश ने हमेशा परिवर्तन के पक्ष में खड़े होकर देश को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
लेकिन यह भी एक चिंताजनक वास्तविकता है कि हर परिवर्तन के बाद मधेश के मुद्दों को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिली।
हालिया चुनाव परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मधेशी जनता परिवर्तन की आकांक्षा रखती है और उनकी राजनीतिक चेतना पहले से अधिक मजबूत हो चुकी है। नई राजनीतिक शक्तियों को दिया गया समर्थन इसी आशा और विश्वास का प्रतीक है।
अब राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे मधेश द्वारा दिए गए इस विश्वास का सम्मान करें और मधेश की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए ठोस कदम उठाएँ।
यदि इस बार भी मधेश की अपेक्षाएँ पूरी नहीं हुईं, तो भविष्य में मधेशी जनता की राजनीतिक दिशा और भी अलग रूप ले सकती है।
देश की समृद्धि और स्थिरता के लिए मधेश का सम्मान, विकास और समान सहभागिता अनिवार्य है। मधेश को न्याय मिलने पर ही नेपाल वास्तव में एक समावेशी, लोकतांत्रिक और समृद्ध राष्ट्र बन सकता है।


