भदौ गोलीकांड पर बड़ा खुलासा: आयोग ने केपी शर्मा ओली सहित कई शीर्ष अधिकारियों पर कार्रवाई की सिफारिश की
सरकार और सुरक्षा नेतृत्व पर गंभीर सवाल
काठमांडू, 26 मार्च । नेपाल में 23 और 24 भदौ को हुए हिंसक घटनाक्रम और गोलीकांड की जांच के लिए गठित आयोग ने अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री , तत्कालीन गृहमंत्री और नेपाल प्रहरी के तत्कालीन महानिरीक्षक के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है।
आयोग के अनुसार, 23 भदौ को कर्फ्यू लागू होने से पहले ही लगभग चार घंटे तक पुलिस की गोलीबारी जारी रही और इस दौरान लगातार हताहत बढ़ते रहे। इसके बावजूद राजनीतिक और सुरक्षा नेतृत्व की ओर से गोलीबारी रोकने या स्थिति को शांत करने के लिए आवश्यक पहल नहीं की गई।
लापरवाही और हेलचक्य्राइँ का आरोप
जांच आयोग ने निष्कर्ष निकाला है कि हालात की वास्तविक जानकारी मिलते रहने के बावजूद शीर्ष नेतृत्व ने गोलीबारी रोकने या संवाद की पहल करने की कोशिश नहीं की।
इसी आधार पर आयोग ने मुलुकी फौजदारी संहिता की धारा 181 और 182 के तहत कार्रवाई की सिफारिश की है।
- धारा 181: लापरवाही से किसी की मौत का कारण बनने पर
- 3 से 10 वर्ष तक की कैद
- 30 हजार से 1 लाख रुपये तक जुर्माना
- धारा 182: हेलचक्य्राइँ या गैरजिम्मेदाराना कार्य से मौत होने पर
- 3 वर्ष तक कैद
- 30 हजार रुपये तक जुर्माना
कई वरिष्ठ अधिकारियों पर भी कार्रवाई की सिफारिश
रिपोर्ट में केवल राजनीतिक नेतृत्व ही नहीं, बल्कि कई वरिष्ठ प्रशासनिक और सुरक्षा अधिकारियों पर भी कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
इनमें शामिल हैं:
- तत्कालीन गृह सचिव गोकर्णमणि दुवाडी
- सशस्त्र प्रहरी महानिरीक्षक राजु अर्याल
- राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग के प्रमुख हुतराज थापा
- काठमांडू के तत्कालीन सीडीओ छविलाल रिजाल
इनके खिलाफ भी हेलचक्य्राइँ के आरोप में कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
पुलिस और सुरक्षा बल के कई अधिकारी भी घेरे में
आयोग ने नेपाल प्रहरी और सशस्त्र प्रहरी के कई वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की है।
नेपाल प्रहरी के जिन अधिकारियों पर कार्रवाई की सिफारिश की गई है, उनमें शामिल हैं:
- एआईजी सिद्धिविक्रम शाह
- डीआईजी ओमबहादुर राना
- डीआईजी विश्व अधिकारी
- एसएसपी दीपशमशेर जबरा
- एसपी ऋषिराम कँडेल
सशस्त्र प्रहरी की ओर से भी तीन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की भूमिका पर भी सवाल
रिपोर्ट में कहा गया है कि 23 भदौ की शाम तक 19 प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी थी। इसके बावजूद अगले दिन उत्पन्न हो सकने वाले गंभीर सुरक्षा खतरे का सही मूल्यांकन नहीं किया गया।
आयोग के अनुसार, प्रधानमंत्री के नेतृत्व में चलने वाली राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने भी कोई ठोस निर्णय नहीं लिया।
यहां तक कि सेना को परिचालन में लाने या आपातकाल लगाने जैसे विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार नहीं किया गया।
सरकार की नीतियों पर भी उठे सवाल
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सरकार ने सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने से पहले उसके संभावित प्रभावों का कोई अध्ययन नहीं किया था।
इसके अलावा, पहले हुए सुरक्षा घटनाओं की जांच भी ठीक से नहीं कराई गई, जिसके कारण प्रशासनिक कमजोरी लगातार बनी रही।
महत्वपूर्ण सरकारी भवनों में आगजनी की साजिश
आयोग की जांच में यह भी सामने आया है कि कई सरकारी भवनों में आग लगाने के लिए ज्वलनशील पदार्थों का इस्तेमाल किया गया था।
जिन प्रमुख भवनों को निशाना बनाया गया, उनमें शामिल हैं:
- सिंहदरबार
- संसद भवन
- सर्वोच्च अदालत
- राष्ट्रपति भवन
जांच के दौरान मिले नमूनों की भारत में जांच कराई गई, जिसमें पेट्रोलियम पदार्थों के अवशेष मिलने की पुष्टि हुई।
रिपोर्ट सार्वजनिक करने का फैसला
इस पूरे घटनाक्रम के बाद वर्तमान प्रधानमंत्री ने आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का निर्णय लिया है।
प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, रिपोर्ट को संघीय संसद सचिवालय के पुस्तकालय में सुरक्षित रखकर आधिकारिक रूप से सार्वजनिक किया जाएगा।
आगे की जांच की जरूरत
आयोग का मानना है कि 24 भदौ को देशभर में हुई घटनाएं बहुत व्यापक थीं और सीमित समय में सभी तथ्यों की पूरी जांच संभव नहीं हो सकी।
इसलिए आयोग ने सरकार से मांग की है कि विशेषज्ञों की टीम बनाकर आगे की विस्तृत जांच कराई जाए, ताकि वास्तविक दोषियों तक पहुंचा जा सके।

