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जयप्रकाश आनंद द्वारा सभामुख की कुर्सी बदलने के निर्णय पर तीखा प्रहार

 

हिमालिनी डेस्क, 6 अप्रैल 026। जयप्रकाश आनंद द्वारा लिखित  लेख का विश्लेषण और हिंदी रूपांतरण नीचे दिया गया है। यह लेख मुख्य रूप से संस्थागत गरिमा बनाम व्यक्तिगत दिखावे के बीच के संघर्ष को दर्शाता है।
विश्लेषण: परंपरा और प्रतीकवाद का क्षरण
जयप्रकाश आनंद का यह लेख नेपाल की संसदीय व्यवस्था में हाल ही में हुए परिवर्तनों, विशेषकर सभामुख (अध्यक्ष) की कुर्सी बदलने के निर्णय पर एक तीखा प्रहार है। उनके विश्लेषण के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
* संस्था बनाम व्यक्ति: लेखक का तर्क है कि संसद जैसी संस्थाएँ सदियों के इतिहास और परंपराओं से बनती हैं। जब कोई पदाधिकारी अपनी व्यक्तिगत पसंद के आधार पर प्रतीकों (जैसे कुर्सी या बैठने का स्थान) को बदलता है, तो वह संस्था की निरंतरता को कमजोर करता है।
* लोकतंत्र और निरंतरता: लेख में ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण दिया गया है, जहाँ आज भी सदियों पुरानी परंपराओं का पालन किया जाता है। लेखक का मानना है कि ‘नयापन’ दिखाने की होड़ में हम अपनी ‘जड़ें’ खो रहे हैं।
* सस्ती लोकप्रियता: लेख यह सवाल उठाता है कि क्या सुधार केवल भौतिक वस्तुओं (कुर्सी, फर्नीचर) को बदलने से आता है? लेखक इसे ‘सस्ती लोकप्रियता’ की संज्ञा देते हैं।

लेख: कुर्सी की ‘क्रांति’ और परंपरा की पराजय
— जयप्रकाश आनंद

अध्यक्ष महोदय, किसी समय मैं भी कई बार सांसद रहा हूँ। इसीलिए आज यह लिख रहा हूँ— “नौटंकी के दूसरे चरण में अब उच्च मंच पर अध्यक्ष क्यों बैठें ? वे भी सांसदों के साथ गैलरी में ही बैठें। तीसरे चरण में ‘सम्माननीय’ संबोधन की जगह ‘माननीय’ ही कहे जाने का आदेश (रूलिंग) जारी हो। एक दिन ऐसा भी देखना पड़े कि जनता के अध्यक्ष ‘इंटर-पार्लियामेंट्री’ बैठक में ‘कछाड़’ (धोती) पहनकर ही शामिल हों।”
नेपाल की संघीय संसद कोई नई जन्मी संस्था नहीं है। यह हमारे राजनीतिक इतिहास की एक निरंतरता है—पंचायती व्यवस्था से बहुदलीय लोकतंत्र, और वहाँ से गणतंत्र तक पहुँचते हुए विकसित हुई एक संस्थागत यात्रा। ऐसी संस्था में मौजूद हर अभ्यास, हर ढाँचा और हर प्रतीक केवल सजावट की वस्तु नहीं होते; वे इतिहास की परतों से निर्मित हमारी संस्थागत स्मृतियाँ हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि हमारे यहाँ उन स्मृतियों को सहेजने के बजाय उन्हें मिटाने की प्रवृत्ति प्रबल होती जा रही है। हाल ही में अध्यक्ष द्वारा अपने आसन (कुर्सी) को बदलने का निर्णय इसी का एक ज्वलंत उदाहरण है।
विश्व की परिपक्व संसदों की ओर देखें, तो वहाँ ऐसे विषय व्यक्तिगत रुचि या सौंदर्यबोध के आधार पर तय नहीं होते। ब्रिटेन की संसद में ‘स्पीकर’ का प्रवेश एक औपचारिक जुलूस के रूप में होता है, जिसमें मर्यादा रक्षक राजकीय प्रतीक (Mace) लेकर आगे चलते हैं। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि सदियों से विकसित वैधानिक अधिकार की अभिव्यक्ति है। वहाँ स्पीकर की कुर्सी, बैठने का ढंग और प्रवेश की शैली—सब कुछ इतिहास द्वारा तय है। कोई भी नया स्पीकर अपनी व्यक्तिगत इच्छा से इन चीजों को बदलने की कल्पना भी नहीं कर सकता, क्योंकि वहाँ यह स्पष्ट समझ है कि संस्था की गरिमा व्यक्ति से ऊपर होती है।
यही परंपरा कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में भी वैसी ही बनी हुई है। वहाँ परिवर्तन के नाम पर परंपरा नहीं तोड़ी जाती; बल्कि परंपरा को बचाकर ही संस्था को मजबूत बनाया जाता है। उन्होंने यह समझ लिया है कि निरंतरता ही संस्था की वास्तविक शक्ति है।
नेपाल के इतिहास में भी ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। पंचायती व्यवस्था में भी ‘राजदंड’ का प्रयोग होता था। २०४८ (वि.सं.) के बाद जब बहुदलीय व्यवस्था आई, तब भी कई औपचारिक अभ्यास पुराने अनुभवों की निरंतरता में ही थे। राजनीतिक प्रणाली बदली, लेकिन संस्थागत अभ्यासों को शून्य से शुरू नहीं किया गया।
इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण संविधान सभा के समय दिखता है। संविधान निर्माण के दौरान इस्तेमाल की गई अध्यक्ष की कुर्सी, गणतंत्र आने के बाद भी प्रयोग में रही। यह दर्शाता है कि उस समय के नेतृत्व ने संस्थागत स्थायित्व के महत्व को समझा था।
लेकिन आज, अध्यक्ष द्वारा कुर्सी बदलने का निर्णय बिल्कुल अलग संदेश देता है। यह न तो किसी गंभीर सुधार का हिस्सा लगता है, न ही कार्यक्षमता बढ़ाने का प्रयास। यह तो बस “मैं दूसरों से अलग हूँ” दिखाने वाली सस्ती लोकप्रियता की प्रवृत्ति लगती है। प्रश्न यह है—क्या संसद की गरिमा एक कुर्सी बदलने से बढ़ती है? क्या संस्था की विश्वसनीयता केवल डिजाइन बदलने से जुड़ी है? या यह सिर्फ दिखावे की सक्रियता है?
व्यंग्य यही है—जहाँ दुनिया की संसदें सदियों पुरानी संरचनाओं को सहेजकर खुद को मजबूत बनाती हैं, वहीं हम नई कुर्सी लाकर समझते हैं कि सुधार हो गया। जहाँ निरंतरता बचाना परिपक्वता है, वहाँ हम उसे “पुराना” कहकर हटा देते हैं।
यह केवल एक कुर्सी का मामला नहीं है; यह सोच और संस्कार का प्रश्न है। यदि हर नया पदाधिकारी अपने साथ प्रतीकों और अभ्यासों को बदलने लगेगा, तो कोई भी संस्था कभी परिपक्व नहीं हो पाएगी। वह अपना इतिहास और पहचान खो देगी।
अंततः, हमें खुद से पूछना चाहिए—हम संस्था का निर्माण कर रहे हैं या किसी व्यक्ति की पसंद के हिसाब से चलने वाला एक अस्थायी ढाँचा ? यदि वास्तव में संस्था बनानी है, तो कुर्सी नहीं, अपनी सोच बदलनी होगी। अन्यथा, आने वाली पीढ़ियाँ संसद को एक स्थायी संस्था नहीं, बल्कि एक ऐसा स्थान मानेंगी जो हर नए अध्यक्ष के निजी स्वाद के अनुसार बदल जाता है।

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