बेबस जिंदगी : विनोदकुमार विमल
बेबस जिंदगी
कोमल हाथों में हथौड़ा, पीठ पर है एक बच्चा
एक औरत सड़क पर, पत्थर तोड़ती हुई
अपनी बेबस जिंदगी जिए जाती है l
ढेरों पत्थर तोड़कर, अपनी रोजी – रोटी कमाती है
कंधे से कंधा मिलाकर, अपना योगदान दर्ज करवाती है
चूल्हा – चौका छोड़कर, नन्हें लाड़ले के आंसू पोंछ्कर
पेट की भूख मिटाने की खातीर, अधजन्मे सपनों को ख्यालों का दुलारी देती है
बच्चा मुंह में अंगूठा डालकर, आसमां को निहारकर चुपचाप सो जाता है
मेहनतकश माँ के दुलार का, यूं ही आनंद पाता है
यह देखकर माँ खुश हो जाती है, फिर पत्थर तोड़ने लग जाती है l
आते- आते लोगों को देखकर, अपने अर्धनग्न तन को
मैले- कुचैले दुपट्टे से, सकुचाती हुई ढक लेती है
फिर पत्थर तोड़ने लग जाती है l
हे नारी ! तू महान् है, पत्थर तोड़ना भी तेरा काम है
सच कहूँ तो, हे कलियुग, सड़क निर्माण में ही नहीं
हर निर्माण में इस नारी का महान् योगदान है l
हे नारी ! अदम्य तेरा साहस है
तू हर इम्तिहान में पास है
तू ही एक सहारा है
पत्थर टूटते रहेंगे, सड़कें बनती रहेंगी
इसी तरह बेबस जिंदगियाँ
पत्थर तोड़ती रहेंगी, पत्थर तोड़ती रहेंगी l



