विदेशी राजदूतों से प्रधानमंत्री की सामूहिक बैठक—सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया, ज्यादा हाइलाइट करने की जरूरत नहीं
हिमालिनी डेस्क, काठमांडू, 8 अप्रैल 026 । प्रधानमंत्री बालेन शाह ने बुधवार को नेपाल में कार्यरत विदेशी राजदूतों के साथ सामूहिक मुलाकात की। में आयोजित इस बैठक में उन्होंने संक्षेप में सरकार की प्राथमिकताओं और नेपाल की विदेश नीति के बारे में जानकारी दी।
बैठक में नेपाल के परराष्ट्र मंत्री सहित अन्य वरिष्ठ सरकारी अधिकारी भी उपस्थित थे। प्रधानमंत्री ने राजदूतों को सरकार की नीतिगत दिशा, विकास प्राथमिकताओं और नेपाल की कूटनीतिक सोच के बारे में संक्षिप्त ब्रिफिंग दी।
हालाँकि कुछ लोगों ने इस बैठक को नया या बड़ा कदम बताया है, लेकिन कूटनीतिक दृष्टि से यह कोई बिल्कुल नई प्रक्रिया नहीं है। नेपाल में पहले भी प्रधानमंत्रियों द्वारा विदेशी राजदूतों के साथ सामूहिक बैठक करने के उदाहरण मिलते हैं। उदाहरण के तौर पर, ने भी वर्ष २०७४ (2017) में इसी तरह की सामूहिक बैठक आयोजित की थी।
आमतौर पर नई सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री विभिन्न देशों के राजदूतों से एक-एक करके अलग-अलग मुलाकात करते हैं। हालांकि सामूहिक बैठक का तरीका भी कूटनीतिक रूप से व्यावहारिक माना जाता है, क्योंकि इससे समय की बचत होती है और सभी देशों के प्रतिनिधियों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित होता है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस बैठक को न तो अत्यधिक उत्सव की तरह प्रस्तुत करने की आवश्यकता है और न ही अनावश्यक आलोचना करने की। यह सरकार के नियमित कूटनीतिक कार्यों का हिस्सा है और अलग-अलग सरकारें अपने तरीके से इसे संचालित करती रही हैं।
प्रधानमंत्री बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार ने “व्यवस्थित और देशहित केंद्रित” विदेश नीति अपनाने की बात कही है, जिसे सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। हालांकि केवल एक बैठक से विदेश नीति की दिशा तय नहीं होती। नेपाल की भौगोलिक और कूटनीतिक स्थिति संवेदनशील मानी जाती है, जहाँ , और जैसे प्रमुख देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना आवश्यक है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इसके लिए निरंतर द्विपक्षीय संवाद, भरोसेमंद कूटनीति और व्यावहारिक नीति की जरूरत होती है। केवल औपचारिक बैठकों से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सरकार आर्थिक विकास, विदेशी निवेश, व्यापार विस्तार और आम जनता के हित से जुड़े ठोस परिणाम दे सके।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कूटनीति का उद्देश्य शांतिपूर्ण और व्यावहारिक सहयोग को बढ़ावा देना होना चाहिए, न कि केवल दिखावटी गतिविधियों के माध्यम से चर्चा में आना। इसलिए इस बैठक को सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया के रूप में देखना ही अधिक उचित माना जा रहा है।
नेपाल की राजनीति और सार्वजनिक विमर्श में अक्सर छोटे मुद्दों को अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति भी देखी जाती रही है। ऐसे में विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस तरह की बैठकों को संतुलित दृष्टि से देखा जाए और इसे अनावश्यक रूप से बड़ा मुद्दा बनाने से बचा जाए।


