मधेस का जनादेश और काठमांडू का विश्वासघात: क्या हम केवल ‘वोट बैंक’ हैं ?
“हमने तो दिल की धड़कनें गिनकर तुम्हें अपना मान लिया था, पर तुमने तो हमारी पहचान को ही आंकड़ों के जाल में कैद कर दिया।”
विजय यादव, 11 अप्रैल 026। नेपाल की राजनीति में मधेस हमेशा से एक ‘किंगमेकर’ की भूमिका में रहा है। जब-जब देश में परिवर्तन की लहर उठी, मधेस ने अपनी छाती पर गोलियां खाकर उस लहर को परवान चढ़ाया। चाहे वह २०६३ का मधेस आंदोलन हो या हालिया चुनावों में ‘वैकल्पिक शक्ति’ के प्रति उमड़ा जनसैलाब। लेकिन, भोला पासवान जी के हालिया शोधपरक लेख ने मधेस के हर जागरूक नागरिक की आंखों में आंसू और मन में आक्रोश भर दिया है। यह आक्रोश केवल सत्ता न मिलने का नहीं है, यह आक्रोश है उस ‘संरचनागत अन्याय’ (Structural Injustice) का, जिसने हमारे वोट की कीमत को काठमांडू के संभ्रांत वर्ग (Elite) के पैरों तले रौंद दिया है।

| क्षेत्र | प्राप्त मत (समानुपातिक) | सांसद संख्या | मन्त्री संख्या | १ सांसदका लागि चाहिने औसत मत |
| काठमाडौं जिल्ला | २,९६,००० (करिब) | १३ | ६ | २२,७६९ |
| मधेश प्रदेश | १३,००,४६८ | ७ | १ | १,८५,७८१ |
१. आंकड़ों की जुबानी, मधेस की बर्बादी
लोकतंत्र का सबसे बुनियादी मंत्र है— ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’। लेकिन नेपाल की वर्तमान निर्वाचन प्रणाली ने मधेस के साथ जो खेल खेला है, वह किसी क्रूर मजाक से कम नहीं है।
जरा इन आंकड़ों को गौर से देखिए और सोचिए कि क्या मधेस का नागरिक इस देश का बराबर का हिस्सेदार है? राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) को मधेस प्रदेश से १३ लाख ४६८ मत प्राप्त हुए। यह कोई छोटा आंकड़ा नहीं है, यह मधेस के अटूट विश्वास का प्रतीक था। लेकिन इस विशाल जनमत के बदले मधेस को क्या मिला? केवल ७ सांसद।
वहीं दूसरी ओर, काठमांडू जिले में केवल २ लाख ९६ हजार मतों पर रास्वपा ने १३ सांसद झटक लिए। गणित सीधा और डरावना है: काठमांडू में २२ हजार लोग मिलकर एक सांसद चुन लेते हैं, जबकि मधेस में १ लाख ८५ हजार नागरिकों को अपनी पूरी ताकत लगानी पड़ती है तब जाकर एक सांसद का चेहरा देखने को मिलता है। क्या मधेसी नागरिक के वोट की कीमत काठमांडू के एक नागरिक के वोट से आठ गुना कम है? अगर नहीं, तो यह निर्वाचन प्रणाली मधेस के प्रतिनिधित्व का गला क्यों घोंट रही है?
२. बालेन और रवि: ‘नया नेपाल’ या ‘नया काठमांडू’?
मधेस के युवाओं ने बालेन शाह और रवि लामिछाने में एक उम्मीद देखी थी। उन्हें लगा था कि पुराने दलों के ‘सिंडिकेट’ को तोड़कर ये नए चेहरे देश के हर कोने को न्याय देंगे। बालेन शाह ने जब धनगढ़ी में देउडा शैली में कहा था— “सुदूर अब दूर नाई, झिक्कै झिक्कै माया तम्लाई”, तो केवल सुदूरपश्चिम ही नहीं, मधेस के गाँवों में भी तालियाँ बजी थीं। हमें लगा था कि अब सत्ता का केंद्र काठमांडू की गलियों से निकलकर जनकपुर के मैदानों और कर्णाली की पहाड़ियों तक पहुँचेगा।
लेकिन सत्ता के गलियारों में पहुँचते ही वही पुराना ‘रंग’ दिखने लगा। १५ सदस्यीय मंत्रिमंडल में बागमती (काठमांडू) से ६-६ मंत्री बना दिए गए, जबकि १३ लाख वोट देने वाले मधेस के हिस्से में केवल एक मंत्री (दीपक कुमार साह) आया। कर्णाली, जिसने १.३३ लाख वोट दिए, उसे तो मंत्रिमंडल में जगह देना तो दूर, एक समानुपातिक सांसद के लायक भी नहीं समझा गया।
यह ‘परिवर्तन’ नहीं, बल्कि ‘सत्ता का हस्तांतरण’ है— पुराने राजाओं से नए शहरी एलिट्स के हाथों में। बालेन और रवि जी, क्या आपका ‘सुशासन’ केवल बागमती की सीमा तक ही सीमित है? क्या मधेस की धूल भरी सड़कें और वहां के पसीने की खुशबू आपको सत्ता में पहुँचने के बाद बदबू देने लगी?
| प्रदेश | २०७४ (सीटें) | २०७९ (सीटें) | २०८२ (सीटें) | प्रवृत्ति (Trend) | टिप्पणी (Remarks) |
| बागमती | २० | २९ | ३७ | अस्वाभाविक वृद्धि | काठमांडू केंद्रित ‘एलीट’ वर्ग का सत्ता पर पूर्ण कब्जा; संसाधनों का केंद्रीकरण। |
| मधेश | २८ | २३ | १६ | भारी गिरावट | मधेस के विशाल जनमत और जनसंख्या की राजनीतिक शक्ति का व्यवस्थित विस्थापन। |
| लुम्बिनी | २० | १९ | १२ | बड़ी गिरावट | प्रतिनिधित्व में लगातार कमी, जिससे क्षेत्रीय मुद्दों की आवाज कमजोर हो रही है। |
| कर्णाली | ५ | ९ | ४ | सीमान्तकरण | सबसे दुर्गम क्षेत्र का प्रतिनिधित्व न्यूनतम स्तर पर; राज्य की मुख्यधारा से अलगाव। |
- बागमती का दबदबा: बागमती प्रदेश की सीटों में २०७४ की तुलना में २०८२ तक लगभग ८५% की वृद्धि हुई है, जो काठमांडू-केंद्रित राजनीति के बढ़ते प्रभाव को दिखाता है।
- मधेश की घटती शक्ति: मधेश प्रदेश, जिसने कभी २८ सीटों के साथ निर्णायक भूमिका निभाई थी, अब घटकर मात्र १६ सीटों पर सिमट गया है। यह राज्य की मुख्यधारा से शक्ति के विस्थापन का संकेत है।
- दुर्गम की उपेक्षा: कर्णाली जैसे पिछड़े प्रदेश की सीटों में भारी कटौती यह दर्शाती है कि भूगोल और जनसंख्या के बीच का असंतुलन संघीयता के मूल मर्म पर प्रहार कर रहा है।
३. ‘काठमांडू एलिट’ का कब्जा और भूगोल की हार
नेपाल की संसद अब ‘जनता की प्रतिनिधि’ कम और ‘काठमांडू के अस्थायी जनसंख्या’ की बंधक ज्यादा लगती है। आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन चुनावों में बागमती प्रदेश की सीटें २९ से बढ़कर ३७ हो गईं, जबकि मधेस और लुम्बिनी जैसे क्षेत्रों की सीटों में भारी कटौती की गई।
यह एक सोची-समझी रणनीति लगती है, जिसके तहत मधेस और दुर्गम क्षेत्रों के राजनीतिक रसूख को खत्म किया जा रहा है। काठमांडू में रहने वाले प्रभुत्वशाली वर्ग ने निर्वाचन प्रणाली को इस तरह मोड़ दिया है कि वोट कहीं का भी हो, सांसद और मन्त्री काठमांडू के ही बनेंगे। कर्णाली के १० जिलों की कुल ताकत (१६ सांसद) से ज्यादा ताकत काठमांडू के एक अकेले जिले (२६ सांसद) के पास है। यह संघीयता का उपहास है। यह उस भूगोल का अपमान है जिसने इस देश की सीमाओं की रक्षा की है।
४. मधेशी नेताओं से एक तीखा सवाल
लेख का सबसे मर्मस्पर्शी हिस्सा वह है जहाँ मधेसी सांसदों और मंत्रियों से सवाल किया गया है। रास्वपा या अन्य दलों के मधेसी चेहरे आज सत्ता की मलाई में डूबे हैं या फिर अपनी कुर्सी बचाने की जद्दोजहद में ?
क्या आप बालेन और रवि के सामने यह सवाल उठाने की हिम्मत रखते हैं कि हमारे १३ लाख वोटों का अपमान क्यों किया गया? या फिर आप भी कांग्रेस और एमाले के उन कार्यकर्ताओं की तरह ‘दास और लाश’ बन चुके हैं, जिन्हें केवल हाईकमांड का आदेश बजाना आता है? याद रखिए, आप मधेस की मिट्टी की सौगंध खाकर वहां पहुँचे हैं। अगर आज आप खामोश रहे, तो इतिहास आपको कभी माफ नहीं करेगा। मधेस का युवा आज आपसे जवाब मांग रहा है।
५. श्रम संस्कृति पार्टी से सीख और भविष्य की राह
हैरानी की बात तो यह है कि जो काम रास्वपा जैसा विशाल दल नहीं कर सका, वह ‘श्रम संस्कृति पार्टी’ जैसी छोटी पार्टी ने कर दिखाया। उन्होंने मधेस और कर्णाली के ८-९ हजार वोटों का सम्मान करते हुए उन्हें प्रतिनिधित्व दिया। यह साबित करता है कि समावेशिता के लिए ‘संख्या’ की नहीं, ‘नियत’ की जरूरत होती है।
मधेस अब और इंतजार नहीं करेगा। अगर यह ‘ढाँचागत अन्याय‘ जारी रहा, अगर काठमांडू ने मधेस के भूगोल को ठगना बंद नहीं किया, तो मधेस अपनी ‘वैकल्पिक राह’ तलाशने के लिए मजबूर होगा। यह कोई चेतावनी नहीं, बल्कि एक हकीकत है। मधेस के नागरिक अब केवल ‘कमेंट बॉक्स’ में लिंक शेयर नहीं करेंगे, बल्कि सड़कों पर उतरकर अपने वोट का हिसाब मांगेंगे।
निष्कर्ष: न्याय की पुकार
बालेन सरकार के शुरुआती कदम भ्रष्टाचार के खिलाफ सराहनीय हो सकते हैं, लेकिन ‘सामाजिक न्याय’ के बिना सुशासन अधूरा है। जब तक मधेस, कर्णाली और सुदूरपश्चिम का नागरिक इस सरकार में अपना चेहरा नहीं देखेगा, तब तक यह ‘परिवर्तन’ अधूरा ही रहेगा।
काठमांडू की चमक-धमक मधेस के अंधेरे घरों की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। हमें बराबरी का हक चाहिए, खैरात नहीं। हमें प्रतिनिधित्व चाहिए, केवल आश्वासन नहीं। अगर २०९४ तक के ‘गणितीय कैद’ में मधेस को बांधकर रखने की कोशिश की गई, तो वह जंजीर टूटना निश्चित है।
अंतिम शब्द: बालेन और रवि जी, मधेस ने आपको सर आँखों पर बिठाया है। इसे अपनी ताकत मत समझिए, इसे अपनी जिम्मेदारी मानिए। कहीं ऐसा न हो कि मधेस का यह टूटा हुआ दिल कल आपकी सत्ता के पतन का कारण बन जाए। क्योंकि मधेस जब प्यार करता है तो सर्वस्व न्योछावर कर देता है, और जब ठगा हुआ महसूस करता है, तो तख्तो-ताज पलट देता है।

