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जेनजी द्वारा सरकार द्वारा आहूत संविधान संशोधन संबंधी चर्चा का बहिष्कार

 

१ जेठ, काठमाडौँ।

जेनजी आंदोलन के अगुवाओं ने सरकार द्वारा आहूत संविधान संशोधन संबंधी चर्चा का बहिष्कार किया है। उनका कहना है कि उनके साथ पहले हुए समझौतों को अब तक लागू नहीं किया गया है और सरकार एकतरफा तथा अपारदर्शी तरीके से आगे बढ़ रही है, इसलिए वे आज बुलाई गई बैठक में शामिल नहीं होंगे।

प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद कार्यालय के अंतर्गत संविधान संशोधन बहसपत्र तैयार करने के लिए गठित कार्यदल ने वैशाख ३० को पत्र भेजकर उन्हें संविधान संशोधन विषयक चर्चा में आमंत्रित किया था। लेकिन १ जेठ को जारी संयुक्त वक्तव्य में २५ आंदोलनकारी और अधिकारकर्मियों ने स्पष्ट किया कि वे इस चर्चा में भाग नहीं लेंगे।

चर्चा बहिष्कार के मुख्य कारण

आंदोलनकारियों ने सरकार की कार्यशैली पर गंभीर असंतोष जताते हुए कहा कि आंदोलन में शामिल होने के कारण आज भी सैकड़ों साथी झूठे मुकदमों का सामना कर रहे हैं, जबकि शहीद परिवार और घायल लोग न्याय की प्रतीक्षा में हैं।

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वक्तव्य में कहा गया है, “नेपाल सरकार के साथ २०८२ मंसिर २४ को हुआ १० बिंदुओं वाला समझौता अब तक लागू नहीं हुआ है। जेनजी आंदोलन की जांच के लिए गठित गौरीबहादुर कार्की आयोग की रिपोर्ट भी औपचारिक रूप से सार्वजनिक और लागू नहीं की गई है।”

उन्होंने आरोप लगाया कि समझौते की धारा ५ में संविधान संशोधन सुझाव आयोग गठन करने की व्यवस्था होने के बावजूद सरकार ने उसे नजरअंदाज करते हुए एकतरफा तरीके से बहसपत्र कार्यदल बना दिया।

उनका कहना है कि लिखित समझौते को लागू न करके केवल ३ मिनट सुझाव देने के लिए बुलाना महज औपचारिकता निभाना है।

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आंदोलनकारियों ने यह भी शिकायत की कि चर्चा में शामिल होने वालों के चयन की प्रक्रिया अपारदर्शी रही और आंदोलन में सक्रिय विभिन्न पृष्ठभूमि के साथियों को आमंत्रित नहीं किया गया।

जेनजी आंदोलन की सरकार से ६ प्रमुख मांगें

सरकार के कदम को “अपारदर्शी और गैर-जिम्मेदार” बताते हुए आंदोलनकारियों ने भविष्य में किसी भी चर्चा से पहले निम्नलिखित ६ मांगें पूरी करने की अपील की है—

  1. २०८२ मंसिर २४ को हुए जेनजी जनआंदोलन के समझौते को अक्षरशः लागू किया जाए।
  2. भदौ २३ और २४ के आंदोलन में गिरफ्तार लोगों को तुरंत रिहा किया जाए तथा झूठे मुकदमे वापस लिए जाएं।
  3. शहीद परिवारों और घायल साथियों को न्याय दिया जाए।
  4. वि.सं. २०८२ के जेनजी आंदोलन सहित पूर्व के विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों (२०४६, २०६२/६३, मधेश, थरुहट) से जुड़े जांच आयोगों की रिपोर्ट सार्वजनिक कर लागू की जाए।
  5. भूमिहीन सुकुम्बासी, दलित और अव्यवस्थित बसोवासियों पर राज्य द्वारा किए जा रहे दमन को तुरंत रोका जाए और न्यायसंगत व्यवस्था की जाए।
  6. समझौते की धारा ५ के अनुसार “संविधान संशोधन सुझाव आयोग” का गठन किया जाए तथा महिला, दलित, मधेशी, आदिवासी जनजाति सहित सभी हाशिए पर रहे समुदायों और सरोकारवालों से स्थानीय से लेकर संघीय स्तर तक व्यापक परामर्श के बाद ही संशोधन प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए।
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आंदोलनकारियों ने कहा है कि यदि उपर्युक्त परिस्थितियाँ बनाई जाती हैं, तो वे संविधान संशोधन संबंधी सुझाव देने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध रहेंगे। संयुक्त वक्तव्य पर अमृता वन, रक्षा बम, रुक्शना कपाली, विप्लवी न्यौपाने सहित २५ लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं।

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