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क्या काठमांडू एआई डेटा सेंटर का बोझ उठा पाएगा ? विकास या सिर्फ़ एक महंगी घोषणा ?

 

राकेश मिश्रा के सोशल मीडिया पोस्ट से साभार, काठमांडू,

नेपाल सरकार ने आगामी बजट में काठमांडू के स्युचाटार क्षेत्र में एक बड़े डेटा सेंटर और एआई कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण की घोषणा की है। पहली नज़र में यह योजना आधुनिक, तकनीक-आधारित और भविष्य की ओर बढ़ता कदम प्रतीत होती है। लेकिन जब इसके आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जाता है, तो कई ऐसे सवाल सामने आते हैं जिनका जवाब सरकार ने अभी तक स्पष्ट नहीं किया है।

सबसे बड़ा सवाल है—क्या काठमांडू के पास इतना पानी है ?

एआई आधारित डेटा सेंटर केवल कंप्यूटरों का समूह नहीं होते। हजारों उच्च क्षमता वाले प्रोसेसर लगातार चलते हैं, जिन्हें ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी और बिजली की आवश्यकता होती है। काठमांडू घाटी पहले से ही पेयजल संकट, भूजल के अत्यधिक दोहन और पर्यावरणीय दबाव का सामना कर रही है। ऐसे में एक विशाल डेटा सेंटर के लिए प्रतिदिन आवश्यक पानी कहाँ से आएगा? क्या इसके लिए कोई वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है? यदि किया गया है, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?

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दूसरा बड़ा प्रश्न रोजगार का है। सरकार इस परियोजना को आधुनिक विकास की मिसाल बता रही है, लेकिन दुनिया का अनुभव बताता है कि डेटा सेंटर अत्यधिक पूंजी निवेश वाले होते हैं, जबकि इनमें स्थायी रोजगार बहुत कम पैदा होता है। अरबों रुपये खर्च होने के बाद भी केवल सीमित संख्या में उच्च प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारियों की आवश्यकता पड़ती है। नेपाल जैसे देश, जहाँ हर वर्ष लाखों युवा रोजगार के लिए विदेश जाते हैं, वहाँ क्या इतनी बड़ी सार्वजनिक प्राथमिकता ऐसे क्षेत्र को दी जानी चाहिए जो रोजगार सृजन में बहुत सीमित योगदान देता है?

तीसरा सवाल आर्थिक व्यवहार्यता का है। नेपाल का डिजिटल बाज़ार अभी छोटा है। अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत, सिंगापुर, दुबई या अन्य स्थापित डेटा हब छोड़कर नेपाल क्यों आएँगी? नेपाल में अभी विश्वस्तरीय डिजिटल इकोसिस्टम, पर्याप्त फाइबर कनेक्टिविटी और बड़ी तकनीकी कार्यशक्ति का अभाव है। ऐसे में डेटा सेंटर बनाना और उसे व्यावसायिक रूप से सफल बनाना दो अलग-अलग बातें हैं।

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भौगोलिक दृष्टि से भी चिंता कम नहीं है। नेपाल भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील देश है। डेटा सेंटर जैसी संवेदनशील संरचनाओं के लिए अत्यधिक सुरक्षित स्थान और मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था आवश्यक होती है। वहीं स्युचाटार पहले से ही घनी आबादी, ट्रैफिक और शहरी दबाव वाला क्षेत्र है। ऐसे स्थान का चयन भी कई सवाल खड़े करता है।

आर्थिक विशेषज्ञ यह भी पूछ रहे हैं कि यदि यही बिजली और निवेश उत्पादन आधारित उद्योगों, कृषि प्रसंस्करण, सिंचाई, या निर्यातोन्मुख विनिर्माण क्षेत्र में लगाया जाए तो क्या उससे कहीं अधिक रोजगार और आर्थिक लाभ नहीं मिलेगा?

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तकनीकी प्रगति का विरोध नहीं किया जा सकता। नेपाल को भी डिजिटल अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ना ही होगा। लेकिन किसी भी बड़े प्रोजेक्ट की सफलता केवल उसके आकर्षक नाम से तय नहीं होती। उसके लिए बाज़ार, संसाधन, पर्यावरण, लागत और दीर्घकालिक लाभ का ठोस आकलन आवश्यक होता है।

इसलिए सरकार को चाहिए कि इस परियोजना की व्यवहार्यता रिपोर्ट, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, जल एवं ऊर्जा की आवश्यकता, निवेश की लागत और संभावित आर्थिक लाभ से जुड़ी सभी जानकारियाँ सार्वजनिक करे। अन्यथा यह आशंका बनी रहेगी कि कहीं यह परियोजना वास्तविक आर्थिक परिवर्तन से अधिक “डिजिटल विकास” के नाम पर एक महंगी और प्रचारमुखी घोषणा तो नहीं है।

राकेश मिश्रा

(यह लेख सामाजिक विश्लेषक राकेश मिश्रा द्वारा व्यक्त विचारों और सार्वजनिक बहस के आधार पर तैयार किया गया है।)

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