किसी ने न पायो थाह तुलसी के ताल की : अजयकुमार झा
जलेश्वर, 17 अगस्त। गोस्वामी तुलसीदास भारतीय साहित्य के उस विराट शिखर का नाम हैं, जिसकी ऊँचाई दिखाई देती है, पर गहराई का अनुमान लगाना कठिन है। उन्हें केवल भक्तिकाल का कवि कहना उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को सीमित कर देना है। तुलसी कवि भी हैं, भक्त भी, दार्शनिक भी, लोकद्रष्टा भी और सनातन सांस्कृतिक चेतना के अद्वितीय व्याख्याकार भी। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति रामचरितमानस पहली दृष्टि में रामकथा प्रतीत होती है, किंतु उसके भीतर उतरते ही भक्ति, दर्शन, नीति, समाज, संस्कृति, मनोविज्ञान और लोकजीवन की असंख्य धाराएँ दिखाई देने लगती हैं। इसीलिए तुलसी का काव्य किसी शांत ताल की तरह है—जिसकी सतह पर कथा की लहरें दिखाई देती हैं, किंतु जिसकी वास्तविक गहराई में उतरने का साहस करने पर अर्थ की नई-नई दुनिया खुलती जाती है। सच ही कहा जा सकता है—किसी ने न पायो थाह तुलसी के ताल की।
तुलसी की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि यह है कि उन्होंने रामकथा को शास्त्र की ऊँची चौखट से उतारकर लोकजीवन के आँगन में प्रतिष्ठित कर दिया। संस्कृत की परंपरा में प्रतिष्ठित रामकथा को उन्होंने लोकभाषा में इस प्रकार अभिव्यक्त किया कि वह विद्वानों के अध्ययन का विषय होने के साथ-साथ सामान्य जन की स्मृति, वाणी और आस्था का हिस्सा बन गई। रामचरितमानस की दोहा-चौपाई संरचना, सहज भाषा और संगीतात्मकता ने उसे घर-घर पहुँचाया। तुलसी की भाषा में संस्कृत की दार्शनिक गरिमा, अवधी की लोकधर्मी शक्ति और भारतीय लोकजीवन की आत्मीयता का अद्भुत समन्वय है। उनकी भाषा पढ़ी ही नहीं जाती—गाई जाती है, सुनी जाती है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्मृति में उतरती है। यही कारण है कि तुलसी केवल हिंदी के कवि नहीं रहे; वे भारतीय लोकमानस के कवि बन गए।
तुलसी के राम को केवल धार्मिक दृष्टि से देखना भी उनके काव्य की आधी व्याख्या है। उनके राम ईश्वर हैं, किंतु साथ ही पुत्र, पति, भाई, मित्र, राजा और लोकनायक भी हैं। वे शक्ति के शिखर पर होते हुए भी पिता की आज्ञा के सामने सहजता से वन चले जाते हैं; राजा होते हुए भी निषाद और केवट के प्रेम को स्वीकार करते हैं; ईश्वर होते हुए भी मनुष्य के दुःख में सहभागी दिखाई देते हैं। तुलसी के राम की सबसे बड़ी विशेषता उनकी दिव्यता और मानवीयता का समन्वय है। वे मंदिर की प्रतिमा भर नहीं, जीवन की मर्यादा हैं। सत्य, त्याग, संयम, करुणा, कर्तव्य और लोककल्याण उनके चरित्र के आधार हैं। इसीलिए तुलसी की रामभक्ति केवल पूजा की भावना नहीं, बल्कि आचरण का दर्शन है।
तुलसी के काव्य में भक्ति पलायन नहीं, जीवन का संस्कार है। वे मनुष्य को संसार छोड़ने की नहीं, संसार में रहते हुए अपने दायित्व को समझने की प्रेरणा देते हैं। उनके यहाँ पिता-पुत्र का संबंध है, भाई-भाई का प्रेम है, पति-पत्नी की मर्यादा है, मित्रता है, राजा-प्रजा का संबंध है और गुरु-शिष्य की परंपरा है। इस प्रकार तुलसी धर्म को केवल मंदिर और पूजा तक सीमित नहीं रखते; वे उसे मनुष्य के व्यवहार और संबंधों में उतार देते हैं। उनकी भक्ति का अंतिम लक्ष्य केवल ईश्वर की प्राप्ति नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर विनय, करुणा, संयम और सेवा की स्थापना भी है। यही कारण है कि तुलसी का भक्तिवाद सामाजिक और नैतिक चेतना का रूप ग्रहण कर लेता है।
तुलसी की काव्य-दृष्टि में लोकमंगल का विशेष महत्त्व है। उनके रामराज्य की कल्पना केवल किसी राजनीतिक शासन-व्यवस्था का आदर्श नहीं, बल्कि ऐसे समाज की सांस्कृतिक आकांक्षा है जिसमें न्याय, सुरक्षा, संतुलन, करुणा और पारस्परिक विश्वास हो। तुलसी के यहाँ मनुष्य अकेला नहीं है; वह परिवार, समाज और व्यापक लोक से जुड़ा हुआ है। यही वैश्विक भावना लोकमंगल की अवधारणा है। आज जब विकास को प्रायः आर्थिक समृद्धि और तकनीकी प्रगति से मापा जाता है, तुलसी हमें यह प्रश्न पूछने के लिए विवश करते हैं कि क्या मनुष्य भीतर से भी विकसित हुआ है? क्या उसके भीतर दया, संयम, सत्य और परोपकार बचा है? तुलसी का रामराज्य इसी आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार के विकास की कल्पना है।
तुलसी के पात्रों की शक्ति उनके आदर्श रूप में ही नहीं, उनकी मानवीय जटिलता में भी है। राम में मर्यादा और करुणा है, भरत में त्याग और भ्रातृप्रेम, लक्ष्मण में सेवा और आवेग, हनुमान में शक्ति और विनय तथा सीता में प्रेम, धैर्य और आत्मगौरव का अद्भुत समन्वय है। रावण का चरित्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वह अज्ञानी नहीं, अत्यंत विद्वान है; निर्बल नहीं, असाधारण शक्तिशाली है; लेकिन उसके ज्ञान और शक्ति पर अहंकार का आवरण चढ़ जाता है। इस प्रकार रावण केवल बाहरी खलनायक नहीं रह जाता, बल्कि मनुष्य के भीतर उपस्थित उस अहंकार का प्रतीक बन जाता है जो ज्ञान और सामर्थ्य को भी विनाश का कारण बना सकता है। तुलसी के पात्र इसी कारण आज भी जीवित लगते हैं।
तुलसी के काव्य का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनका सौंदर्यबोध है। उन्हें केवल धार्मिक कवि कहना उनके साहित्यिक वैभव को कम कर देना होगा। उनके यहाँ प्रकृति का सौंदर्य है, ऋतुओं की छटा है, वन और नदी हैं, प्रेम और विरह हैं, करुणा और वीरता हैं, हास्य और अद्भुतता हैं। दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त आदि छंदों का प्रभावी प्रयोग उनकी विलक्षण छंद-संवेदना का प्रमाण है। उनकी काव्यभाषा में उपमा, रूपक, अनुप्रास और अन्य अलंकार भावों को सजाने के लिए नहीं, उन्हें अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए आते हैं। तुलसी की कविता का सौंदर्य इसीलिए स्थायी है कि वह केवल शब्दों का सौंदर्य नहीं, अनुभूति का सौंदर्य है।
तुलसी का सामाजिक और स्त्री-विमर्श आज के समय में विशेष आलोचनात्मक पुनर्पाठ की माँग करता है। उनके साहित्य में सीता, कौशल्या, शबरी, तारा और मंदोदरी जैसे अनेक स्त्री-पात्र हैं, जिनमें त्याग, प्रेम, धैर्य, बुद्धि और आत्मगौरव के विविध रूप दिखाई देते हैं। दूसरी ओर तुलसी की कुछ पंक्तियाँ आधुनिक समानता और मानवीय गरिमा की कसौटी पर गंभीर प्रश्न भी उत्पन्न करती हैं। इसलिए तुलसी को न तो अंधभक्ति के कारण आलोचना से मुक्त किया जा सकता है और न आधुनिक मानदंडों के आधार पर उनके समूचे साहित्य को अस्वीकार किया जा सकता है। आवश्यकता है—ऐतिहासिक संदर्भ, पाठ, प्रसंग और आधुनिक संवेदना, इन सभी को साथ रखकर तुलसी का विवेकपूर्ण पुनर्पाठ करने की। महान साहित्य वही है जो श्रद्धा के साथ-साथ प्रश्न करने की क्षमता भी पैदा करे।
पाँच शताब्दियों के बाद भी तुलसी की प्रासंगिकता का सबसे बड़ा कारण यही है कि उन्होंने केवल अपने समय के लिए नहीं लिखा। आज का मनुष्य तकनीकी रूप से अत्यंत शक्तिशाली है, परंतु तनाव, हिंसा, अविश्वास, पारिवारिक विघटन, अहंकार और नैतिक संकट से जूझ रहा है। ऐसे समय में तुलसी हमारे सामने यह प्रश्न रखते हैं कि शक्ति के साथ विनय कहाँ है, ज्ञान के साथ विवेक कहाँ है, अधिकार के साथ कर्तव्य कहाँ है और धर्म के साथ करुणा कहाँ है। तुलसी आधुनिक मनुष्य को अतीत में लौटने का आदेश नहीं देते; वे उसे अपने भीतर लौटने का अवसर देते हैं। उनकी प्रासंगिकता इसी आत्मपरीक्षण में है। वे हमें बताते हैं कि सभ्यता केवल बाहरी विकास का नाम नहीं; मनुष्य के भीतर मनुष्यता का बचा रहना भी उसकी अनिवार्य शर्त है।
अंततः “किसी ने न पायो थाह तुलसी के ताल की” केवल तुलसी की प्रशंसा नहीं, उनके काव्य की अनंत व्याख्यात्मक संभावनाओं का स्वीकार है। उनकी कविता की सतह पर रामकथा है, भीतर भक्ति है, उससे गहरे दर्शन है, उसके नीचे लोकजीवन है और सबसे गहरी परत में मनुष्य स्वयं उपस्थित है। तुलसी को जितना पढ़ते हैं, उतना ही लगता है कि अभी कुछ और पढ़ना बाकी है; एक अर्थ खुलता है तो उसके पीछे दूसरा अर्थ दिखाई देने लगता है। यही महान साहित्य की पहचान है कि वह अपने युग को पार करके आने वाली पीढ़ियों से संवाद करता रहता है। तुलसी ने राम की कथा लिखते-लिखते सनातनी मनुष्य की कथा लिख दी। इसलिए उनकी थाह लेना शायद संभव नहीं—क्योंकि तुलसी का ताल शब्दों में जितना है, उससे कहीं अधिक सनातनी चेतना की गहराइयों में है।
अजय कुमार झा
प्राचार्य: श्री रामनंदन विशेश्वर महेंद्र क्याम्पस
जलेस्ज्वर, महोत्तरी


