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शहर से गाँव तक बस एक ही नारा : स्वतन्त्र मधेश हो हमारा

 

मनोज बनैता, सप्तरी, २२ कात्र्तिक ।

मधेश आन्दोलन ३ के ८५ वें दिन बीतने के वाद भी सरकार की रवैया शर्मनाक दिख रहा है । इस आन्दोलन के आग ने समूचे मधेश को अपने गिरफत मे ले लिया है । बच्चे से बूढे तक का बस एक ही नारा है “हमारा मधेश स्वतन्त्र हो ।” मधेश आन्दोलन को निस्तेज करने के लिए सरकार ने जो नीति अखतियार किया है वो अपने आप मे हास्यास्पद है । इस आन्दोलन के प्रथम शहीद राजीव राउत के अन्त्येष्ठी के बाद सप्तरी का हर शहर और गाँव मानो आग बबुला हो गया है । भारदह की जमीन पर गिरे खून का रंग अभी भी फिका नहीं पड़ा है ।

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सप्तरी का वेल्ही, चन्ही, मल्हनिँया, थल्हा, बरसाईन, मलहनमा, सिसवा लगायत दर्जनो गाँव पूर्णरुप से आन्दोलित है । सप्तरी का एक बोर्डर नाका बेल्ही करीब तीन महिनों से पुरी तरह से प्रभावित है । बेल्ही से जुड़ा हुवा भारतीय बजार लौकहा है जो सिरहा जिला का भी एक प्रमुख नाका के रुप में माना जाता है । बेल्ही से कुशहा यानी राजमार्ग की दूरी करीबन १६ कि.मी है । जिसमे कुल ३ जगहों पे क्याम्प निमार्ण किया गया है । समाजवादी फोरम के युवा नेता दयानन्द गोईत के नेतृत्व में बेल्ही, चन्ही और सिसवा लगायत के स्थानो में क्याम्प निमार्ण किया गया है । युवा नेता गोईत के अनुसार कालाबजारी को निरुत्साहित करने के लिए इन नाकाओं का निमार्ण किया गया है । मोर्चा द्धारा घोषणा किए गए नाका अवरुद्ध आन्दोलन के कारण किसान लगायत व्यापारी पुर्णरुप से प्रभावित हंै । युवा नेता दयानन्द गोईत का कहना है “अब हमे कोई दया नहीं दिखानी है, सरकार अभी भी अपना रवैया को सही करे और मधेशी मन को समझने की कोशिश करे वरना पश्चाताप के सिवा कुछ हाथ नहीं है लगनेवाला ।” उन्हाेंने कहा कि “दिवाली और छठ के वाद हमारा आन्दोलन और शसक्त ढंग से चलेगा । अब का हमारा आन्दोलन नाका और राजमार्ग को और सख्ती से बन्द करेगा । हम भी देखे कि ये खस सरकार चाईनिज तलवे कब तक चाटते हंै”

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मल्हनियाँ के लगभग शतप्रतिशत कृषक इस आन्दोलन में अपनी अहम भुमिका निर्वाह कर रहे हंै । अनुगमन के वाद पता चला है कि २१ वीं सदी अन्त होने को है फिर भी सप्तरी के मल्हनिया गा.वि.स के लोग १९ वीं शदी का जीवन जीने को मजबुर हैं । इसका कारण है सरकार की भेदभाव नीति । अभी भी मल्हनियाँ के ९५ प्रतिशत लोग कृषक के जीवन बिता रहे है । राजमार्ग से सिर्फ १० कि. मी. दक्षिण में अवस्थित मल्हनिँया वासी परम्परागत खेती करने पर बेवस है । सिँचाई की असुविधा के कारण बर्षा के पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है । एक आन्दोलनरत कृषक मकुन सढोक ने कहा कि “आन्दोलन मे आना हम किसानों की मजवुरी है सरकार हम मधेशी किसानों का खून चूस चूस के सिर्फ अपने स्वार्थ मे लगे हंै । हम लोग बिजली, पानी की सुविधा, विद्यालय, अस्पताल, कृषि जन्य बीज जैसे अति आवश्यक सुविधाओं से वंचित है । पहाड़ के कोने कोने में विजली है पर हमे क्यूँ नहि ? हम लोग अभी भी लालटेन और दिए जला के रात गुजार रहे हैं जब कि पहाड़ी समुदाय हर दिन दिवाली मना रहा है । ये भेदभाव नहीं तो फिर क्या है ?”

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