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ओली सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है : मुरलीमनोहर तिबारी

 

मुरलीमनोहर तिबारी ( सिपु), बीरगंज ३० नोभेम्बर |

मधेश आंदोलन के चार महीने पुरे होने को है। अब मधेश की मनोदशा क्या है ? अब मधेशी आवाम क्या सोच रहा है ? क्या वे इतनी लंबी लड़ाई से थक गए है ? क्या वे और ज्यादा आक्रामक हो रहे है ? क्या मधेश की मांग अलग देश के मांग में बदल रहा है ? क्या आंदोलन अब हिंसक होने के मुहान पर है ? क्या मोर्चा के नेतृत्व क्षमता पर अविश्वास होने लगा है ?


मधेश में आंदोलन के दिन जितने बढ़ते जा रहे है, सरकार की पकड़ उतनी ही कमजोर होती जा रही है। समग्र मधेश एक प्रदेश का नारा अलग देश के नारे में बदलने लगा है। जहां भी भीड़ इकठ्ठी होती है, हिंसा के रास्ते अपनाने पर चर्चा होती है। आमुख प्रहरी चौकी, आमुख पुल उड़ाने की चर्चा होती है। दूसरी तरफ सरकार की गुप्तचर एजेंसिया मधेश में रक्षा वाहिनी या भूमिगत संगठन गठन के सम्बन्ध अफवाह फैला रही है। तमरा अभियान संयोजक जेपी गुप्ता ने सरकार से ऐसे उलजलूल अफवाह देने वाले गुप्तचर एजेंसियो को बिघटन करने की मांग किया।

भारत बिरोधी दिखने के चक्कर में, सारे कूटनीतिक मर्यादा का उलंघन करते हुए भारतीय दूतावास की गाड़ी जलाने पर ओली सरकार ने अपनी अंतिम जीवनदान का वरदान समाप्त कर लिया है |ओली सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। म धेश आंदोलन समाप्ति के साथ ही उनकी समाप्ति तय है। सिर्फ अपनी कुर्सी टिकाने के लिए आंदोलन लंबा किया जा रहा है। ओली सरकार अपनी सुबिधा अनुसार वार्ता का ढोंग करती है, और वार्ता के समय ही कही नरसंहार को अंजाम देती है। सरकार कोई दुर्घटना कराकर आंदोलन निगलना चाहती है।

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मधेशी जनमानस में पहाड़ी दल और उसके मधेशी नेता घृणा की नज़र से देखे जा रहे है। हिंदी फिल्मो के खलनायको के नाम इनको दिए जा रहे है। कोई मोकैम्बो है, कोई गब्बर तो कोई शाकाल है। इनसे जुडे लोग अपना चेहरा छुपाते फिर रहे है, और चोर रास्ते से आंदोलन में घुसपैठ करना चाहते है। इसी क्रम में पर्सा में कांग्रेस ने अपने झंडा-बैनर के साथ मधेश में घुसपैठ की कोशिश की जिसे स.स.म. गठबंधन ने नेस्तनाबूत कर दिया।

sipu-2मधेशी मोर्चा के बारे में कई जुमले गढ़े जा रहे है। कहा जा रहा है, आंदोलन निष्कर्ष पर पहुचाने की दूरदृष्टी मोर्चा में नहीं है। इन्होंने पहले कहा वार्ता की जरुरत नहीं है, पूर्व सहमती हुए २२ और ८ बुँदे पूरा करने से आंदोलन समाप्त हो जाएगा। फिर उसे छोड़कर वार्ता भी करने लगे, अचानक वार्ता भंग हो जाता है, अचानक शुरू भी हो जाता है। ओली सरकार और मोर्चा बच्चों के मिट्टी-घरौंदा का खेल, खेल रहे है, जो एक पल में बनता है, दूसरे पल मिट्टी में मिल जाता है। मधेश के मांग पुरे होने पर मधेश में रहने वाले थारु और पर्वते समाज को ना जोड़कर मधेश के लिए बड़ी समस्या खड़ा कर दिया। मधेश आंदोलन में पर्वते समाज और नेवारी समाज के एकबद्धता दिखाया था, जिसके दम से काठमांडू में भी समर्थन लिया जा सकता था, मोर्चा इसमें भी असफल रहा।

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पर्सा- बारा के लोग सवाल कर रहे है, क्या मधेश सिर्फ पर्सा-बारा में ही है ? बिरगंज को छोड़कर मधेश के सारे नाके खुले है। सारे मधेशी दल को सिर्फ बिरगंज ही क्यों दीखता है ? सब जगह के व्यापारी- किसान अपना काम कर रहे है, सिर्फ पर्सा- बारा ही ठप्प पड़ा है। इतना संघर्ष के वावजूद जब राजधानी बनाने का समय आएगा तो बिरगंज किसी को नहीं दिखेगा। राजधानी कायम करने के लिए पर्सा- बारा को अलग से दुबारा बंदी करना होगा।

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sipu-3पर्सा-बारा आगे भी संघर्ष को तैयार है, मगर मनोबल तब गिर जाता है, जब दूसरे नाके और तस्करी से सारे सामान काठमांडू पहुच जाते है। ये मोर्चा की बड़ी नाकामयाबी है। मोर्चा खुद अकेले लड़ नहीं पाते, दूसरे को जोड़ नहीं पाते। बिना पतवार, बिना गंतव्य के नाव चली जा रही है । आम चर्चा है की अगर शरीर का रोग एक डॉक्टर से ठीक नहीं हो तो दूसरा डॉक्टर से दिखाना चाहिए। अगर किसी मुद्दा में अपना वकील कमजोर हो जाए, तो दूसरा वकील रखकर उसमे दम पहुचाया जाता है। मोर्चा से ओली सरकार का इलाज नहीं हो रहा है और ना ही सही तरीके से मधेश की वकालत हो रही है। इसलिए इसका अगुवाई अगली शक्तिया करें। मोर्चा की मधेश निष्ठा तब सही मानी जाएगी जब वे कमजोरी स्वीकारे और घुटने टेकने के बजाए अगली पीढ़ी को सम्मानजनक तरीके से आंदोलन सौंप दे।sipu-1

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