उच्च प्राथमिकता में गच्छदार
पांच दिनों के भारत भ्रमण से लौटने के बाद उपप्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री विजय कुमार गच्छेदार २१ जनवरी जब देर रात त्रिभुवन अन्तर्रर्ाा्रीय विमानस्थल पर उतरे तो कडके की र्सद रात में भी नेपाली राजनीति की तपिश बढने का अनुमान उनके चमकते चेहरे से साफ लगाया जा सकता था। और यह कोई अस्वाभाविक भी नहीं था। गच्छेदार को अपनी शान बढाने के लिए भारतीय सरकार की तरफ से कई कारण दिया गया था। पिछली बार प्रधानमंत्री चुनाव में उम्मीदवार रहे गच्छेदार की वह संभावना अभी निस्तेज नहीं हर्ुइ है और उस र्सवाेच्च पद तक पहुंचने की उनकी आशा एक बार फिर से जीवित हो उठी है। भारत भ्रमण पर जाने से पहले एक धार्मिक कार्यक्रम में शरीक हुए विजय कुमार गच्छेदार ने इशारों ही इशारों में खुद के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की लालसा को र्सार्वजनिक किया था और लगता है कि उनकी मनोकामना पूरी होने के कगार पर है।
गच्छेदार के भारत भ्रमण को उनके चीन भ्रमण और चिनियां प्रधानमंत्री के भारत भ्रमण से जोडÞकर देखा जा रहा है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। चीन भ्रमण के दौरान यह प्रचारित किया गया था कि गच्छेदार की मुलाकात चिनियां प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ से भी होने वाली है। लेकिन बाद में पता चला कि जियाबाओ ने गच्छेदार से मिलने से मना कर दिया। चिनियां प्रधानमंत्री के चन्द घण्टों के नेपाल भ्रमण पर आने के चन्द दिनों बाद ही गच्छेदार की अकस्मात हर्ुइ इस राजकीय भ्रमण से नेपाली राजनीति का वर्तमान और भविष्य की रेखा बदलने वाली है। गच्छेदार का भ्रमण ऐसे समय हुआ जब नई दिल्ली में भारत और नेपाल के बीच गृह सचिव स्तरीय वार्ता चल रही थी। इस वार्ता के दौरान बहुप्रतीक्षित सुपर्ुदगी सन्धि और स्काई मार्शल की चर्चा ना होने की वजह से इसका कोई खास महत्व नहीं रह गया था लेकिन जैसे ही गच्छेदार दिल्ली पहुंचे इस वार्ता में भी एक नई जान आ गई। र्
नई दिल्ली पहुंचते ही गच्छेदार को जिस राजकीय सम्मान के साथ स्वागत सत्कार और आवभगत किया गया वह साफ संकेत था कि भारत नेपाल को देखने की अपनी नीति में परिवर्तन ला रहा है। भारतीय प्रधानमंत्री डाँ मनमोहन सिंह के साथ गच्छेदार की करीब ४५ मिनट की बातचीत इस पांच दिवसीय दौरे की सबसे खास उपलब्धि रही। वैसे इससे पहले भी गच्छेदार कई बार दिल्ली गए। कभी मधेशी मोर्चा के नेता की हैसियत की से तो कभी मंत्री या उपप्रधानमंत्री की हैसियत से लेकिन कभी भी उनकी मनमोहन सिंह से एकान्त वार्ता नहीं हो पाई थी। मनमोहन सिंह अपने विदेशी समकक्षी और राष्ट्र प्रमुखों के अलावा बहुत ही कम अवसरों पर किसी दूसरे नेताओं से मुलाकात करते हैं।
इस बातचीत के बारे में खुद गच्छेदार ने स्वीकार किया यह मुलाकात उनके भ्रमण की एक बडी उपलब्धि रही। द्विपक्षीय बातचीत के अलावा नेपाल के वर्तमान राजनीतिक हालात पर भी भारतीय प्रधानमंत्री से गम्भीर चर्चा हर्ुइ। बकौल गच्छेदार नेपाल की तेजी से बदलती राजनीतिक हालात और भविष्य में बनने वाले नए राजनीतिक समीकरण की संभावना पर ४५ मिनट की बातचीत में ३० मिनट इसी पर चर्चा हर्ुइ। साफ है कि भारत की प्राथमिकता बदल रही है और अब तक सिर्फनेपाली कांग्रेस और एमाले के कुछ लोकतांत्रिक धार के नेताओं पर भरोसा करने वाला भारतीय साउथ ब्लाँक अब मधेशी मोर्चा की ताकत,राष्ट्रीय राजनीति में मोर्चा के प्रभाव और नेपाल की अस्थिर राजनीतिक हालात में भरोसे का साथी कौन हो सकता है।
गच्छेदार पर भरोसा करने का कई और वजह भी है। इस समय मोर्चा में सबसे बडे दल के रूप में र्सवाधिक सभासदों की संख्या। मधेशी मोर्चा में धीरे धीरे उन्हें अघोषित संयोजक के रूप में स्वीकार किया जाना। थारू जाति का होने से मधेशी और थारू पर भी पकड,पार्टर्ीीे आन्तरिक मामलों में अधिक उलझन नहीं, जरूरत पडने पर बडे फैसले करने का दम, मोर्चा के एक अन्य वरिष्ठ नेता महन्थ ठाकुर की पार्टर्ीीर कमजोर होती पकड, साथ ही चीन के प्रति उनका कडा रवैया ही उन्हें भारत के और नजदीक ले गया है और भारत का भरोसेमन्द बनाने में मदत किया है। जिस तरह से नेपाली कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर विवाद गहराता जा रहा है और पार्टर्ीीक नहीं हो पा रही है उससे भी गच्छेदार को करीब लाने में मदत मिला है। माओवादी पार्टर्ीीर भारत बहुत अधिक भरोसा नहीं कर सकती है। दलों के बीच सहमति के बावजूद हमेशा की आन्तरिक विवाद को बढावा देकर शान्ति प्रक्रिया को अवरूद्ध करना और संविधान निर्माण के काम को रोकने से भी भी माओवादी नीयत पर भारत को भरोसा नहीं है चाहे प्रधानमंत्री के रूप में बाबूराम भट्टर्राई ही क्यों ना हो-माओवादी के भीतर आज भी हार्डलाईनर हावी हो रहे हैं। वैद्य को आगे कर माओवादी अपनी असली नीति को लागू करवाने के लिए हमेशा प्रयासरत है। भट्टर्राई सरकार के कुछ ऐसे ही आपत्तिजनक फैसले से भारत और अधिक र्सतर्क हो गया है।
गच्छेदार बोले या ना बोले लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री से लेकर सभी अहम मुलाकातों में माओवादी के इस व्यवहार के बारे में सभी ने अपनी चिन्ता जाहिर की है। इससे भी साफ हो गया है कि भारत अब नेपाल के वर्तमान हालात के मध्येनजर सिर्फवेट एण्ड वाच की नीति पर कायम नहीं रह सकता है और एक बार फिर से अपनी सक्रियता दिखा सकता है। गच्छेदार अब नेपाली राजनीति में नयां दांव आजमाने में लगे हुए हैं। उन्हें भरोसा है कि भारत उनके इस दांव का र्समर्थन करेगा। वैसे वो खुद तो भारतीय प्रधानमंत्री से या अन्य वरिष्ठ मंत्रियों से इस बात की चर्चा नहीं कर सकते हैं लेकिन इसके लिए गच्छेदार ने अपने पुराने दोस्त का सहारा लिया है। सभी प्रोटोकाँल को दरकिनार करते हुए गच्छेदार द्वारा भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सल्लाहकार शिवशंकर मेनन से जाकर उनके दफ्तर में मुलाकात करने की बात को यूं ही समान्य तरीके से नहीं लिया जा सकता है। वैसे तो इस मुलाकात के बारे में नेपाल की मिडिया ने काफी ही नकारात्मक तरीके से पेश किया था।
यह कोई अजूबा नहीं है या फिर दुनियां में यह पहली पहली बार नहीं हुआ है कि कोई देश का प्रधानमंत्री या मंत्री हमेशा ही प्रोटोकाँल का ही ख्याल रखता हो। जिस समय भारत ने परमाणु पोखरण कर दुनियां को अपनी ताकत का लोहा मनवाया था उसके बाद समय भारत के तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी अमेरिका भ्रमण पर गए। अमेरिका ने भारत पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिया था। बावजूद इसके आडवाणी से मिलने के लिए अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ँज बुश बिना किसी प्रोटोकाँल और पर्ूव निर्धारति कार्यक्रम के बिना सुरक्षा घेरे के ही आडवाणी से मिलने के लिए उनके ठहरे हुए होटल पहुंचे थे। तो क्या इस घटना से अमेरिकी राष्ट्रपति की शान घट गयी या फिर दुनियां में उनकी प्रतिष्ठा में कमी आ गई ऐसा नहीं बल्कि अमेरिकी मीडिया ने इस खबर को सकारात्मक रूप से लेते हुए इसे दुनियां की एक और महाशक्ति के साथ अमेरिकी रिश्तों को और अधिक मजबूत करने के रूप में किया था।
इस तरह की ही एक घटना भारतीय प्रधानमंत्री डाँ मनमोहन सिंह के साथ भी हर्ुइ। नेपाल में लोकतंत्र की पर्ुनर्बहाली के बाद जब गिरिजा कोइराला ने प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार भारत के दौरे पर गए तो मनमोहन सिंह ने सारे प्रोटोकाँल को दरकिनार करते हुए खुद ही विमानस्थल पर कोइराला का स्वागत किया था। और उसके बाद भी भारतीय मीडिया में यह खबर आई कि बिना किसी बडे रक्तपात के ही नेपाल में सदियों पुराने राजशाही को हटाकर उखाड फेंकने के लिए जो अकल्पनीय राजनीतिक परिवर्तन हुआ था उसके नायक थे गिरिजा बाबू और उनके इसी ऐतिहासिक उपलब्धि का सम्मान करने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री खुद ही विमानस्थल पर उनका स्वागत करने पहुंचे थे।
लेकिन जब नेपाल के उपप्रधानमंत्री ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सल्लाहकार से उनके दफ्तर में जाकर मुलाकात की थी तो ऐसा मानो जैसे कि कोई भूकम्प आ गया हो। गच्छेदार ने स्वयं भी इस बात को कहा कि हर बार सिर्फप्रोटोकाँल के दायरे में बंध कर रहने से राजनीतिक उपलब्धि नहीं मिलती है और ना ही संबंधों में प्रगाढता ही आ पाती है। और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सल्लाहकार को कम कर नहीं आंका जाना चाहिए। दर्जे में भले ही उन्हें राज्य मंत्री का ही दर्जा दिया जाता हो लेकिन उनकी अहमियत भारत के किसी भी मंत्री से कम नहीं होती। प्रधानमंत्री से सीधे ही सर्ंपर्क में रहने की वजह से भी राष्ट्रीय सुरक्षा सल्लाहकार की अहमियत वहां के कई मंत्रियों से आफी अहम होती है। और तो और वे भारत की विदेश नीति को भी प्रभावित करने की हैसियत रखते हैं। इसलिए ऐसे व्यक्तित्व से मिलने के दौरान प्रोटोकाँल कोई और अहमियत नहीं रखता है। गच्छेदार कहते हैं कि शिवशंकर मेनन से उनकी पुरानी दोस्ती होने की वजह से भी वो उनसे मिलने गए।
उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री तथा रक्षा मंत्री का भी कार्यभार संभाल रहे विजय कुमार गच्छेदार से भारत के रक्षा मंत्री ए के एण्टनी, गृहमंत्री पी चिदम्बरम, अर्थ मंत्री प्रणव मुखर्जी और विदेश मंत्री एसएम कृष्णा से भी मुलाकात हर्ुइ। इसके अलावा भारत के प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टर्ीीौर नेपाल के बारे में खासा दिलचस्पी रखने वाले अन्य नेताओं से भी उनकी मुलाकात कर्राई गई। इस तरह से मिलने वालों में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितीन गडकरी, भाजपा के ही वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, पर्ूव अध्यक्ष राजनाथ सिंह, विपक्षी गठबन्धन राष्ट्रीय जनतंात्रिक गठबन्धन के संयोजक तथा जनता दल यूनाईटेड के अध्यक्ष शरद यादव, उत्तर प्रदेश के पर्ूव मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव आदि प्रमुख हैं। यह साफ दिखा कि गच्छेदार की यह मुलाकातों का दौर दो महीने पहले ही हुए प्रधानमंत्री भट्टर्राई के भारत भ्रमण की याद दिला रहा था। गच्छेदार को ठीक वही अहमियत दी गई जो कि नेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टर्राई को दी गई थी। राजनीतिक विश्लेषक का मानना है कि गच्छेदार का यह भ्रमण उनके प्रधानमंत्री बनने का रिहर्सल मात्र है। दरअसल अब भारत भी पहली बार किसी मधेशी को प्रधानमंत्री बनाने में अपना ुसहयोगु करने की मनशाय जता दी है। यादि आने वाले दिनों में राजनीतिक समीकरण बदल जाए और नेपाली कांग्रेस तथा माओवादी दोनों ही मधेशी मोर्चा को प्रधानमंत्री पद के लिए अपना र्समर्थन दे दें तो कोई आर्श्चर्य नहीं है। वैसे भी बाबूराम भट्टर्राई का प्रधानमंत्री के रूप में उलटी गिनती शुरू हो गई है। और जल्द ही उनके पद छोडÞने के लिए माहौल भी तैयार हो रहा है। ±±±

