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सिद्धार्थ अौर बुद्ध दो अलग अलग हैसियत मे एक पूर्ण पुरुष,

 

कैलाश महतो , परासी, २१ मई |

कहा जाता है कि बुद्ध इस धर्ती पर पदार्पण करते ही मुस्कुराए थे, सात कदम चले थे अौर एक अजीब से प्रकाशपुञ्ज रुप से प्रतित हुए थे । उनकी जन्म तत्कालिन मज्झिम देश के कपिलवत्थु मे योजनापूर्ण रुप मे हुई थी जिसमे बुद्ध की सहमति ही कही जाती है ।

अरबों वर्ष की इस प्रिथवी पर मानव के रुप मे धर्ती के सर्वश्रेष्ठ कहे जाने बाले मानव प्राणीयों मे अब तक सिर्फ दो व्यक्ति जन्म के साथ ही हँसे थे । वे थे जरथुस्त्र अौर दुसरा सिद्धार्थ गौतम । ये दो पुरुष अद्भुत रहे । 

Buddha-Jayanti-At-Lumbani-5 इस २५६०वें बुद्ध जयन्ती भगवान् बुद्धमे श्रद्धा चढाने का काम केवल अौपचारिकता ना हो, यह  बुद्ध को सम्मान करने बाले विश्व अौर उसके राष्ट्र एवं सरकार प्रमुखों मे  अाग्रह है । क्यूँकी बुद्ध उदण्डता से निर्माण हुए महापुरुष नहीं है । बुद्ध तत्कालिन समाज मे प्रचलित उखान तुक्कों मे भरोसा रख कर दो चार दिन मे निर्माण हुअा व्यक्तित्व नहीं है । बुद्ध त्याग का प्रतिक हैं । बुद्ध संघर्ष का प्रतिबिम्ब हैं । बुद्ध विश्वास का अटुट राजमार्ग हैं, न्याय के दुत हैं अौर अन्याय तथा अत्याचार विरुद्ध के श्रद्धेय नेता भी हैं । बुद्ध को कईयौं ने गाली की, उन्होंने परवाह नहीं की, कईयौं ने पागल कहा, उन्होंने ध्यान नहीं दिया । बुद्ध को उनके साथ रहे पाँच वैरागी ब्राम्हणों ने पथभ्रष्ट कह कर उन्हें  तिरष्कार किया, मगर बुद्ध अटल रहे । बुद्ध को उनके अपने भाइ कहलाने बाले देवदत्त ने मारने को खोजा, वे अपना शिर हाजिर कर दिए । अौर अद्भूत रुप मे हुअा ऎसा कि उनको गाली देने बाले, उनपर धुल अौर गन्दे फेकने बाले, उनपर अट्टहास करने बाले, उनको पागल कहने बाले, उन्हें तिरष्कार करने बाले अौर उनके शर काटने बाले सब के सब उनके शरण मे आ गए अौर उनसे दीक्षा ले ली ।

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उपर उल्लेखित अद्भूत घटनाएँ होने का कारण था कि वे एक असाधारण अौर विलक्षण प्रतिभा के अवतार थे । बद्ध ने खुद योजना बनाकर मायादेवी को अपना माँ बनाया, शुद्धोदन को अपना पिता तथा यशोधरा को अपनी पत्नी बनायी अौर राहुल को अपना सन्तान ।

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बुद्ध असाधारण रुप मे ही उनके माता के गर्भाधारण के १०मे महीने मे जन्म को स्वीकार किए । वे अद्भूत रुप मे ही मायादेवी अपने मायके जाते समय राह मे ही लुम्बिनी मे जन्म लेना बेहतर समझा था । असार पूर्णिमा के दिन बुद्ध का गर्भ मे प्रवेश अौर वैशाख पूर्णिमा के दिन उन्होंने अपने जन्म को स्वीकार किया ।   बुद्ध का जन्म, ग्यान प्राप्ति अौर देहाबसान वैशाख पूर्णिमा के दिन ही पूर्ण होना भी अर्थपूर्ण ही माना जाता है । उनके नामाकरण होते समय ब्राम्हण तथा पुरोहितों के अध्ययन मे वे सिद्ध पुरुष ठहरे अौर उनका नाम पुरोहितों ने सिद्धार्थ रखा ।

बडा विचित्र घटना घटती है सिद्धार्थ के जन्म के कुछ दिनों बाद । एक सन्तनु नाम के साधु जो कभी युवराज शुद्धोदन के शिक्षा सहपाठी थे, वे फिर कभी न लौटने के उद्देश्य साथ तपस्या करने हेतु हिमालय मे चल बसे थे, मरने के उम्र मे लट्ठी के सहारे राजा रहे अपने मित्र शुद्धोदन के दरबार के सामने अाकर शुद्धोदन को अावाज दी । राजा शुद्धोदन वर्षों बाद अपने परम् मित्र को देख खुशी से बेहाल होकर उन्हें अासन ग्रहण के लिए खुशामद करते हैं । मगर साधु सन्तनु ने कहा कि वो वहाँ बैठने नहीं, अपितु उनके घर अवतार लिए परमात्मा को दर्शन के लिए अाए हैं जो उनके बेटा सिद्धार्थ के रुप मे बालक थे । सन्तनु ने शुद्धोदन से निवेदन किया कि जब वह बुद्ध बनेगा, वो दुनियाँ छोड चुका होगा । कम से कम उस बुढे उम्र में उसे परमात्मा से साक्षात दर्शन हो जाये, जिसके लिए वो हिमालय से चलकर अाए थे राजा शुद्धोदन के दरबार तक ।

 समय के क्रम मे २९ वर्ष के नाजुक उम्र मे जब उन्होंने घर परिवार तथा ऎशो अारामों को त्याग कर ग्यान की खोज मे वर्षों तक संसार की परिक्रमा की, खोज, तपस्या एवं अाराधना की तो उन्हें सारे जहाँ से अलग, सारे परम्पराओं से निश्छल, अद्भूत, मनोरम तथा तथ्यपरक एक अन्तर्ग्यान की दर्शन हुई जिस से उन्हें बुधत्व प्राप्त हुई अौर वे बुद्ध कहलाये ।

विश्व उस बुद्ध को एक दार्शनिक, वैग्यानिक, नेता, भगवान् तथा मानव कल्याण अौर विश्व विकास के प्रणेता एवं अहिंसा के देवता भगवान् बुद्ध को एक तरफ शुद्ध मन से खरबों के लगानी के साथ उनके जन्म दिन को याद करने तथा उत्सव मनाने अाते हैं, वही दुसरी तरफ अपने मज्झिम देश मे जन्मे सिद्धार्थ बुद्ध को नेपाली शासक लोग सिर्फ व्यापारिक साधन बना डाला है । उन्हें बुद्ध के ग्यान, उनके त्याग अौर अहिंसा के पाठों से कुछ लेना देना अगर होता तो बुद्ध के देश के उनके परिजनों तथा जनता को गैर नागरिक नहीं कहा जाता । बुद्ध फिरसे अवतार ले कर देखें कि अगर वे पैसे कमाकर नेपालियों के झोली भरना छोड दे तो ये फिरंगी अत्याचारी नेपाली शासक बुद्ध के नागरिकता समेत पर  मुद्दा चला देंगे अौर उन्हें भी विदेशी नाम दे डालेंगे । इन्हें पैसे जो अौर जिन श्रोतों से मिल जाये, वे सब इनके परमात्मा होते हैं । कल्ह मोदी जी ने इनके संविधानसभा अौर संसद मे “नेपाल की पानी अौर जवानी नेपाल के नहीं, भारत के काम के हैं ” बोले तो तालियाँ पिट रहे थे । क्यूँकि तब उनसे पैसे लेने थे । अब चीन इनको उससे ज्यादा देने बाला हो गया तो अब इनके देवता चीन बनने जा रहा है ।

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वैसे मोदी जी बुद्ध भारत मे जन्में हैं कहते हैं तो  कोई गलत नहीं है । बुद्ध तो अाज के भारत के बौद्ध गया मे ही जन्में हैं । लुम्बिनी मे तो राजा शुद्धोदन पुत्र युवराज सिद्धार्थ गौतम जन्मे थे । वो सिद्धार्थ जब बुद्धत्व प्राप्त किए तो वो भूमि तो अभी का भारत है ।

विश्व समुदाय उपर उल्लेखित बातों पर ध्यान दें । वे जो पैसे लगानी कर रहे हैं, बद्ध के नाम पर कुबुद्धों को पालने का काम हो रही है । सिद्धार्थ बुद्ध नेपाल मे कतई नहीं, मध्य देश जिसे बुद्ध ने विनय पिटक मे खुद उनका जन्म मज्झिम देश मे होने की बात कही है ।
सिद्धार्थ अौर बुद्ध दो अलग अलग हैसियत मे जन्मे राजा सुद्धोदन अौर मायावती के सन्तान एक पूर्ण महापुरुष हैं । २५६०वें बुद्ध जयन्ती के पावन बेला पर भगवान् बुद्ध को शत् शत् प्रणाम । २५६०वाँ बुद्ध जयन्ती पर बुद्ध को शत् शत् प्रणाम

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