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संघीयता को खत्म करने की साजिश के साथ जारी नेपाल का नया संविधान: सर्वदेव ओझा

 
सर्वदेव ओझा , नेपालगंज, २२ अगस्त |
 sarvdev ojhaनेपाल का नया संविधान जिस दिन जारी हुआ उसी दिन यह लोगों में जानकारी हो गयी कि सदियो से पुराने शासकीय शासन मे प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जो लोग इसमे लिप्त थे वे आज भी उसी तरफ अपना बर्चस्व कायम रखे हुए हैं । और उसी शासकीय संरचना के अगल बगल रहने वाले लोगों ने ही इस संविधान के जारी होते ही भरपूर खुशियाँ मनायी । लेकिन यथार्थ अब धीरे धीरे सामने आने लगी है और लोगों तक जानकारी भी होने लगी है । हाँ इस बात की कुछ जानकारी तुरन्त हो गई थी कि नेपाल मे सदियो से पीडित , शोषित और शासन व्यवस्था से वन्चित रहा वह समुह , समुदाय , वर्ग तथा जात जाति के लोग जो संविधान जारी से पूर्व से ही अपनी एकता के रुप में मधेसी ,आदिवासी,जनजाति , महिला , मुस्लिम आदि के नाम पर शुरू से लेकर आज तक भी विरोध करते आ रहे हैं । लेकिन इस समुह को भी यथार्थ अन्दरुनी संविधान मे कितना छल कपट पूर्ण बना है और संघीयता को समाप्त करने का संयन्त्र अब धीरे धीरे जानकारी हो रही है ।
यह बात अब सामने आने लगी जब संबिधान को लागु करने में समस्या आने लागी है । शुरू से यह आन्दोलन कर रहे समुह अपने आन्दोलन का आज तक का प्रमुख मांग के रुप मे संघीयता का सीमा निर्धारण, समानुपातिक समावेसी चरित्र , तथा समान जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र निर्धारण , आदि प्रमुख एजेण्डा ही रहा है । और मधेस का आन्दोलन भी इन्ही मांग को आधार बिन्दु बना कर आन्दोलन किया । आज तक के आन्दोलन से राज्य ने क्या दिया और आन्दोलित समुह, समुदाय ने क्या पाया ? कितनी जनधन की क्षति हुई ? यह आम जनता को भी मालूम हो गया है । आज भी राज्य के द्वारा इन मुद्दो का समाधान होगा इस आशा के अलावा  आन्दोलनकारियों के पास निरीहता के अलावा अभी कोई विकल्प नही है । नेपाल की राजनीतिक प्रमुख नेताओ की आदत पद , पैसा के लिए कल तक अपने आप दूसरो का गुलामी करते रहने की आदत से आज भी अपने से नीचे सभी कार्यकर्ताओ तथा नेताओ को गुलामी ही करवाना आदत सी बन गई है । जिस वजह से अधिकांश जनता  गुलामी का अहसास कर रही है । अभी तक इस पुरानी आदतों में कोई खास सुधार होती भी नजर नहीं आ रही है ।
मैं इस विषय में आज से पहले भी इस संविधान के अध्ययन पश्चात विश्लेषण किया था और अपने फेस बुक तथा कुछ मीडिया के मार्फत जानकारी देने का प्रयास भी किया, लेकिन आज संबिधान लागु होने की समस्या मात्र आन्दोलनकारियो द्वारा उठाए गए मुद्दे ही नही । इसकी गहराई में जाने पर और भी जटिलता सामने उजागर होती नजर आ रही है । अतः संबिधान के अन्दर प्रमुख पुराने शासकों की जो संघीयता समाप्त करने की जो रणनीतिक चाल है उसे सारांश में तपसिल के बूँदो में व्याख्या तथा विश्लेषण करने का प्रयास कर रहा हूँ ।
१ , विश्व मे संघीयता प्रणाली के संबिधान में प्रायः व्यवस्थापकीय सरकार के दो चरण होते हैं , पहला केन्द्रीय स्तर , दूसरा प्रान्तीय चरण का स्तर का सरकार होता है , साथ ही प्रदेश के मातहत ही अन्य स्थानीय निकाय को ही अधिकार सम्पन्न बनाने का सैध्धान्तिक व्यवस्था होती है । लेकिन नेपाल के संबिधान के धारा ५६ मे देखा जाए यहाँ तीन तह की सरकार की व्यवस्था की गयी है , जिसका सभी अधिकार को  अधिकार के अनुसूची में ही उल्लेख संबिधान मे ही व्याख्या कर दिया गया है । इसके  अलावा और विवादित बनाने के लिए फिर से धारा २२० में अलग एक तह का सरकार भी है , जिसे जिला वा जिला सभा  जिला समन्वय समिति के नाम से भी स्थाई व्यवस्थापन किया गया है । अब यहाँ बताए ये संयन्त्र और संघियता समाप्त करने का जालझेल नही तो क्या है ? 
२ , संविधान के धारा ५७ मे अधिकार की सुची के नाम से कुल ५ अनुसूची जारी किया गया है जिसमे सबसे अधिकार सम्पन्न के रुप मे केन्द्रीय स्तर अर्थात् अनुसूची ५ मे है , उसके बाद का अधिकार सम्पन्न अधिकार स्थानीय तह कि सरकार को है जो अनुसूची ८ मे व्यवस्था किया गया है , और बीच मे सबसे कमजोर बनाने के उद्देश्य से प्रादेशिक सरकार के अधिकार ही है जो अधिकार अनुसूची ६ मे है । साथ ही प्रादेशिक सरकार को केन्द्र से , प्रादेशिक सरकार को स्थानीय सरकार से हर समय विवाद मे उल्झने का अधिक अधिकार का अनुसूची ७ और ९ भी जारी कर व्यवस्थापन किया गया है । अब यहाँ भी प्रान्तीय सरकार जालझेल की शिकार मे हरसमय उलझती रहेगी । 
३, अब आकर वर्तमान मे नया उलझन् के रुप मे धारा २२० (३) के अनुसार जिला के समन्वय समिति का निर्वाचन के लिए प्रत्येक जिला के सभा सदस्य मे सम्बन्धित जिला के स्थानीय तह (गाउ पालिका, नगर पालिका ) मे  निर्वाचित अध्यक्ष और उपध्यक्ष वा प्रमुख और उप प्रमुख ही जिला सभा के प्रतिनिधि सदस्य रहने की व्यवस्था की गई है , साथ ही यहि सदस्य ही अपने मताधिकार से जिला के जिला समन्वय समिति के प्रमुख और उप प्रमुख सहित का ९ सदस्यीय निर्वाचित बोर्ड का गठन करने का व्यवस्था है । अब यहाँ आश्चर्य की बात यह है कि हाल प्रस्तावित स्थानीय निकाय का कुल ५६५ संख्या मे रसुवा ,मुस्तांग और मनांग जिले मे बस ३,३ स्थानीय निकाय ही है , जहाँ कुल सदस्य मतदाता ही ६ लोग होंगे , उस जिले मे जिला के जिला समन्वय समिति का ९ सदस्यीय बोर्ड कैसे निर्वाचित होगा । यह भी जालझेल नही तो क्या है ? 
४,  थप विवाद फिर न्यायपालिका के सन्दर्भ मे संविधान के धारा १२७ मे भी तीन तह का  न्यायपालिका का व्यवस्था है , जिसमे भी तीसरे तह मे जिला अदालत का व्यवस्था हुआ है । ईसके अलावा जिला अदालत के अन्तर्गत ही धारा १२७(२) मे एक स्थानीय स्तर की न्यायिक निकाय गठन करने की भी व्यवस्था की गई है , जब कि धारा १५० के अनुसार जिला अदालत के किसी भी न्यायाधीस को अन्य पठाने वा जिम्मेवारी देने मे प्रतिबन्ध लगया है , साथ ही स्थानीय व्यवस्थापिका अन्तर्गत दिए गए अधिकार सुची मे अनुसूची ८ के क्रम संख्या १२ मे स्थानीय अदालत का भी व्यवस्थापन करने कि जिम्मेवारी भी स्थानीय निकाय को है । लेकिन यहाँ के न्यायाधीस कौन होंगे ? यह कैसे होंगे ? इनकी नियुक्ति कौन करेगा ? यहाँ तो विवाद होगा ही । लेकिन कुल मिलाकर यहाँ न्यायपालिका मे भी चार तह हुआ न ? ये भी विवादास्पद जालझेल है न ? ,
५,  नया विवाद के रुप मे संविधान के धारा २८६ मे उस समय हुआ जब साबिक मे जारी हुए संबिधान के व्यवस्था के धारा २८६(५) के सम्पूर्ण वाक्य को फेरबदल कर संविधान का पहला संशोधन से नही  हुआ जिला शब्द को फिरसे पुनर्स्थापित कराई गई और विचद का थप जड बनाया गया । ये भी तो जाल नही तो क्या ?
६  व्यवस्थापिकीय निर्वाचन मे संबिधान कि धारा १७६ मे प्रदेश सभा का गठन का व्यवस्था है । धारा १७६(१)(क) मे सम्बन्धित प्रदेश से प्रतिनिधि सभा (केन्द्र) मे हुआ पहला निर्वाचित सदस्य संख्या का दूना संख्या का ही प्रान्तीय व्यवस्थापिका का सदस्य होगा । जिसका प्रदेश संख्या का निर्धारित संख्या के ६० प्रतिशत मात्र ही प्रदेश के प्रत्यक्ष निर्वाचित होंगे और बाकी ४० प्रतिशत समानुपातिक से  निर्वाचित होना होगा । अब यहाँ भी नेपाल अधिराज्य के कुल प्रतिनिधि सभा के प्रत्यक्ष पहले निर्वाचन होने वाले कुल संख्या १६५ है , यानी इस अनुसार सभी प्रदेश की कुल प्रतिनिधि संख्या ३३० हुआ । जिसका ६० प्रतिशत से कुल संख्या १९८ ही हुआ , जो सभी प्रदेश मे प्रत्यक्ष निर्वाचन होगा । यानी प्रतिनिधि सभा और प्रदेश सभा का सदस्य संख्या और मतदाता का अनुपात तो लगभग बराबर दिखाई देता है , केवल मात्र २० प्रतिशत फरक प्रतिनिधि सभा के मतदाता अधिक रहेंगे । यह कौन सी शैली है ? ये जनता और निर्वाचित प्रतिनिधियो के साथ जालझेल नही तो क्या ? अतः यदि इसी प्रकार आज के नेताओ की कार्य शैली रही तो संबिधान के कितनी धाराओ मे कब तक संशोधन करेंगे ? स्थानीय निकाय का सीमांकन कब् ? , प्रान्त का सीमांकन भी कैसे ? नया संविधान के लिए सभी नया कानून कब तक ? और स्थानीय निर्वाचन कैसे ? यह सब स्थिति से आज नेताओ के अन्द्रोनी खेल मे कहिँ पुरानी संरचना के पुराने पाँच विकाश क्षेत्र , पुराने जिला सब , और उसी अनुसार के पुराने स्थानीय निकाय रख्ने का यह  नया जालझेल तो नही ? समय मे ध्यान पहुचाये । और सजग तथा सतर्क रहे ? मै संबिधान की हाल के व्यवस्था का ही विश्लेषण किया हु  । बाकी पाठक वर्ग आप लोग ही करे । 

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