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पावन पुनीत था पर्व ये भाद्र माह की तीज : वेदना उपाध्याय

 

पावन पुनीत था पर्व ये भाद्र माह की तीज
देख आज की विकृतियां मन उठता है खीझ
श्रद्धाभाव , अर्चना , पूजा सब चढ गये बलि
खान -पान और पहनावे की कुत्सित रीति चली
कैसी शक्ति हीन हो गई शक्ति रूप की नारी
चौवीस घंटे अल्पावधि में हो जाती बेचारी
हमने यहीं उन्हें भी देखा जो निराहार नौ दिन रहती
बिना किसी बाधा – पीडा के वे वर्त नियम पूरे करती
दोनों में बस भेद एक है एक आधुनिक नारी
जिसकी चिंता देह तलक है वो भूख प्यास से हारी
और दूसरी शक्ति रूप जो यम से भी लड जाती
बृथा नहीं उसके प्रयास वो पति वापस ले आती
आज बहुत बाहुल्य आधुनिकतम देवी नारी का
जिनके अंदर मोह बहुत है आभूषण – सारी का

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वेदना उपाध्याय
वेदना उपाध्याय

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